बुधवार, 17 दिसंबर 2025

"खासी समुदाय" सनातन परंपराओं का अटूट अंश और मातृशक्ति का जीवंत स्वरूप...⛳

मेघालय की पहाड़ियों में निवास करने वाला खासी समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान के लिए विश्वविख्यात हैं। यदि हम उनके मूल विश्वासों और जीवन दर्शन की गहराई में जाएं, तो स्पष्ट होता है कि वे सनातन धर्म की व्यापक चेतना का ही एक अभिन्न और जीवंत अंग हैं।


मातृसत्तात्मक व्यवस्था: रामायण और महाभारत काल की प्रतिध्वनि...

खासी समुदाय की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मातृसत्तात्मक व्यवस्था है, जहाँ वंश माँ के नाम से चलता हैं। आधुनिक युग में इसे 'अलग' माना जा सकता है किंतु यदि हम रामायण और महाभारत काल में जाएं तो यह व्यवस्था पूर्णतः सनातनी प्रतीत होती हैं।
 * माता के नाम से पहचान: उस काल में वीरों और महापुरुषों की सबसे बड़ी पहचान उनकी माता ही होती थी। जैसे भगवान राम को 'कौशल्या नंदन', हनुमान जी को 'केसरी नंदन' या 'अंजनी पुत्र', अर्जुन को 'कुंती पुत्र' (कौन्तेय) और भीष्म पितामह को 'गंगा पुत्र' कहा जाता था।
 * शक्ति का सम्मान: खासी समाज में वंश का माँ से चलना वास्तव में सनातन धर्म के उसी 'शक्ति' सिद्धांत का पालन हैं, जो नारी को सृजन का आधार मानता हैं। खासी परंपरा और प्राचीन भारतीय संस्कृति दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि संतान की मूल पहचान उसकी जननी से होती हैं।


19वीं शताब्दी: मिशनरियों का प्रहार और धर्म परिवर्तन...

1841 के आसपास, विदेशी मिशनरियों ने खासी पहाड़ियों में प्रवेश किया। उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य की आड़ में धर्म परिवर्तन का जो चक्र शुरू किया, उसने इस समुदाय की प्राचीन सनातनी कड़ियों को तोड़ने का प्रयास किया।

 * सांस्कृतिक प्रहार: मिशनरियों ने खासी समुदाय की मातृशक्ति आधारित परंपराओं और उनके प्राकृतिक पूजा विधान को 'पिछड़ा' बताकर उन्हें अपनी जड़ों से काटने का प्रयास किया। इससे हज़ारों वर्ष पुरानी एक महान सांस्कृतिक निरंतरता को गहरी क्षति पहुँची।


वर्तमान आवश्यकता: अपनी जड़ों की ओर 'गृह वापसी'

आज के बदलते परिवेश में अपनी खोई हुई पहचान को वापस पाने की एक नई लहर देखी जा रही हैं। 'गृह वापसी' धर्म का परिवर्तन नहीं..! बल्कि अपनी उस मूल आध्यात्मिक विरासत से पुनः जुड़ने की प्रक्रिया हैं, जिसे विदेशी शक्तियों ने धुंधला कर दिया था।

 * अस्तित्व की रक्षा: अपनी भाषा, लोक कथाओं और कौशल्या-नंदन जैसी गौरवशाली परंपराओं को बचाने के लिए यह आवश्यक है कि खासी समुदाय अपने मूल सनातनी स्वरूप को पुनः पहचानें...


सेंग खासी और सांस्कृतिक पुनरुत्थान...

'सेंग खासी' जैसे संगठनों और बाबू जीबन रॉय जैसे महापुरुषों ने हमेशा यह सिखाया कि खासी परंपराएं वास्तव में सनातन धर्म का ही विस्तार हैं। उन्होंने रामायण का खासी में अनुवाद कर समाज को यह याद दिलाया कि उनकी रगों में वही सांस्कृतिक रक्त प्रवाहित हो रहा हैं, जो शेष भारत में हैं।

खासी समुदाय की आत्मा आज भी उन पवित्र उपवनों और माता के प्रति अगाध सम्मान में बसती हैं, जो सनातन भारत की पहचान हैं। विदेशी मिशनरियों द्वारा थोपे गए विचारों को त्यागकर, अपनी प्राचीन जड़ों की ओर लौटना ही इस वीर समुदाय के उज्ज्वल और गौरवमयी भविष्य का एकमात्र मार्ग हैं।
                🙏🏻 जय सनातन 🕉️ जय सियाराम ⛳

शनिवार, 6 दिसंबर 2025

खोखले भ्रम से बाहर निकलिए...

