गुरुवार, 10 मई 2018

सरदार के “बारह बज गए” मुहावरे के पीछे का सच...

एक सरदार पर जोक बनाना औए सुनाना कितना आसान होता है न । सर में पंगडी और बगल में कृपाण रखने वाले सरदार भी अक्सर आपके जोक्स और मजाक को भी नजरअंदाज करते हुए खुश रहते हैं.फिर भी आप उनसे बगैर पूँछे “सरदार जी के बारह बज गए” कहते हुए मजे लेते रहते हैं । ज्यादातर लोगों को लगता है की सरदार के चिल्ड नेचर और भाव-भंगिमाओं के कारण ही इस फ्रेज का लोग इस्तेमाल करते हैं । आज हम आपको बताते हैं की इस जुमले की पीछे की हकीकत क्या है,और निश्चित ही इसे पढ़कर इसका प्रयोग करने वालों को शर्मिंदगी जरूर महसूस होगी । आप ये समझ पायेंगे कि एक सरदार क्या होता है?

1) सत्रहवीं शताब्दी में जब देश में मुगलों का अत्याचार चरम पर था,बहुसंख्यक हिन्दुओं को धर्म-परिवर्तन के लिए अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं,औरंगजेब के काल में ये स्थिति और बदतर हो गयी ।

2) मुग़ल सैनिक,धर्मान्तरण के लिए हिन्दू महिलाओं की आबरू को निशाना बनाते थे । अंततः दुर्दांत क़त्ल-ए-आम और बलात्कार से परेशान हो कश्मीरी पंडितों ने आनंदपुर में सिखों के नवमे गुरु तेग बहादुर से मदद की गुहार लगाई.

3) गुरु तेग बहादुर ने बादशाह ‘औरंगजेब’ के दरबार में अपने आपको प्रस्तुत किया और चुनौती दी कि यदि मुग़ल सैनिक उन्हें स्वयं इस्लाम कबूल करवाने में कामयाब रहे तो अन्य हिन्दू सहर्ष ही इस्लाम अपना लेंगे ।

4) औरंगजेब बेहद क्रूर था,परन्तु अपनी कौल का पक्का व्यक्ति था,गुरु जी उसके स्वभाव से परिचित थे । गुरूजी के प्रस्ताव पर उसने सहर्ष स्वीकृति दे दी । गुरु तेग बहादुर और उनके कई शिष्य मरते दम तक अत्याचार सहते हुए शहीद हो गए,पर इस्लाम स्वीकार नहीं किया । इस तरह अपने प्राणों की बलि देकर उन्होंने बांकी हिन्दुओं के हिंदुत्व को बचा लिया ।

5) इसी कारण उन्हें “हिन्द की चादर” से भी जाना जाता है,उनके देहावसान के बाद,उनके सुयोग्य बेटे गुरु गोविन्द सिंह जी ने हिंदुत्व की रक्षा के लिए आर्मी का निर्माण किया,जो कालांतर में ‘सिख’ के नाम से जाने गए ।

6) 1739 में जब इरानी आक्रांता नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला करते हुए,हिन्दुस्तान की बहुमूल्य संपदा को लूटना शुरू कर दिया । इन हवसी आक्रमणकारियों ने करीब 2200 भारतीय महिलाओं को बंधक बना लिया.

7) सरदार जस्सा सिंह जो की सिख आर्मी के कमांडर-इन-चीफ थे,ने इन लुटेरों पर हमला करने की योजना बनायी । परन्तु उनकी सेना दुश्मन की तुलना में बहुत छोटी थी इसलिए उन्होंने आधी रात को बारह बजे हमला करने का निर्णय लिया ।

8) महज कुछ सैकड़ों की संख्या में सरदारों ने,कई हजार लुटेरों के दांत खट्टे करते हुए महिलाओं को आजाद करा दिया । सरदारों के शौर्य और वीरता से लुटेरों की नींद और चैन हराम हो गया.

9) यह क्रम नादिर शाह के बाद उसके सेनापति अहमद शाह अब्दाली के काल में भी जारी रहा । अब्दालियों और ईरानियों ने अब्दाल मार्केट में,हिन्दू औरतों को बेंचना शुरू कर दिया.सिखों ने अपनी मिडनाईट(12 बजे) में ही हमला करने की स्ट्रैटिजी जारी रखी और एक बार फिर दुश्मनों की आँखों में धुल झोंकते हुए महिलाओं को बचा लिया ।

10) सफलता पूर्वक लड़कियों और औरतों के सम्मान की रक्षा करते हुए,सिखों ने दुश्मनों और लुटेरों से अपनी इज्जत की हिफाजत की । रात 12 बजे के समय में हमला करते समय लुटेरे कहते थे “सरदारों के बारह बज गए”सरदार और सिख राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। सरदार के केश और कृपाण उसे अतुलित धैर्य और साहस से परिपूरित करते हैं ।

सरदार और सिख राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं, सरदार के केश और कृपाण उसे अतुलित धैर्य और साहस से परिपूरित करते हैं । सिख एक महान कौम है,जिसने मध्यकाल में गुलामी की काली रात में सनातन और हिन्दुस्तान को स्वयं के प्राणों की बलि देकर बचाए रखा । गुरु गोविन्द सिंह जी की प्रसिद्द उक्ति है

