एक सम्राट एक फकीर के प्रेम में था। सम्राट अक्सर फकीरों के प्रेम में पड़ जाते हैं क्योंकि फकीर बड़ी दूसरी दुनिया का अजनबी मालूम पड़ता है। अपने ही जैसा नहीं, अपने से बड़ा अजीब लगता है और अजनबी में एक आकर्षण होता है। जो अपने से बहुत भिन्न है, उसमें एक रस होता है। जो अपने से विपरीत है, उसको जानने की जिज्ञासा जगती है। वह किसी और लोक के निवासी जैसे होते है। जैसे कोई खबर कर दे कि कोई चांद का आदमी चांद से उतर कर बाजार में आ गया है, तो सारे लोग भागेंगे अजनबी को देखने, चांद से आए आदमी को देखने... ऐसे ही सम्राट अक्सर फकीरों के प्रेम में पड़ जाते हैं।
यह सम्राट प्रेम में था और प्रेम से ही इसने एक दिन निवेदन किया कि मुझे बड़ा दुख होता है कि तुम वृक्ष के नीचे पड़े हो। मैं यहां मौजूद हूं सेवा के लिए, महल मेरा मौजूद है, खाली पड़ा है। उसके सैकड़ों कक्षों में कोई रहने वाला नहीं है..! मैं अकेला हूं, तुम चलो...
लेकिन कभी उसने यह न सोचा था कि फकीर राजी हो जाएगा। फकीर अपना बोरा-बिस्तर बांध कर खड़ा हो गया, उसने यह भी न कहा कि सोचूंगा। सम्राट एकदम हताश हो गया कि यह आदमी तो अपने ही जैसा निकला। फंस गए, कहां भूल में पड़े रहे... यह तो ठीक भोगी मालूम पड़ता है। इसने एक दफा न भी ना की..! जैसे प्रतीक्षा ही कर रहा था। जैसे सब आयोजन यह फकीरी का इसीलिए था कि कब महल में निमंत्रण मिल जाए..! फंस गए, इसके जाल में उलझ गए। अब अपना शब्द वापस भी कैसे लें..? लाना पड़ा फकीर को, लेकिन बेमन से, खुशी चली गई। ठहराया, लेकिन बेमन से, लेकिन अब अपने शब्द को कैसे वापस लेना..!
छह महीने फकीर राजा के महल में रहा। धीरे-धीरे तो राजा ने आना भी बंद कर दिया कि इसकी क्या सुनना; हमारे ही जैसा आदमी है। ठीक है, रहता है। सब व्यवस्था कर दी और बिलकुल भूल गया। छह महीने बाद एक दिन सुबह फकीर को बगीचे में टहलते देखा तो आया और कहा, महाराज, अब तो मुझमें और आप में कोई फर्क ही नहीं; जैसा मैं वैसे आप, अब क्या फर्क रहा..?
फकीर ने कहा, चलो, थोड़ा गांव के बाहर चलें, वहां फर्क बताऊंगा। राजा साथ हो लिया; गांव के बाहर पहुंच गए। नदी आ गई, जो गांव की सीमा बनाती थी। फकीर ने कहा कि उस तरफ चलें। पार हो गए नदी; राजा ने कहा, अब देर हुई जाती है, सूरज भी खूब चढ़ आया, अब आप बता दें। दूर जाने की क्या जरूरत हैं..? अब यहां कोई भी नहीं है, वृक्ष के नीचे बैठ कर बता दें। उसने कहा कि थोड़ा और... दोपहर तक वह सम्राट को चलाता रहा... आखिर सम्राट खड़ा हो गया। उसने कहा, अब बहुत हो गया। व्यर्थ चलाए जा रहे हैं, जो कहना है कह दें...
फकीर ने कहा, अब मैं वापस नहीं लौटूंगा। तुम मेरे साथ चलते हो..? सम्राट ने कहा, मैं कैसे साथ चल सकता हूं..? राज्य है, महल है, व्यवस्था, काम-धाम, हजार उलझनें हैं। आपका क्या..? तो फकीर ने कहा, अब समझ सको तो समझ लेना... हम जाते हैं, तुम नहीं जा सकते हो..! यहीं भेद है। हम महल में थे, महल हममें न था..! तुम महल में हो और महल भी तुममें है। भेद बारीक है। समझ सको, समझ लेना...
सम्राट रोने लगा, पैर पकड़ लिया... कहा कि मैं पहचान ही न पाया..! और आप छह महीने वहां थे और मैं धीरे-धीरे आपको भूल ही गया। मैं तो समझा कि आप भी भोगी हैं। वापस चलिए...
फकीर ने कहा, मुझे चलने में कोई आपत्ती नहीं, लेकिन फिर वही गलती हो जाएगी। मेरी तरफ से कोई अड़चन नहीं है..! कहा और मैं चला... सम्राट फिर चौंका...
उस फकीर ने कहा कि देखो, तुम भोग को समझ सकते हो, तुम त्याग को समझ सकते हो; तुम संत को नहीं समझ सकते..! मुझे क्या अड़चन है..? इधर गए कि उधर गए, सब बराबर है। सब दिशाएं उसी की हैं। महल में रहे कि झोपड़े में, सब महल, सब झोपड़े उसी के हैं। फटे कपड़े पहने कि शाही कपड़े पहने, जमीन पर सोए कि शय्या पर, बहुमूल्य शय्या पर सोए; सभी उसका... जो दे दे, वही ले लेते हैं। जो दिखा दे, वही देख लेते हैं। अपनी कोई मर्जी नहीं..! बोलो, क्या इरादा है..? कहो तो हम लौट पड़ें, मगर तुम पर फिर बुरी गुजरेगी। इसलिए बेहतर है, तुम हमें जाने दो; कम से कम श्रद्धा तो बनी रहेगी। तुम कम से कम कभी याद तो कर लिया करोगे कि किसी त्यागी से मिलना हुआ था। शायद वह याद तुम्हारे लिए उपयोगी हो जाएं।
तुम्हारे कारण बहुत से संत त्याग में जीए हैं, झोपड़ों में पड़े रहे हैं, वृक्षों के नीचे बैठे रहे हैं, तुम्हारे कारण... क्योंकि तुम समझ ही न पाओगे..! तुम समझ ही व्यर्थ बातें सकते हो। सार्थक की तुम्हें कोई पहचान नहीं है। सार्थक की पहचान हो भी नहीं सकती, जब तक तुम उस सार्थकता को स्वयं उपलब्ध न हो जाओ। तुम कैसे पहचानोगे संत को बिना संत हुए..? वही गुणधर्म तुम्हारी चेतना का भी हो जाए, वही सुगंध तुम्हें भी आ जाए, तभी तुम पहचानोगे। कृष्ण हुए बिना, कृष्ण को पहचानना मुश्किल है। लाओत्से हुए बिना लाओत्से को पहचानना मुश्किल है।
तुम यहां मेरे पास हो; निरंतर मुझे सुनते हो; हर भांति मेरे रंग में रंगे हो; फिर भी तुम मुझे पहचान नहीं सकते..! जब तक तुम ठीक मेरे जैसे ही न हो जाओ। तब तक तुम्हारी सब पहचान बाहर-बाहर की, तब तक तुम्हारी सब पहचान अधूरी..! तब तक तुम्हारी सब पहचान, तुम्हारी ही व्याख्या... उससे मेरा कुछ लेना-देना नहीं है। अगर तुम इतना भी समझ लो तो काफी समझना है। क्योंकि यह समझ तुम्हें और आगे की समझ की तरफ सीढ़ी बन जाएंगी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें