शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

जानिए क्यों स्वयं श्रीराम ने तोड़ दिया था रामसेतु?


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वाल्मीकि रामायण के अनुसार लंका पर चढ़ाई करते समय भगवान श्रीराम के कहने पर वानरों और भालुओं ने रामसेतु का निर्माण किया था, ये बात हम सभी जानते हैं। लेकिन जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही तोड़ दिया था, ये बात बहुत कम लोग जानते हैं। इससे जुड़ी कथा का वर्णन पद्म पुराण के सृष्टि खंड में मिलता है।

श्रीराम इसलिए गए थे लंका पद्म पुराण के अनुसार, अयोध्या का राजा बनने के बाद एक दिन भगवान श्रीराम को विभीषण का विचार आया। उन्होंने सोचा कि- रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं, उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है। जब श्रीराम ये सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए।

भरत के पूछने पर श्रीराम उन्हें पूरी बात बताई। ऐसा विचार मन में आने पर श्रीराम लंका जाने की सोचते हैं। भरत भी उनके साथ जाने को तैयार हो जाते हैं। अयोध्या की रक्षा का भार लक्ष्मण को सौंपकर श्रीराम व भरत पुष्पक विमान पर सवार होकर लंका जाते हैं।

जब श्रीराम से मिले सुग्रीव और विभीषण
जब श्रीराम व भरत पुष्पक विमान से लंका जा रहे होते हैं, रास्ते में किष्किंधा नगरी आती है। श्रीराम व भरत थोड़ी देर वहां ठहरते हैं और सुग्रीव से अन्य वानरों से भी मिलते हैं। जब सुग्रीव को पता चलता है कि श्रीराम व भरत विभीषण से मिलने लंका जा रहे हैं, तो वे उनके साथ हो जाते हैं।

रास्ते में श्रीराम भरत को वह पुल दिखाते हैं, जो वानरों व भालुओं ने समुद्र पर बनाया था। जब विभीषण को पता चलता है कि श्रीराम, भरत व सुग्रीव लंका आ रहे हैं तो वे पूरे नगर को सजाने के लिए कहते हैं। विभीषण श्रीराम, भरत व सुग्रीव से मिलकर बहुत प्रसन्न होते हैं।

श्रीराम ने इसलिए तोड़ा था सेतु श्रीराम तीन दिन तक लंका में ठहरते हैं और विभीषण को धर्म-अधर्म का ज्ञान देते हैं और कहते हैं कि तुम हमेशा धर्म पूर्वक इस नगर पर राज्य करना।

जब श्रीराम पुन: अयोध्या जाने के लिए पुष्पक विमान पर बैठते हैं तो विभीषण उनसे कहता है कि- श्रीराम आपने जैसा मुझसे कहा है, ठीक उसी तरह मैं धर्म पूर्वक राज्य करूंगा। लेकिन इस सेतु (पुल) के मार्ग से जब मानव यहां आकर मुझे सताएंगे, उस स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए।

विभीषण के ऐसा कहने पर श्रीराम ने अपने बाणों से उस सेतु के दो टुकड़े कर दिए। फिर तीन भाग करके बीच का हिस्सा भी अपने बाणों से तोड़ दिया। इस तरह स्वयं श्रीराम ने ही रामसेतु तोड़ा था।
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सोमवार, 24 जुलाई 2017

छोड़ जाऊँगा शब्दों की धरोहर...

मुसाफिर हूँ दोस्तो,
अपनी राह चला जाऊँगा|

अकेला था सफर में मैं,
अकेला चला जाऊँगा|

छोड़ जाऊँगा शब्दों की
धरोहर अपनों के लिये,

खाली हाथ आया था,
खाली हाथ चला जाऊँगा|

कितने रिश्ते बना लिये
इस ठहराव में मैंने,

मैं उनको बसा कर दिल में,
बस चला जाऊँगा

दोस्तो मुसाफिर का काम है
बस चलते जाना,

आज मैं यहाँ हूँ,
कल कहीं और चला जाऊँगा..