सवा लाख से एक लडाऊं,तब मै गुरु गोविंद सिंह कहलाऊं

ऐसी वीरता,साहस और ईमानदारी के पर्याय सरदारों को “12 बज गए” कह कर चिढाना/हँसना बेहद शर्मनाक है । उन विदेशी लुटेरों से रक्षित स्त्रियों के वंशजों द्वारा ‘लुटेरों की ही टिप्पणी’ को दोहराना अनजाने में ही सही पर,किसी देशद्रोह से कम नहीं है।
सरदारों के “12 बज गए” एक ऐसा मुहावरा है जो की उन लुटेरों के ‘गीदड़पाने’ और हमारी वीरता का पर्याय है, इसे लाफिंग मैटर के रूप में नहीं बल्कि गर्व कीजिये...
मां भारती के वीर सपूतों को शत शत नमन🙏

हजारों साल पहले ऋषियों के आविष्कार, पढ़कर आप रह जाएंगे हैरान...

आचार्य कणाद -
कणाद परमाणुशास्त्र के जनक माने जाते हैं।
आधुनिक दौर में अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन के
भी हजारों साल पहले आचार्य कणाद ने यह
रहस्य उजागर किया कि द्रव्य के परमाणु होते
हैं।

भास्कराचार्य -
आधुनिक युग में धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति
(पदार्थों को अपनी ओर खींचने की शक्ति)
की खोज का श्रेय न्यूटन को दिया जाता है।
किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुत्वाकर्षण
का रहस्य न्यूटन से भी कई सदियों पहले
भास्कराचार्यजी ने उजागर किया।
भास्कराचार्यजी ने अपने ‘सिद्धांतशिरोमणी'
ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में
लिखा है कि ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को
विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचती है। इस
वजह से आसमानी पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’।

आचार्य चरक -
‘चरकसंहिता’ जैसा महत्तवपूर्ण आयुर्वेद ग्रंथ रचने
वाले आचार्य चरक आयुर्वेद विशेषज्ञ व ‘त्वचा
चिकित्सक’ भी बताए गए हैं। आचार्य चरक ने
शरीरविज्ञान, गर्भविज्ञान, औषधि विज्ञान
के बारे में गहन खोज की। आज के दौर की सबसे
ज्यादा होने वाली डायबिटीज, हृदय रोग व
क्षय रोग जैसी बीमारियों के निदान व
उपचार की जानकारी बरसों पहले ही उजागर
की।

भारद्वाज -
आधुनिक विज्ञान के मुताबिक राइट बंधुओं ने
वायुयान का आविष्कार किया। वहीं हिंदू
धर्म की मान्यताओं के मुताबिक कई सदियों
पहले ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र के जरिए
वायुयान को गायब करने के असाधारण विचार
से लेकर, एक ग्रह से दूसरे ग्रह व एक दुनिया से
दूसरी दुनिया में ले जाने के रहस्य उजागर किए।
इस तरह ऋषि भारद्वाज को वायुयान का
आविष्कारक भी माना जाता है।

कण्व - वैदिक कालीन ऋषियों में कण्व का
नाम प्रमुख है। इनके आश्रम में ही राजा दुष्यंत
की पत्नी शकुंतला और उनके पुत्र भरत का
पालन-पोषण हुआ था। माना जाता है कि
उसके नाम पर देश का नाम भारत हुआ। सोमयज्ञ
परंपरा भी कण्व की देन मानी जाती है।

कपिल मुनि -
भगवान विष्णु का पांचवां अवतार माने जाते
हैं। इनके पिता कर्दम ऋषि थे। इनकी माता
देवहूती ने विष्णु के समान पुत्र चाहा। इसलिए
भगवान विष्णु खुद उनके गर्भ से पैदा हुए। कपिल
मुनि 'सांख्य दर्शन' के प्रवर्तक माने जाते हैं।
इससे जुड़ा प्रसंग है कि जब उनके पिता कर्दम
संन्यासी बन जंगल में जाने लगे तो देवहूती ने खुद अकेले रह जाने की स्थिति पर दुःख जताया।
इस पर ऋषि कर्दम देवहूती को इस बारे में पुत्र से
ज्ञान मिलने की बात कही। वक्त आने पर
कपिल मुनि ने जो ज्ञान माता को दिया,
वही 'सांख्य दर्शन' कहलाता है।

इसी तरह पावन गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने के पीछे भी कपिल मुनि का शाप भी संसार के लिए कल्याणकारी बना। इससे जुड़ा प्रसंग है कि भगवान राम के पूर्वज राजा सगर ने द्वारा किए गए यज्ञ का घोड़ा इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के करीब छोड़ दिया। तब घोड़े को खोजते हुआ वहां पहुंचे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। इससे कुपित होकर मुनि ने राजा सगर के सभी पुत्रों को शाप देकर भस्म कर दिया।
बाद के कालों में राजा सगर के वंशज भगीरथ ने
घोर तपस्या कर स्वर्ग से गंगा को जमीन पर
उतारा और पूर्वजों को शापमुक्त किया।

