शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

नथ गुलामी नहीं..! सौभाग्य और शक्ति का प्रतीक...

सत्य का अन्वेषण...✍🏻 हाल ही में मेरी भेंट एक परम आदरणीय और धर्म के प्रति समर्पित आधुनिक सनातनी स्त्री से हुई। उन्होंने मुझे बताया कि किसी के यह कहने पर कि "नथ गुलामी की निशानी है" उन्होंने इसे पहनना छोड़ दिया। यह सुनकर मुझे अत्यंत आश्चर्य और पीड़ा हुई कि कैसे हमारी गौरवशाली परंपराओं को गलत अर्थ देकर हमसे दूर किया जा रहा हैं। इसी भ्रांति को दूर करने और शास्त्रों के प्रकाश में नथ के वास्तविक महत्व को स्थापित करने के लिए मैंने यह लेख लिखा हैं। आइए नथ के बारे में विस्तार से जानते हैं...

शास्त्रों में नासिका आभूषण का वर्णन...📖
हमारे प्राचीन स्तोत्रों और ग्रंथों में देवी के सौंदर्य का वर्णन करते समय 'नथ' को विशेष स्थान दिया गया हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'सौंदर्य लहरी' और 'त्रिपुरसुंदरी स्तोत्र' में इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है:
नासिकावंशमुक्ताभिः शुक्तिभिः सदृशप्रभाम्।
तव नासामणेः शोभां वर्णयामि कथं शिवे॥
(हे शिवे! आपकी नासिका के मोती की शोभा का वर्णन मैं कैसे करूँ, जिसकी कांति अत्यंत दिव्य है।)
यह श्लोक सिद्ध करता है कि नथ कोई आधुनिक या बाहरी प्रभाव नहीं..! बल्कि प्राचीन काल से ही शक्ति की उपासना का अंग रही हैं।

आयुर्वेद का वैज्ञानिक रक्षा कवच...🩺
महर्षि सुश्रुत, जिन्हें शल्य चिकित्सा (Surgery) का जनक माना जाता है, उन्होंने 'सुश्रुत संहिता' में शरीर के मर्म बिंदुओं का वर्णन किया हैं। नासिका भेदन केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म चिकित्सा पद्धति हैं...
 प्रजनन तंत्र की सुरक्षा आयुर्वेद के अनुसार, नासिका का बाईं ओर का हिस्सा महिला के प्रजनन अंगों से जुड़ा होता हैं। यहाँ स्वर्ण धारण करने से गर्भाशय स्वस्थ रहता हैं।
 मासिक धर्म और प्रसव में सुगमता यह एक महत्वपूर्ण एक्यूप्रेशर बिंदु हैं। इसे छिदवाने से मासिक धर्म के समय होने वाली पीड़ा कम होती हैं और शिशु जन्म (प्रसव) के समय होने वाले कष्ट में भी प्राकृतिक रूप से कमी आती हैं।
 नाड़ी संतुलन स्वर्ण की नथ पहनने से महिला की इड़ा और पिंगला नाड़ियों में संतुलन बना रहता हैं, जो शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हैं।

भक्ति साहित्य और श्री राधा रानी...
मध्यकालीन भारत के महान संतों और कवियों ने भगवान कृष्ण की शक्ति, श्री राधा रानी के श्रृंगार में 'बेसर' (नथ) का अत्यंत मोहक वर्णन किया हैं।
 * 'ब्रज विलास' और 'चैतन्य चरितामृत' जैसे ग्रंथों में राधा जी की नथ को उनके प्रेम और सौभाग्य का मुकुट माना गया हैं।
 * भक्त कवियों ने इसे 'अधर-सुधा' (होठों के अमृत) के समीप रहने वाला भाग्यशाली आभूषण कहा हैं। जो वस्तु ईश्वर के प्रेम का प्रतीक हो, वह गुलामी कैसे हो सकती हैं..?

नकेल और नथ का मौलिक अंतर...💡
तर्क दिया जाता हैं कि यह 'नकेल' का रूप हैं परंतु शास्त्र और शब्द विज्ञान इसे नकारते हैं...
 नकेल यह नियंत्रण के लिए नाक के बीच वाले कोमल हिस्से (Septum) को बेधकर डाली जाती हैं।
 नथ यह नासिका के पार्श्व (Side) भाग में पहनी जाती हैं, जिसे 'कौमार्य' और 'सौभाग्य' से जोड़ा गया हैं। यह बंधन नहीं..! बल्कि स्त्री के गौरवपूर्ण पद की प्रतिष्ठा हैं।

सोलह श्रृंगार और आध्यात्मिक ऊर्जा...💍
सनातन धर्म में 'सोलह श्रृंगार' केवल बाहरी सजावट नहीं..! बल्कि आंतरिक चक्रों को जागृत करने की विधि हैं।
 मानसिक शांति नथ पहनने से महिला की एकाग्रता बढ़ती हैं और मानसिक चंचलता पर नियंत्रण रहता हैं।
 स्वयं पर शासन यह स्वयं पर नियंत्रण (Self-control) की निशानी हैं, न कि किसी और के द्वारा नियंत्रित होने की...

निष्कर्ष...🚩
नथ हमारी सांस्कृतिक चेतना का गौरव हैं। यह हमारे पूर्वजों के ज्ञान, ऋषियों के विज्ञान और देवियों के प्रति हमारी भक्ति का संगम हैं। किसी भी अज्ञानी या पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यक्ति के कहने पर अपनी जड़ों को काटना बुद्धिमानी नहीं है।
अपनी नथ को गर्व से पहनें, क्योंकि यह उस 'सनातन शक्ति' का प्रतीक हैं, जो पूरे ब्रह्मांड को संचालित करती हैं। 🌺

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