शनिवार, 22 जुलाई 2017

भविष्य पुराण में इस्लाम के बारे में मुहम्मद के जन्म से भी कई हज़ार वर्ष पहले बता दिया गया था।

लिंड्गच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी सदूषकः।

उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम।। 25।।

विना कौलं च पश्वस्तेषां भक्ष्या मतामम।
मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति ।।26।


तस्मान्मुसलवन्त ो हि जातयो धर्मदूषकाः।
इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति मया कृतः ।। 27।।


(भविष्य पुराण पर्व 3, खण्ड 3, अध्याय 1, श्लोक
25, 26, 27)

5 हज़ार वर्ष पहले भविष्य पुराण में स्पष्ट लिखा है।
इसका हिंदी अनुवाद: रेगिस्तान की धरती पर एक "पिशाच" जन्म लेगा जिसका नाम महामद (मोहम्मद) होगा, वो एक ऐसे धर्म की नींव रखेगा जिसके कारण मानव जाति त्राहि माम कर
उठेगी। वो असुर कुल सभी मानवों को समाप्त करने की चेष्टा करेगा। उस धर्म के लोग अपने लिंग के अग्रभाग को जन्म लेते ही काटेंगे, उनकी शिखा (चोटी ) नहीं होगी, वो दाढ़ी रखेंगे पर मूँछ नहीं रखेंगे। वो बहुत शोर करेंगे और मानव जाति को नाश करने की चेष्टा करेंगे। राक्षस जाति को बढ़ावा देंगे एवं वे अपने
को मुसलमान कहेंगे।

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

क्या है सूतक और पातक...

सूतक क्या है? 

हिन्दू धर्म में सूतक और पातक दोनों का ही बहुत बड़ा महत्व है। सूतक – पसूतक लग गया, अब मंदिर नहीं जाना, ऐसा कहा-सुना तो बहुत बार... किन्तु अब इसका अर्थ भी समझ लेना जरूरी है। 

सूतक का संबंध ‘जन्म के’ निमित्त से हुई अशुद्धि से है।
 

जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाले दोष पाप के प्रायश्चित स्वरूप ‘सूतक’ माना जाता है।

जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता: 3 पीढ़ी तक – 10 दिन तक...  

ध्यान दें...

एक रसोई में भोजन करने वालों की पीढ़ी नहीं गिनी जाती... वहां पूरा 10 दिन का सूतक माना है। 

प्रसूति (नवजात की माँ) की 45 दिन का सूतक रहता है। प्रसूति स्थान 1 माह तक अशुद्ध है। इसीलिए कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं।

जब भी परिवार में किसी का जन्म होता है तो परिवार पर दस दिन के लिए सूतक लग जाता है। इस दौरान परिवार का कोई भी सदस्य ना तो किसी धार्मिक कार्य में भाग ले सकता है और ना ही मंदिर जा सकता है। उन्हें इन दस दिनों के लिए पूजा-पाठ से दूर रहना होता है। इसके अलावा बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री का रसोईघर में जाना या घर का कोई काम करना तब तक वर्जित होता है, जब तक कि घर में हवन ना हो जाएं।

जब बच्चे का जन्म होता है तो उसके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी नहीं हुआ होता। वह बहुत ही जल्द संक्रमण के दायरे में आ सकता है, इसलिए 10-30 दिनों की समयावधि में उसे बाहरी लोगों से दूर रखा जाता था, उसे घर से बाहर नहीं लेकर जाया जाता था। बाद में जरूर सूतक को एक अंधविश्वास मान लिया गया लेकिन इसका मौलिक उद्देश्य स्त्री के शरीर को आराम देना और शिशु के स्वास्थ्य का ख्याल रखने से ही था।


पातक क्या है? 

पातक का अर्थ भी समझ लेना जरूरी है।

 पातक का संबंध ‘मरण के’ निमित्त से हुई अशुद्धि से है।

 मरण के अवसर पर दाह – संस्कार में इत्यादि में जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाले दोष पाप के प्रायश्चित स्वरूप ‘पातक’ माना जाता है।

 मरण के बाद हुई अशुचिता: 3 पीढ़ी तक – 12 दिन।

किसी लंबी और घातक बीमारी या फिर एक्सिडेंट की वजह से या फिर वृद्धावस्था के कारण व्यक्ति की मृत्यु होती है। कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन इन सभी की वजह से संक्रमण फैलने की संभावनाएं बहुत हद तक बढ़ जाती हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि दाह-संस्कार के पश्चात स्नान आवश्यक है ताकि श्मशान घाट और घर के भीतर मौजूद कीटाणुओं से मुक्ति मिल सके।