पतंजलि -
आधुनिक दौर में जानलेवा बीमारियों में एक
कैंसर या कर्करोग का आज उपचार संभव है।
किंतु कई सदियों पहले ही ऋषि पतंजलि ने कैंसर
को रोकने वाला योगशास्त्र रचकर बताया
कि योग से कैंसर का भी उपचार संभव है।

शौनक :
वैदिक आचार्य और ऋषि शौनक ने गुरु-शिष्य
परंपरा व संस्कारों को इतना फैलाया कि उन्हें
दस हजार शिष्यों वाले गुरुकुल का कुलपति होने
का गौरव मिला। शिष्यों की यह तादाद कई
आधुनिक विश्वविद्यालयों तुलना में भी कहीं
ज्यादा थी।

महर्षि सुश्रुत -
ये शल्यचिकित्सा विज्ञान यानी सर्जरी के
जनक व दुनिया के पहले शल्यचिकित्सक
(सर्जन) माने जाते हैं। वे शल्यकर्म या आपरेशन में दक्ष थे। महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखी गई
‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के बारे
में कई अहम ज्ञान विस्तार से बताया है। इनमें
सुई, चाकू व चिमटे जैसे तकरीबन 125 से भी
ज्यादा शल्यचिकित्सा में जरूरी औजारों के
नाम और 300 तरह की शल्यक्रियाओं व उसके
पहले की जाने वाली तैयारियों, जैसे उपकरण
उबालना आदि के बारे में पूरी जानकारी बताई
गई है।
जबकि आधुनिक विज्ञान ने शल्य क्रिया की
खोज तकरीबन चार सदी पहले ही की है। माना
जाता है कि महर्षि सुश्रुत मोतियाबिंद,
पथरी, हड्डी टूटना जैसे पीड़ाओं के उपचार के
लिए शल्यकर्म यानी आपरेशन करने में माहिर थे।
यही नहीं वे त्वचा बदलने की शल्यचिकित्सा
भी करते थे।

वशिष्ठ :
वशिष्ठ ऋषि राजा दशरथ के कुलगुरु थे। दशरथ के
चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने इनसे
ही शिक्षा पाई। देवप्राणी व मनचाहा वर देने
वाली कामधेनु गाय वशिष्ठ ऋषि के पास ही
थी।

विश्वामित्र : ऋषि बनने से पहले
विश्वामित्र क्षत्रिय थे। ऋषि वशिष्ठ से
कामधेनु गाय को पाने के लिए हुए युद्ध में मिली
हार के बाद तपस्वी हो गए। विश्वामित्र ने
भगवान शिव से अस्त्र विद्या पाई। इसी कड़ी
में माना जाता है कि आज के युग में प्रचलित
प्रक्षेपास्त्र या मिसाइल प्रणाली हजारों
साल पहले विश्वामित्र ने ही खोजी थी।
ऋषि विश्वामित्र ही ब्रह्म गायत्री मंत्र के
दृष्टा माने जाते हैं। विश्वामित्र का अप्सरा
मेनका पर मोहित होकर तपस्या भंग होना भी
प्रसिद्ध है। शरीर सहित त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने
का चमत्कार भी विश्वामित्र ने तपोबल से कर
दिखाया।

महर्षि अगस्त्य -
वैदिक मान्यता के मुताबिक मित्र और वरुण
देवताओं का दिव्य तेज यज्ञ कलश में मिलने से
उसी कलश के बीच से तेजस्वी महर्षि अगस्त्य
प्रकट हुए। महर्षि अगस्त्य घोर तपस्वी ऋषि थे।
उनके तपोबल से जुड़ी पौराणिक कथा है कि
एक बार जब समुद्री राक्षसों से प्रताड़ित
होकर देवता महर्षि अगस्त्य के पास सहायता के
लिए पहुंचे तो महर्षि ने देवताओं के दुःख को दूर
करने के लिए समुद्र का सारा जल पी लिया।
इससे सारे राक्षसों का अंत हुआ।

गर्गमुनि -
गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं।
यानी सितारों की दुनिया के जानकार। ये
गर्गमुनि ही थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के
के बारे नक्षत्र विज्ञान के आधार पर जो कुछ
भी बताया, वह पूरी तरह सही साबित हुआ।
कौरव-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध
विनाशक रहा। इसके पीछे वजह यह थी कि युद्ध
के पहले पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन
अमावस थी। इसके दूसरे पक्ष में भी तिथि क्षय
थी। पूर्णिमा चौदहवें दिन आ गई और उसी दिन
चंद्रग्रहण था। तिथि-नक्षत्रों की यही
स्थिति व नतीजे गर्ग मुनिजी ने पहले बता दिए
थे।

बौद्धयन -
भारतीय त्रिकोणमितिज्ञ के रूप में जाने जाते
हैं। कई सदियों पहले ही तरह-तरह के आकार-
प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की
त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने
खोजी। दो समकोण समभुज चौकोन के
क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी,
उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन
बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के
समान के वृत्त में बदलना, इस तरह के कई मुश्किल सवालों का जवाब बौद्धयन ने आसान बनाया