कभी-कभी इंसान सत्य को जानता है, समझता भी है, पर उसे स्वीकार नहीं कर पाता..! क्योंकि सत्य "बदलने अर्थात परिवर्तन" की मांग करता है — सोच बदलने की, आदतें बदलने की और कभी-कभी खुद को बदलने की...
और बदलाव हमेशा असुविधाजनक होता हैं। इसलिए मन उस असत्य के साथ बना रहता हैं, जहाँ उसे आराम मिलता हैं... भले ही वो झूठ अस्थाई हो, खोखला हो या भ्रम हो।
इस लगाव में एक अजीब-सी सुरक्षा छिपी रहती हैं — पर ये सुरक्षा नहीं, एक तरह की मानसिक कैद हैं।

जो सत्य को देख सकता हैं, फिर भी असत्य का साथ देता हैं — वो बाहरी दुनिया से नहीं..! अपने ही मन से, स्वयं से पराजित हो चुका होता हैं।
क्योंकि सत्य कभी मजबूर नहीं करता, बस दर्पण की तरह सामने खड़ा रहता हैं।
और असत्य..? वो सुन्दर भ्रम बनकर मन को बहलाता हैं, क्योंकि सच का तेज़ प्रकाश उन सचाइयों को नग्न कर देता हैं, जिन्हें हम छुपाना चाहते हैं।
यही अंतर है — स्वतंत्र सोच और मानसिक गुलामी में...

होश और साहस वही रखते हैं, जो सत्य को देखकर उससे भागते नहीं..! बल्कि उसे स्वीकार करते हैं। क्योंकि सत्य तक पहुँचना आसान नहीं — इसमें सवाल उठते हैं, आत्मचिंतन होता हैं और कभी–कभी अपनी ही धारणाओं को तोड़ना पड़ता हैं, पर जो असत्य के मोह में जी रहा हैं, वह बस भीड़ का हिस्सा होता हैं।
सोच स्वतंत्र तभी होती हैं, जब व्यक्ति झूठ की सुविधा को छोड़कर... सत्य की कठोरता पर शांत शरण चुन लेता हैं — वहीं से असली स्वतंत्रता की शुरुआत होती हैं।

"सच देखने की ताक़त तो बहुतों के पास होती हैं,
पर उसे स्वीकार करने का साहस बहुत कम के पास,
क्योंकि वे इस तथ्य से अवगत ही नहीं कि सत्य परेशान कर सकता हैं, पर असत्य गुलाम बना देता हैं।"

अवांछित लोगों को मंदिरों में प्रवेश क्यों नहीं करने देना चाहिए..?

तुम किसी हिंदू मंदिर में गए हो तो वहां तुमने गर्भ—गृह का नाम सुना होगा। मंदिर के अंतरस्थ भाग को गर्भ कहते हैं। शायद तुमने ध्यान न दिया हो कि उसे गर्भ क्यों कहते हैं। अगर तुम मंदिर की ध्वनि का उच्चार करोगे—हरेक मंदिर की अपनी ध्वनि है, अपना मंत्र है, अपना इष्ट—देवता है और उस इष्ट—देवता से संबंधित मंत्र है—अगर उस ध्वनि का उच्चार करोगे तो पाओगे कि उससे वहां वही ऊष्णता पैदा होती है जो मा के गर्भ में पाई जाती है। यही कारण है कि मंदिर के गर्भ को मां के गर्भ जैसा गोल और बंद, करीब—करीब बंद बनाया जाता है। उसमें एक ही छोटा सा द्वार रहता है।

जब ईसाई पहली बार भारत आए और उन्होंने हिंदू मंदिरों को देखा तो उन्हें लगा कि ये मंदिर तो बहुत अस्वास्थ्यकर हैं; उनमें खिड़कियां नहीं हैं, सिर्फ एक छोटा सा दरवाजा है। लेकिन मां के गर्भ में भी तो एक ही द्वार होता है और उसमें भी हवा के आने—जाने की व्यवस्था नहीं रहती। यही वजह है कि मंदिर को ठीक मां के पेट जैसा बनाया जाता है; उसमें एक ही दरवाजा रखा जाता है। अगर तुम उसकी ध्वनि का उच्चार करते हो तो गर्भ सजीव हो उठता है। और इसे इसलिए भी गर्भ कहा जाता है क्योंकि वहां तुम नया जन्म ग्रहण कर सकते हो, तुम नया मनुष्य बन सकते हो।