पालतू पशुओं का सूतक पातक :-
घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि को घर में बच्चा होने पर हमे 1 दिन का सूतक रहता है किन्तु घर से दूर-बाहर जन्म होने पर कोई सूतक नहीं रहता ।
– बच्चा देने वाली गाय, भैंस और बकरी का दूध, क्रमशः 15 दिन, 10 दिन और 8 दिन तक “अभक्ष्य/अशुद्ध” रहता है ।


भगवान रामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण



अब हम श्री राम से जुडे कुछ अहम् सबुत पेश करने जा रहे हैं........
जिसे पढ़ के नास्तिक भी सोच में पड जायेंगे की रामायण सच्ची हैं या काल्पनिक ||

भगवान रामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण >>>>
पुराने उपलब्ध प्रमाणों और राम अवतार जी के शोध और अनुशंधानों के अनुसार कुल १९५ स्थानों पर राम और सीता जी के पुख्ता प्रमाण मिले हैं जिन्हें ५ भागों में वर्णित कर रहा हूँ

१.>>>वनवास का प्रथम चरण गंगा का अंचल >>>
सबसे पहले राम जी अयोध्या से चलकर तमसा नदी (गौराघाट,फैजाबाद,उत्तर प्रदेश) को पार किया जो अयोध्या से २० किमी की दूरी पर है |
आगे बढ़ते हुए राम जी ने गोमती नदी को पर किया और श्रिंगवेरपुर (वर्त्तमान सिंगरोर,जिला इलाहाबाद )पहुंचे ...आगे 2 किलोमीटर पर गंगा जी थीं और यहाँ से सुमंत को राम जी ने वापस कर दिया |
बस यही जगह केवट प्रसंग के लिए प्रसिद्ध है |
इसके बाद यमुना नदी को संगम के निकट पार कर के राम जी चित्रकूट में प्रवेश करते हैं|
वाल्मीकि आश्रम,मंडव्य आश्रम,भारत कूप आज भी इन प्रसंगों की गाथा का गान कर रहे हैं |
भारत मिलाप के बाद राम जी का चित्रकूट से प्रस्थान ,भारत चरण पादुका लेकर अयोध्या जी वापस |
अगला पड़ाव श्री अत्रि मुनि का आश्रम

२.बनवास का द्वितीय चरण दंडक वन(दंडकारन्य)>>>
घने जंगलों और बरसात वाले जीवन को जीते हुए राम जी सीता और लक्षमण सहित सरभंग और सुतीक्षण मुनि के आश्रमों में पहुचते हैं |
नर्मदा और महानदी के अंचल में उन्होंने अपना ज्यादा जीवन बिताया ,पन्ना ,रायपुर,बस्तर और जगदलपुर में
तमाम जंगलों ,झीलों पहाड़ों और नदियों को पारकर राम जी अगस्त्य मुनि के आश्रम नाशिक पहुँचते हैं |
जहाँ उन्हें अगस्त्य मुनि, अग्निशाला में बनाये हुए अपने अशत्र शस्त्र प्रदान करते हैं |

३.वनवास का तृतीय चरण गोदावरी अंचल >>>
अगस्त्य मुनि से मिलन के पश्चात राम जी पंचवटी (पांच वट वृक्षों से घिरा क्षेत्र ) जो आज भी नाशिक में गोदावरी के तट पर है यहाँ अपना निवास स्थान बनाये |यहीं आपने तड़का ,खर और दूषण का वध किया |
यही वो "जनस्थान" है जो वाल्मीकि रामायण में कहा गया है ...आज भी स्थित है नाशिक में
जहाँ मारीच का वध हुआ वह स्थान मृग व्यघेश्वर और बानेश्वर नाम से आज भी मौजूद है नाशिक में |
इसके बाद ही सीता हरण हुआ ....जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पार हुई जो इगतपुरी तालुका नाशिक के ताकीद गाँव में मौजूद है |दूरी ५६ किमी नाशिक से |
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इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया क्यों की यहीं पर मरणसन्न जटायु ने बताया था की सम्राट दशरथ की मृत्यु हो गई है ...और राम जी ने यहाँ जटायु का अंतिम संस्कार कर के पिता और जटायु का श्राद्ध तर्पण किया था |
यद्यपि भारत ने भी अयोध्या में किया था श्राद्ध ,मानस में प्रसंग है "भरत किन्ही दस्गात्र विधाना "
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४.वनवास का चतुर्थ चरण तुंगभद्रा और कावेरी के अंचल में >>>>
सीता की तलाश में राम लक्षमण जटायु मिलन और कबंध बाहुछेद कर के ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढे ....|
रास्ते में पंपा सरोवर के पास शबरी से मुलाकात हुई और नवधा भक्ति से शबरी को मुक्ति मिली |जो आज कल बेलगाँव का सुरेवन का इलाका है और आज भी ये बेर के कटीले वृक्षों के लिए ही प्रसिद्ध है |
चन्दन के जंगलों को पार कर राम जी ऋष्यमूक की ओर बढ़ते हुए हनुमान और सुग्रीव से मिले ,सीता के आभूषण प्राप्त हुए और बाली का वध हुआ ....ये स्थान आज भी कर्णाटक के बेल्लारी के हम्पी में स्थित है |