बुधवार, 9 मई 2018

#उपनाम (surname) में छुपा है पूरा इतिहास

पूरे विश्व में यह वाक्य प्रचलित है, 'नाम में क्या रखा है।' सही भी है कि नाम में क्या रखा है। नाम तो कुछ भी हो सकता है, लेकिन उपनाम में सचमुच में ही कुछ न कुछ है तभी तो भाषाविदों के नेतृत्व में ब्रिटेन के ब्रिस्टल स्‍थित पश्चिमी इंग्लैंड यूनिवर्सिटी (UWE)उपनामों पर शोध के लिए लाखों पॉउंड खर्च कर रही है।

उपनामों पर शोध करके उनके पीछे के इतिहास को सार्वजनिक किया जाएगा और यह भी की उपनामों के इस डाटा को सर्चेबल सॉफ्टवेयर में डालकर सुरक्षित रखा जाएगा। उपनाम को अंग्रेजी में सरनेम (surname) कहा जाता है।

अब जब हम ब्रिटिश नागरिक की बात करते हैं जो उनमें वे भारतीय भी शामिल होते हैं जिनके पूर्वज कई वर्षों पूर्व ही ब्रिटेन में जाकर बस गए थे और जिनकी पीढ़ियाँ अब पूरी तरह से ब्रिटिश हैं। इन भारतीय ब्रिटिश नागरिकों के उपनामों पर भी शोध होगा, जिनमें शामिल है पटेल, सिंह, अहमद और स्मिथ।

भारत में तो उपनामों का समंदर है। अनगिनत उपनाम जिन्हें लिखते-लिखते शायद सुबह से शाम हो जाए। यदि उपनामों पर शोध करने लगे तो कई ऐसे उपनाम है जो हिंदू समाज के चारों वर्णों में एक जैसे पाए जाते हैं। दरअसल भारतीय उपनाम ऋषिओं के नाम के आधार पर निर्मित हुए हैं। ऋषि-मुनियों के ही नाम 'गोत्र' भी बन गए। कालान्तर में जैसे-जैसे राजा-महापुरुष बढ़े उपनाम भी बढ़ते गए। कहीं-कहीं स्थानों के नाम पर उपनाम देखने को मिलते हैं। हालाँकि सारे भारतीय एक ही कुनबे के हैं, लेकिन समय सब कुछ बदलकर रख देता है।

भारत में यदि उपनाम के आधार पर किसी का इतिहास जानने जाएँगे तो हो सकता है कि कोई मुसलमान या दलित हिंदुओं के क्षत्रिय समाज से संबंध रखता हो या वह ब्राह्मणों के कुनबे का हो। लेकिन धार्मिक इतिहास के जानकारों की मानें तो सभी भारतीय किसी ऋषि, मुनि या मनु की संतानें हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ण या रंग का हो।

वंश बनी जाति : वैदिक काल में तो कोई उपनाम नहीं होते थे। स्मृति काल में वंश पर आधारित उपनाम रखे जाने लगे, जैसे पूर्व में दो ही वंश थे- सूर्यवंश और चंद्रवंश। उक्त दोनों वंशों के ही अनेकों उपवंश होते गए। यदुवंश और नागवंश दोनों चंद्रवंश के अंतर्गत माने जाते हैं। अग्निवंश, इक्ष्वाकु वंश सूर्यवंश के अंतर्गत हैं। सूर्यवंशी प्रतापी राजा इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश चला। इसी इक्ष्वाकु कुल में राजा रघु हुए जिसने रघुवंश चला।

उक्त दोनों वंशों से ही क्षत्रियों, दलितों, ब्राह्मणों और वैश्यों के अनेकों उपवंशों का निर्माण होता गया। माना जाता है कि सप्त ऋषि के नामों के आधार पर ही भारत के चारों वर्णों के लोगों के गोत्र माने जाते हैं। गोत्रों के आधार पर भी वंशों का विकास हुआ। हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध और सिख सभी किस न किसी भारतीय वंश से ही संबंध रखते हैं। यदि जातियों की बाद करें तो लगभग सभी द्रविड़ जाति के हैं। शोध बताते हैं कि आर्य कोई जाति नहीं होती थी।

बदलते उपनाम : कई ऐसे उपनाम है जो किसी व्यक्ति या समाज द्वारा प्रांत या धर्म बदलने के साथ बदल गए हैं। जैसे कश्मीर के भट्ट और धर जब इस्लाम में दीक्षित हो गए तो वे अब बट या बट्ट और डार कहलाने लगे हैं। दूसरी और चौहान, यादव और परमार उपनाम तो आप सभी ने सुना होगा। जब ये उत्तर भारतीय लोग महाराष्ट्र में जाकर बस गए तो वहाँ अब चव्हाण, जाधव और पवांर कहलाते हैं। पांडे, पांडेय और पंडिया यह तीनों उपनाम ब्राह्मणों में लगते हैं। अलग-अलग प्रांत के कारण इनका उच्चारण भी अलग हो चला।

कामन उपनाम : नाम की तरह बहुत से ऐसे उपनाम है जो सभी धर्म के लोगों में एक जैसे पाए जाते हैं जैसे पटेल, शाह, राठौर, राणा, सिंह, शर्मा, स्मिथ आदि। चौहान और ठाकुर उपनाम कुछ भारतीय ईसाई और मुसलमानों में भी पाया जाता है। बोहरा या वोहरा नाम का एक मुस्लिम समाज है और हिंदुओं में वराह और बोहरा उपनाम का प्रयोग भी होता है। दाऊदी बोहरा समाज के सभी लोग भारतीय गुजराती समाज से हैं।