अगर तुम किसी ऐसी ध्वनि का उच्चार करो जो तुम्हें प्रीतिकर है, जिसके लिए तुम्हारे हृदय में भाव है, तो तुम अपने चारों ओर एक ध्वनि—गर्भ निर्मित कर लोगे। अत: इसे खुले आकाश के नीचे करना अच्छा नहीं है। तुम बहुत कमजोर हो; तुम अपनी ध्वनि से पूरे आकाश को नहीं भर सकते। एक छोटा कमरा इसके लिए अच्छा रहेगा। और अगर वह कमरा तुम्हारी ध्वनि को तरंगायित कर सके तो और भी अच्छा। उससे तुम्हें मदद मिलेगी। और एक ही स्थान पर रोज—रोज साधना करो तो वह और भी अच्छा रहेगा। वह स्थान आविष्ट हो जाएगा। अगर एक ही ध्वनि रोज—रोज दोहराई जाए तो उस स्थान का प्रत्येक कण, वह पूरा स्थान एक विशेष तरंग से भर जाएगा; वहां एक अलग वातावरण, एक अलग माहौल बन जाएगा।

यही कारण है कि मंदिरों में अन्य धर्मों के लोगों को प्रवेश नहीं मिलता। हिंदू मंदिर केवल हिंदुओं के लिए हैं, क्योंकि हिंदू मंदिर एक विशेष स्थान है, विशेष उद्देश्य से निर्मित हुआ है। सदियों—सदियों से वे इस प्रयत्न में लगे रहे हैं कि कैसे जीवंत मंदिर बनाएं; और कोई भी व्यक्ति उसमें उपद्रव पैदा कर सकता है। और यह उपद्रव खतरनाक सिद्ध हो सकता है। मंदिर कोई सार्वजनिक स्थान नहीं है। वह एक विशेष उद्देश्य से और विशेष लोगों के लिए बनाया गया है। वह आम दर्शकों के लिए नहीं है।

यही कारण है कि पुराने दिनों में आम दर्शकों को वहां प्रवेश नहीं मिलता था। अब सब को जाने दिया जाता है; क्योंकि हम नहीं जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। दर्शकों को नहीं जाने दिया जाना चाहिए; यह कोई खेल—तमाशे का स्थान नहीं है। यह स्थान विशेष तरंगों से तरंगायित है, विशेष उद्देश्य के लिए निर्मित हुआ है।

अगर यह राम का मंदिर है और अगर तुम उस परिवार में पैदा हुए हो जहां राम का नाम पूज्य रहा है, प्रिय रहा है, तो जब तुम उस मंदिर में प्रवेश करते हो जो सदा राम के नाम से तरंगायित है तो वहां जाकर तुम अनजाने, अनायास जाप करने लगोगे। वहां का माहौल तुम्हें राम—नाम जपने को मजबूर कर देगा। वहां की तरंगें तुम पर चोट करेंगी और तुम्हारे अंतस से नाम—जप उठने लगेगा।
तंत्र सूत्र, प्रवचन-29, ओशो

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

ईश्वर का प्रसाद है "दुःख"



जब भगवान सृष्टि की रचना कर रहे थे, तो उन्होंने जीव को कहा कि तुम्हें मृत्युलोक जाना पड़ेगा, मैं सृष्टि की रचना करने जा रहा हूँ। ये सुन जीव की आँखों में आँसू आ गए, वो बोला -"प्रभु! कुछ तो ऐसा करो कि मैं लौटकर आपके पास ही आऊँ।" भगवान को दया आ गई... उन्होंने दो कार्य किये, जीव के लिए... पहला संसार की हर चीज़ में अतृप्ति मिला दी और जीव से कहा- "तुझे दुनिया में कुछ भी मिल जाये परन्तु तू तृप्त नहीं होगा..! तृप्ति तभी मिलेगी, जब तू मेरे पास आएगा और दूसरा सभी के हिस्से में थोड़ा-थोडा दुःख मिला दिया है ताकि तू लौट कर मेरे ही पास पहुँचे। इस तरह हर किसी के जीवन में थोड़ा दुःख हैं। जीवन का दुःख या विषाद, हमें ईश्वर के पास ले जाने के लिए हैं, लेकिन हम चूक जाते हैं। हमारी समस्या क्या है कि हर किसी को दुःख आता हैं। हम भागते हैं...ज्योतिष के पास, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास... कुछ होने वाला नहीं..! थोड़ी देर का मानसिक संतोष बस, यदि दुखों से घबरायें नहीं और ईश्वर का प्रसाद समझ कर आगे बढ़े तो बात बन जाती हैं। यदि हुम ईश्वर से विलग होने के दिनों को याद कर ले तो बात बन जाती हैं और जीव दुखों से भी पार हो जाता हैं। दुःख तो ईश्वर का प्रसाद हैं। दुखों का मतलब हैं, ईश्वर का बुलावा हैं। वो हमें याद कर रहा हैं। पहले भी ये विषाद और दुःख बहुत से संतो के लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बन चुका हैं। हमें ये बात अच्छे से समझनी चाहिए कि संसार में हर चीज़ में अतृप्ति है और दुःख-विषाद ईश्वर प्राप्ति का साधन हैं।
                           🙏🏻 जय श्री हरि ⛳