५.बनवास का पंचम चरण समुद्र का अंचल >>>>
कावेरी नदी के किनारे चलते ,चन्दन के वनों को पार करते कोड्डीकराई पहुचे पर पुनः पुल के निर्माण हेतु रामेश्वर आये जिसके हर प्रमाण छेदुकराई में उपलब्ध है |सागर तट के तीन दिनों तक अन्वेषण और शोध के बाद राम जी ने कोड्डीकराई और छेदुकराई को छोड़ सागर पर पुल निर्माण की सबसे उत्तम स्थिति रामेश्वरम की पाई ....और चौथे दिन इंजिनियर नल और नील ने पुल बंधन का कार्य प्रारम्भ किया |
...इति शुभम

आइए जानते हैं... क्यों मनाई जाती हैं, सावन महीने की शिवरात्रि..?

सावन का महीना सनातन धर्म में देवाधिदेव भगवान शंकर की उपासना का महीना होता है। साल में दो शिवरात्रि आती हैं, एक फाल्गुन के महीने की महाशिवरात्रि कहलाती है,  इसी दिन भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए ये पर्व पूरे भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। एक शिवरात्रि सावन के महीने में आती हैं... एक समय की बात है इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर कहीं जा रहे थे, तभी दुर्वासा ऋषि उन्हें रास्ते मे मिले... दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को एक माला भेंट की जिसे घमण्ड में चूर इंद्र ने अपने ऐरावत हाथी को पहना दिया और ऐरावत ने वो माला अपनी सूंड से उतारकर पैरों से कुचल दी। जिसे देख दुर्वासा ऋषि क्रोध में भर गए और उन्होंने इंद्र को ये श्राप दिया कि तेरा राज्य नष्ट हो जाए... जिसके कारण दैत्यों ने हमला करके इंद्र का राज्य स्वर्ग उससे छीन लिया। इससे परेशान होकर, जब इंद्र विष्णु भगवान के पास गए... तब भगवान विष्णु ने इंद्र से सागर मंथन के लिए कहा... वे बोले कि देवता और असुर दोनों मिलकर सागर का मंथन करो... इस मंथन से जब अमृत निकलेगा तो उसे तुम सभी देवता पी लेना... जिससे तुम सभी अमरत्व को प्राप्त हो जाओगे और असुरों से पराजित नहीं होंगे। भगवान विष्णु इतना कहकर खुद राजा बलि के पास गए... उन्हें देखकर राजा बलि अत्यंत प्रसन्न हुए क्योंकि वे भगवान विष्णु के सच्चे भक्त थे। भगवान विष्णु ने राजा बलि के सामने सागर मंथन का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि सभी देवता और असुर मिलकर सागर मंथन करेंगे और उसमें से जो भी रत्न, अन्य सभी वस्तुएं और अमृत निकलेगा तो इन सभी वस्तुओं को देव और असुर आपस मे बांट लेंगे।विष्णु जी के द्वारा दिये गए प्रस्ताव को राजा बलि ने सहर्ष स्वीकार किया। इसके बाद वासुकी नाग की रस्सी बनाकर और मंदराचल पर्वत की मंथनी बनाकर देवों और असुरों के बीच सागर मंथन शुरू हुआ। सबसे पहले मंथन में से कालकूट नाम का महाभयंकर विष निकला जिसके प्रभाव से देवता और असुर दोनों ही बुरी तरह से विचलित हो गए... सभी की सांसें टूटने लगी। ये विष इतना ज्यादा भयंकर था कि इसका तोड़ स्वयं ब्रह्मा जी के पास भी नहीं था। जब सभी देवता और असुर इसकी ज्वाला से जलने लगे... तब ब्रह्मा जी ने शंकर भगवान का ध्यान किया। केवल वो ही ऐसे थे, जो इसका उपचार कर सकते थे। जब ब्रह्मा जी समेत सभी देवों-असुरों ने मिलकर शिवजी से विनती की तब भगवान ने सृष्टि के कल्याण के लिए इस महाभयंकर कालकूट विष का पान कर लिया, जिसकी वजह से प्रभु का कंठ नीला पड़ गया और तभी से महादेव नीलकंठ के नाम से जाने गए। सावन महीने की त्रयोदशी के दिन भगवान शंकर ने इस विष को ग्रहण किया, तभी से प्रत्येक वर्ष सावन महीने की त्रयोदशी को शिवरात्रि मनाई जाती है। चूंकि कालकूट विष इतना ज्यादा भयंकर था कि उसके प्रभाव से भगवान शिव के कंठ में जलन होने लगी और वे विचलित होकर तांडव करने लगे तब हज़ारों साल समाधि के बाद भगवान ने उस विष की ज्वाला को शांत किया। इसी कारण शिवरात्रि के दिन शिवजी को जल, दूध और दही इत्यादि चढ़ाया जाता है क्योंकि इसी दिन भगवान ने विष को अपने कण्ठ में ग्रहण किया था, उसी कालकूट विष की अग्नि के प्रभाव को कम करने और भगवान को आराम पहुंचे, इसके लिए ही भगवान को सब वस्तुए चढ़ाई जाती हैं।
                  🙌🏻  हर हर महादेव ⛳