स्थानों पर आधारित उपनाम : जैसे कच्छ के रहने वाले क्षत्रिय जब कच्छ से निकलकर बाहर किसी ओर स्थान पर बस गए तो उन्हें कछावत कहा जाता था। बाद में यही कछावत बिगड़कर कुशवाह हो गया। अब कुशवाह उपनाम दलितों में भी लगाया जाता है और क्षत्रियों में भी। महाराष्‍ट्र में स्थानों पर आधारित अनेकों उपनाम मिल जाएँगे जैसे जलगाँवकर, चिपलुनकर, राशिनकर, मेहकरकर आदि। दूसरे प्रांतों में भी स्थान पर आधारित उपनाम पाए जाते हैं, जैसे मांडोरिया, देवलिया, आलोटी, मालवी, मालवीय, मेवाड़ी, मेतवाड़ा, बिहारी आदि।
पदवी बने उपनाम, उपनाम बने जाति :राव, रावल, महारावल, राणा, राजराणा और महाराणा यह भी उपाधियाँ हुआ करती थी राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में। अन्य भी कई पदवियाँ है जैसे शास्त्र पढ़ने वालों को शास्त्री, सभी शास्त्रों के शिक्षक को आचार्य, दो वेदों के ज्ञाता को द्विवेदी, चार के ज्ञाता चतुर्वेदी कहलाते थे। उपाध्याय, महामहोपाध्याय उपाधियाँ भी वेदों के अध्यन या अध्याय पर आधारित होती थी। अंग्रेजों के काल में बहुत सी उपाधियाँ निर्मित हुई, जैसे मांडलिक, जमींदार, मुखिया, राय, रायबहादुर, चौधरी, पटवारी, देशमुख, चीटनीस, पटेल इत्यादि।

'ठाकुर' शब्द से कौन परिचित नहीं है। सभी जानते हैं कि ठाकुर तो क्षत्रियों में ही लगाया जाता है, लेकिन आपको जानकर शायद आश्चर्य हो कि यह ब्राह्मणों में भी लगता है। ठाकुर भी पहले कोई उपनाम नहीं होता था यह एक पदवी होती थी। लेकिन यह रुतबेदार वाली पदवी बहुत ज्यादा प्रसिद्ध हुई।खान,राय, राव, रावल, राणा, राजराणा और महाराणा यह भी उपाधियाँ या पदवी हुआ करती थी।

व्यापार पर आधारित उपनाम : भारत के सभी प्रांतों में रहने वाले सभी धर्म के कुछ लोगों का व्यापार पर आधारित उपनाम भी पाया जाता है। जैसे भारत में सोनी उपनाम बहुत प्रसिद्ध है जो सोने या सुनार का बिगड़ा रूप है। कालांतर में ये लोग सोने का धंधा करते थे तो इन्हें सुनार भी कहा जाता था। ज्यादातर लोग अब भी यही धंधा करते हैं। लुहार उपनाम से सभी परिचित हैं। गुजरात में लोहेवाला, जरीवाला आदि प्रसिद्ध है। लकड़ी का सामान बनाने वाले सुतार या सुथार उपनाम का प्रयोग करते हैं। ऐसे अनगिनत उपनाम है जो किसी न किसी व्यवसाय पर आधारित है।

भारत के प्रसिद्ध उपनाम :सिंह, ठाकुर, शर्मा, तिवारी, मिश्रा, खान, पठान, कुरैशी, शेख, स्मिथ, वर्गीस, जोशी, सिसोदिया, वाजपेयी, गाँधी, राठौर, पाटिल, पटेल, झाला, गुप्ता, अग्रवाल, जैन, शाह, चौहान, परमार, विजयवर्गीय, राजपूत, मेंडल, यादव, कर्णिक, गौड़, राय, दीक्षित, भट्टाचार्य, बनर्जी, चटर्जी, उपाध्याय, डिसूजा, अंसारी, कुशवाह, पोरवाल, भोंसले, सोलंकी, देशमुख, आपटे, प्रधान, जादौन, जायसवाल, गौतम, भटनागर, श्रीवास्तव, निगम, सक्सेना, चौपड़ा, कपूर, कुलकर्णी, चिटनीस, वाघेला, सिंघल, पिल्लई, स्वामी, नायर, सिंघम, गोस्वामी, रेड्डी, नायडू, दास, कश्यप, पुराणिक, दासगुप्ता, सेन, वर्मा, चौधरी, कोहली, दुबे, चावला, पांडे, महाजन, बोहरा, काटजू, आहूजा, नागर, भाटिया, चतुर्वेदी, चड्डा, गिल, सहगल, टुटेजा, माखिजा, नागौरी, जैदी, टेगोर, भारद्वाज, महार, कहार, सुर्यवंशी, शेखावत, राणा, कुमार, धनगर, डांगे, डांगी, अहमद, सुतार, विश्वकर्मा, पाठक, नाथ, पंडित, आर्य, खन्ना, माहेश्वरी, साहू, झा, मजूमदार आदि।

शर्मा और मिश्रा : शर्मा ब्राह्मणों का एक उपनाम है। दक्षिण भारत और असम में यह सरमा है। वक्त बहुत कुछ बदल देता है, लेकिन उपनाम व्यक्ति बदल नहीं पाता, इसीलिए बहुत से भारतीय ईसाइयों में शर्मा लगता है। जम्मू-कश्मीर के ‍कुछ मुस्लिम भी शर्मा लगाते हैं। कुछ जैन और बौद्धों में भी शर्मा लगाया जाता है। वर्तमान में भारत में शर्मा उपनाम और भी कई अन्य समाज के लोग लगाने लगे हैं। शर्मा उत्तर और पूर्वात्तर भारतीय लोग हैं‍ जिनकी बसाहट उत्तर-पश्चिम भारत से नेपाल तक रही है।

मिश्र या मिश्रा दोनों एक ही है। यह मिश्रित शब्द से बना है। मिश्र, मिश्रन, मिश्रा, मिश्री आदि। इस शब्द का प्रभाव भारत सहित विश्व के कई अन्य भागों पर भी रहा है। मूलत: यह उत्तर भारतीय ब्राह्मण होते हैं जो अब भारत के उड़ीसा और विदेश में गुयाना, त्रिनिदाद, टोबैगो और मॉरिशस में भी बहुतायत में पाए जाते हैं। इजिप्ट को मिस्र भी कहा जाता है। मिस्र के विश्व प्रसिद्द पिरामिडों को कौन नहीं जानता।

खान और पठान : चंगेज खाँ या खान का नाम आपने सुना ही होगा। वह मंगोलियाई योद्धा था उसके बाद ही खान शब्द का उपयोग भारत में किया जाने लगा। मान्यता यह भी है कि मध्य एशिया में मुलत: यह 'हान' हुआ करता था किंतु यह शब्द बिगड़कर खान हो गया।

वैसे तो खान उपनाम तुर्क से आया है जिसका अर्थ शासक, मुखिया या ठाकुर होता है। यह एक छोटे क्षेत्र का मुखिया होता है। भारत में मुगल काल में 100 भारतीय मुसलमानों या मुस्लिम परिवारों पर एक 'खान' नियुक्त किया जाता था। जब इन नियुक्त किए गए लोगों की तादात बढ़ती गई तो धीरे-धीरे जिसके जो भी उपनाम रहे हों, वह तो छूट गए अब खान ही उपनाम हो गया।

क्या संस्कृत के पठन-पाठन से ही पठान शब्द की उत्पत्ति हुई है, यह अभी शोध का विषय है। हालाँकि माना जाता है कि पख्तून का अप्रभंश है पठान। यह भी कि पख्तून जनजाति के कबिलों के समूह में से पठानों का समूह भी एक समूह था। आजकल पख्तूनों की पश्तून भाषा अफगानिस्तान के पख्तून और पाकिस्तान के बलूच इलाके में बोली जाती है। एक शहर का नाम है पठानकोट जो भारतीय पंजाब में है। वक्त बदला तो सब कछ बदल गया और अब यह कहना कि सभी पठान या तो अफगान के हैं या पंजाब के, यह कहना गलत होगा क्योंकि बहुत से भारतीयों ने तो इस्लाम ग्रहण करने के बाद पठान उपनाम लगाना शुरू कर दिया था।

सिंह इज किंग : सिंह, सिंग, सिंघ, सिंघम, सिंघल या सिन्हा सभी शब्द का उपयोग हिंदू तथा सिक्खों में किया है। मूलत: सिंह शब्द के ही बाकी सभी शब्द बिगड़े हुए रूप है। सिंह को नाम या उपनामों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, लेकिन बहुत से लोग इसका उपनाम के रूप में प्रयोग करते हैं। हालाँकि इस शब्द का इस्तेमाल क्षत्रियों के अलावा भी अन्य कई समाज के लोग करते हैं, क्योंकि यह शब्द उसी तरह है जिस तरह की कोई अपने नाम के बाद 'कुमार' या 'लाला' लगा ले। बब्बर शेर को सिंह कहा जाता है। अब तो सिंह इज किंग है।

भारत में नामों का बहुत होचपोच मामला है। बहुत से गोत्र तो उपनाम बने बैठे हैं और बहुत से उपनामों को गोत्र माना जाता है। अब जैसे 'भारद्वाज' नाम भी है, उपनाम भी है और गोत्र भी। जहाँ तक सवाल गोत्र का है तो भारद्वाज गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों चारों में लगता है। जिस किसी का भी भारद्वाज गोत्र है तो यह माना जाता है कि वह सभी ऋषि भारद्वाज की संतानें हैं। अब आप ही सोचें उनकी संतानें चारों वर्ण से हैं।

अब आप ही सोचिए यदि विदेशी शोधकर्ता भारतीय उपनामों के इतिहास या उनकी उत्पत्ति के बारे में शोध करेंगे तो गच्चा खा जाएँगे। उन्हें यहाँ ज्यादा मेहनत और पैसा खर्च करना पड़ेगा। हालाँकि यह कार्य मजेदार है और इससे हकीकत निकलकर सामने आएगी।