बुधवार, 19 जुलाई 2017

कौन है पुरुष (who is a male)

कौन है पुरुष (who is a male)
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¤ भगवान की ऐसी रचना जो बचपन से ही त्याग
और समझौता करना सीखता है ।
¤ वह अपने चॉकलेटस का त्याग करता है बहन के
लिये ।
¤ वह अपने सपनो का त्याग कर माता-
पिता की खुशी के लिये उनके अनुसार कैरियर
चुनता है।
¤ वह अपनी पूरी पॉकेट मनी गर्ल फ़्रेंड के लिये
गिफ़्ट खरीदने में लगाता है ।
¤ वह अपनी पूरी जवानी बीवी-बच्चों के लिये
कमाने में लगाता है ।
¤ वह अपना भविष्य बनाने के लिये लोन लेता है
और बाकी की ज़िंदगी उस लोन को चुकाने में
लगाता है ।
¤ इन सबके बावजुद वह पूरी ज़िंदगी पत्नी,
माँ और बॉस से डांट सुनने में लगाता है ।
¤ पूरी ज़िंदगी पत्नी, माँ, बॉस और सास उस पर
कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं ।
¤ उसकी पूरी ज़िंदगी दुसरो के लियेही बीतती है

और बेचारा पुरुष
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¤ बीवी पर हाथ उठाये तो "बेशर्म" ।
¤ बीवी से मार खाये तो "बुजदिल" ।
¤ बीवी को किसी और के साथदेख कर कुछ कहे
तो "शक्की" ।
¤ चुप रहे तो "डरपोक" ।
¤ घर से बाहर रहे तो "आवारा" ।
¤ घर में रहे तो "नाकारा" ।
¤ बच्चों को डांटे तो"ज़ालिम" ।
¤ ना डांटे तो "लापरवाह" ।
¤ बीवी को नौकरी करने से रोके तो"शक्की" ।
¤ बीवी को नौकरी करने दे तो बिवी की "कमाई
खाने वाला" ।
¤ माँ की माने तो"चम्मचा" ।
¤ बीवी की माने तो "जोरु का गुलाम"।
पूरी ज़िंदगी समझौता, त्याग और संघर्ष में
बिताने के बावजुद वह अपने लिये कुछ
नहीं चाहता ।
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इसलिये पुरुष की हमेशा इज़्ज़त करें ।
पुरुष ,बेटा, भाई, बॉय फ़्रैंड, पति, दामाद,
पिता हो सकता है, जिसका जीवन हमेशा मुश्किलों से भरा हुआ है ।