ओड राजपूत

ओड जाति की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा सगर के वंशज राजा ओड से है। ऐतिहासिक ग्रंथों एवं प्राचीन पौराणिक ग्रंथों के अनुसार  राजा ओड ने दक्षिण दिशा में ओड देश की स्थापना करके राज्य किया गया था और तभी से राजा ओड की जाति संतान ओड राजपूत के नाम से विख्यात हुई। वर्तमान ओडिशा राज्य ही इतिहास में वर्णित ओड देश था। सूर्यवंशी राजा ओड सगरवंशी थे और इसी वंश में राजा सगर के वंशजों के उद्धार के लिए राजा भागीरथ द्वारा गंगा मां को धरती पर अवतरण करने व अपने पूर्वजों को श्राप से मुक्त कराने के कारण इस जाति के लोग भागीरथ वंशी ओड राजपूत के नाम से जाने गए। पाठकगण कपिल मुनि के शाप से भस्म हुए राजा सगर के वंशजों की कहानी से भली-भांति अवगत होंगे। यह वंश काफी प्राचीन है और पूरे भारतवर्ष में फैला हुआ है। वंश की 3 शाखाएं हैं जो निम्नवत है। महाभारत युद्ध के पश्चात भागीरथ वंशी ओड राजपूत की शाखा गंगा वंश के नाम से प्रसिद्ध हुई ।  राजा भागीरथ द्वारा अपने पूर्वजों के उद्धार हेतु गंगा मां को पृथ्वी पर अवतरण करने के कारण ओड राजपूत की यह शाखा    गंगा वंशी राजपूत के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस वंश के अंतिम राजा भीम अनंग देव ने ओड राज्य में राजा ओड द्वारा निर्मित जगन्नाथ जी भगवान के मंदिर को बहुत बड़े भूभाग में पूर्ण भव्यता के साथ निर्मित कराया गया। इस मंदिर के बारे में पाठकों को बता दें कि रामायण के उत्तराखंड में भगवान श्रीराम ने विभीषण को भगवान जगन्नाथ जी को इक्ष्वाकु वंश का कुल देवता बताया है। पुराणों में जगन्नाथ जी भगवान  का मंदिर ओड राज्य में स्थित होना बताया गया है।  ओड राज्य में गंगा वंशी राजाओं का राज्य 15वी शताब्दी तक मिलता है। राजा भीम अनंग देव के पश्चात ओड राज्य  ओडिशा पर मुगल शासकों का आधिपत्य होना इतिहास में लिखा हुआ मिलता है। ओड देश ओडिशा पर मुगल शासकों का अधिपत्य हो जाने के पश्चात ओड राजपूतों द्वारा ओड राज्य ओडिशा को छोड़कर राजस्थान के लिए प्रस्थान किया गया इसका वर्णन हम आगे अध्याय में प्रस्तुत करते हैं। ओड देश ओडिशा पर मुगल शासकों का राज्य स्थापित हो जाने के पश्चात ओड राजपूतों के द्वारा ओड देश ओडिसा राज्य को त्यागकर राजस्थान के लिए प्रस्थान किया गया और तब राजस्थान के कुंभलगढ़  परगने में ओडा गांव की स्थापना ओड राजपूतों के द्वारा की गई और तब ओड राजपूत गहलोत वंश की शाखा के रूप में प्रतिष्ठित हुए। मेवाड़ के अनेक राजाओं के साथ ओड राजपूतों का युद्ध में प्रतिभाग करना पाया गया है। मेवाड़ के राणा महाराणा प्रताप के समय में महाराणा के साथ लाखों की संख्या में ओड  राजपूत उनके साथ युद्ध करते थे। इतिहास मैं मेवाड़ के राणा महाराणा प्रताप के साथ ओड राजपूत सैनिक पिंड बनाकर मुगलों से युद्ध किया करते थे। इनके इस प्रकार युद्ध करने के कारण ओड राजपूत की शाखा पिंडारा प्रसिद्ध हुई। महाराणा प्रताप के बाद राणा राजसिंह जब मेवाड़ की गद्दी पर बैठे तब राणा प्रताप के बाद राणा राजसिंह ही एक ऐसे राजा हुए जिन्होंने मुगलों से डटकर युद्ध किया। ऐतिहासिक ग्रंथों में लिखा है कि राणा राजसिंह का निधन कुंभलगढ़ के गांव ओड़ा में हुआ। ओड राज्य का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इतिहास में इस वंश की तीन शाखाओं का वर्णन मिलता है।    1   गंगा वंश  2  पिंडारा  3  ओड बेलदार । ओड राजपूत की इन तीनों शाखाओं का वर्णन इतिहास व ग्रंथों मैं मिलता है। राजा ओड के राज्य का वर्णन महाभारत काल के समय मैं भी मिलता है । महाभारत के समय में भारत वर्ष के समस्त राजाओं की बुलाई गई बैठक  मैं राजा ओड की उपस्थिति ओड राजवंश की उपस्थित एवं उन्नति को दर्शाती है। इतिहास एवं पौराणिक ग्रंथों के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात राजपूतों के बहुत सारे वंशों की समाप्ति का भी उल्लेख मिलता है। महाभारत का युद्ध इतना भयंकर था कि इसमें अनेकों राजवंशों को हानि उठानी पड़ी थी और कई सारे राज वंश इस युद्ध के पश्चात विलुप्त होने के कगार पर आ गए थे। 

सोमवार, 7 मई 2018

हिंदू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवतों का रहस्य...

सनातन धर्म विश्व का सबसे प्रचीन धर्म है। विशाल ज्ञान और रहस्यों से भरे इस धर्म में बहुत से कारण आज तक भी लोगों को ज्ञात नहीं है। सनातन धर्म में 4 वेद हैं, 18 पुराण हैं और भी बहुत से दिव्य ग्रंथ हैं। माना जाता है कि सनातन धर्म में 33 कोटि देवता हैं। यह शास्त्रों में बताया गया है। देवता तो 33 कोटि हैं पर लोग इन्हें 33 करोड़ मानते हैं, यहाँ लोगो को बहुत बड़ी भूल है कि वह कोटि को यहां पर करोड़ मानते हैं। आईये जानते हैं कि सच्चाई क्या है और इसका रहस्य क्या है।

सबसे पहली बात, वेद, पुराण, गीता, रामायण, महाभारत या किसी अन्य धार्मिक ग्रन्थ में ये नहीं लिखा कि हिन्दू धर्म में ३३ करोड़ देवी देवताओं हैं और यही नहीं देवियों को कहीं भी इस गिनती में शामिल नहीं किया है। धर्म ग्रंथों में ३३ करोड़ नहीं बल्कि “३३ कोटि” देवताओं (ध्यान दें, देवता न कि भगवान) का वर्णन हैं। ध्यान दें कि यहाँ “कोटि” शब्द का प्रयोग किया गया है, करोड़ का नहीं।

आज हम जिसे करोड़ कहते हैं, पुराने समय में उसे कोटि कहा जाता है। युधिष्ठिर ने ध्यूत सभा में अपने धन का वर्णन करते समय कोटि शब्द का प्रयोग किया है। आधुनिक काल के विद्वानों ने कोटि का अर्थ सीधा सीधा अनुवाद कर करोड़ कर दिया।

दरअसल यहाँ कोटि का प्रयोग ३३ करोड़ नहीं बल्कि ३३ (त्रिदशा) “प्रकार” के देवताओं के लिए किया गया है। कोटि का एक अर्थ “प्रकार” (तरह) भी होता है। उस समय जब देवताओं का वर्गीकरण किया गया तो उसे ३३ प्रकार में विभाजित किया गया जो समय के साथ अपभ्रंश होकर कब “करोड़” के रूप में प्रचलित हो गया पता ही नहीं चला।

इन ३३ कोटि (करोड़ नहीं) देवताओं को वर्णन आपको किसी भी धर्म ग्रन्थ खासकर पुराणों में मिल जाएगा।
१२ आदित्य, ८ वसु, ११ रूद्र एवं दो अश्विनी कुमार मिलकर ३३ (१३+८+११+२ = ३३) देवताओं की श्रेणी बनाते हैं।  इनका वर्णन नीचे दिया गया है:
१२ आदित्य (सभी देवताओं में मूल देवता)
धाता
मित
आर्यमा
शक्रा
वरुण
अंश
भाग
विवास्वान
पूष
सविता
त्वास्था
विष्णु
८ वसु (इंद्र और विष्णु के सहायक)
धर (पृथ्वी)
ध्रुव (नक्षत्र)
सोम (चन्द्र)
अह (अंतरिक्ष)
अनिल (वायु)
अनल (अग्नि)
प्रत्युष (सूर्य)
प्रभास (ध्यौ: यही आठवें वसु थे जिनका जन्म भीष्म के रूप में गंगा की आठवी संतान के रूप में हुआ)
११ रूद्र (भगवान शंकर के प्रमुख अनुयायी. इन्हें उनका (भगवान रूद्र) का हीं रूप माना जाता है)
हर
बहुरूप
त्रयम्बक
अपराजिता
वृषाकपि
शम्भू
कपार्दी
रेवात
मृगव्याध
शर्वा
कपाली
२ अश्विनी कुमार (इनकी गिनती जुड़वाँ भाइयों के रूप में एक साथ ही होती है जो देवताओं के राजवैध भी हैं)
नसात्या
दसरा
यहां लोगो को भ्रम रहता है कि कोटि का अर्थ करोड़ है पर यदि धर्म ग्रंथो की गहराई से जाँच की जाये तो हमें कोटि का अर्थ ‘प्रकार’ ही मिलता है। यह सभी देवताओं के प्रकार हर पुराणों में वर्णित हैं।

कोटि का अर्थ करोड़ न होकर प्रकार होता है इसके अनेक उदाहरण हमें संस्कृत साहित्य में प्राप्त होते हैं जैसे ;-”या माया मधुकैटभ;प्रमथिनी यामाहिशोन्मूलीनी याधुम्रेक्षण चंड-मुंड मथनी यारक्तबीजासिनी,शक्ति;शुम्भ-निशुम्भ दैत्य दलिनी या सिद्धि लक्ष्मी परा सा माया नवकोटीमूर्ती सहिता माम्पातु विश्वेश्वरी ” यहां नव दुर्गा के लिये नवकोटी मूर्ति का प्रयोग किया गया है |