शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

बलात्कार का आरंभ

यौन अपराध #इस्लाम की देन...

आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आई...

आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है।

तब आखिर ऐसा क्या हो गया कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है ??

~श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की पर न ही उन्होंने और न उनकी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया ।

~महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लाखों की संख्या में योद्धा मारे गए। पर किसी भी पांडव सैनिक ने किसी भी कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक न लगाया ।

अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में~

220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक "डेमेट्रियस प्रथम" ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।

~इसके बाद "युक्रेटीदस" भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने "तक्षशिला" को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।

~"डेमेट्रियस" के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक "वृहद्रथ" को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।

~"सिकंदर" ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए । इसमें युद्ध जीतने के बाद भी राजा "पुरु" की बहादुरी से प्रभावित होकर सिकंदर ने जीता हुआ राज्य पुरु को वापस दे दिया और "बेबिलोन" वापस चला गया ।

विजेता होने के बाद भी "यूनानियों" (यवनों) की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न ही "धर्म परिवर्तन" करवाया ।

~इसके बाद "शकों" ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। "सिन्ध" नदी के तट पर स्थित "मीननगर" को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी,गंधार,सिन्ध,मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं।

~इसके बाद तिब्बत के "युइशि" (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति "कुषाणों" ने "काबुल" और "कंधार" पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें "कनिष्क प्रथम" (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ।जिसका राज्य "कश्मीर से उत्तरी सिन्ध" तथा "पेशावर से सारनाथ" के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो ।

~इसके बाद "अफगानिस्तान" से होते हुए भारत तक आये "हूणों" ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा।

~इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे "नेपालवंशी" "शक्य" आदि। पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।

अब आते हैं मध्यकालीन भारत में~

जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण~

और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन ।

~सबसे पहले 711 ईस्वी में "मुहम्मद बिन कासिम" ने सिंध पर हमला करके राजा "दाहिर" को हराने के बाद उसकी दोनों "बेटियों" को "यौनदासियों" के रूप में "खलीफा" को तोहफा भेज दिया।

तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें "हारे हुए राजा की बेटियों" और "साधारण भारतीय स्त्रियों" का "जीती हुयी इस्लामी सेना" द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया ।

~फिर आया 1001 इस्वी में "गजनवी"। इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने "इस्लाम को फ़ैलाने" के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था।

"सोमनाथ के मंदिर" को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों "काफिर औरतों" का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर "बाजारों में बोलियाँ" लगाकर "जानवरों" की तरह "बेच" दिया ।

~फिर "गौरी" ने 1192 में "पृथ्वीराज चौहान" को हराने के बाद भारत में "इस्लाम का प्रकाश" फैलाने के लिए "हजारों काफिरों" को मौत के घाट उतर दिया और उसकी "फौज" ने "अनगिनत हिन्दू स्त्रियों" के साथ बलात्कार कर उनका "धर्म-परिवर्तन" करवाया।

~ये विदेशी मुस्लिम अपने साथ औरतों को लेकर नहीं आए थे।

~मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर,

~अपने हरम में "8000 रखैलें रखने वाला शाहजहाँ"।

~ इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए "मीना बाजार" लगवाने वाला "जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर"।

~मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों "काफिर महिलाओं" "(माल-ए-गनीमत)" का बेरहमी से बलात्कार किया और "जेहाद के इनाम" के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह "सिपहसालारों" में बांटा तो कभी बाजारों में "जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी" गई।

~ये असहाय और बेबस महिलाएं "हरमों" से लेकर "वेश्यालयों" तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।

~एकबार फिर से बता दूँ कि मुस्लिम "आक्रमणकारी" अपने साथ "औरतों" को लेकर नहीं आए थे।

~वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा "पराजित काफिर स्त्रियों का बलात्कार" करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे "अपनी जीत" या "जिहाद का इनाम" (माल-ए-गनीमत) मानते थे।

~केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा।

~बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया।

~गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए "दिल दहला" देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ।

~इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं।

~इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया।

~ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई।

~महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते।

~1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्टर एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों काफिर महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं।

~इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि "पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों" से "बलात्कार" किये बिना एक भी "काफिर स्त्री" वहां से वापस नहीं आ सकती थी।

~जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आ भी गयीं वो अपनी जांच करवाने से डरती थी।

~जब डॉक्टर पूछते क्यों तब ज्यादातर महिलाओं का एक ही जवाब होता था कि "हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं ये हमें भी पता नहीं"।

~विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की "नग्न यात्राएं (धिंड) "निकाली गयीं, "बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं"

~और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।

~20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया। (देखें फिल्म "पिंजर" और पढ़ें पूरा सच्चा इतिहास गूगल पर)।

~इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे।

~वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करने के बाद उनके "स्तनों को काटकर" तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।

अंत में कश्मीर की बात~

~19 जनवरी 1990~

~सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था~ "या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर "।

~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं।

~वह कहते हैं कि "मस्जिदों के लाउडस्पीकर" लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा, "निजाम-ए-मुस्तफा", 'आजादी का मतलब क्या "ला इलाहा इलल्लाह", 'कश्मीर में अगर रहना है, "अल्लाह-ओ-अकबर" कहना है।

~और 'असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ "रोअस ते बतानेव सान" जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ।

~सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे।

~सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये।

~उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके "नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया"।

~कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया।

~कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी।

~बच्चों को उनकी माँओं के सामने स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया।

~कश्मीरी काफिर महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगी।

~लेखक राहुल पंडिता उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल ख़राब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, 'मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो'।

~राहुल पंडिता के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं, "कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थे वही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे ज़हन में अब भी ताज़ा हैं।

~1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था- 'हम सब एक, तुम भागो या मरो'।

~घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे।

~कुल मिलाकर हजारों की संख्या में काफिर महिलाओं का बलात्कार किया गया।

~आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल काफिर होने की सजा मिली।

~घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे। झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए।

~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे या उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे।

~अभी हाल में ही आपलोगों ने टीवी पर "अबू बकर अल बगदादी" के जेहादियों को काफिर "यजीदी महिलाओं" को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा।

~पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा।

~बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों मार्मिक घटनाएँ सुनी होंगी।

~यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा।

~केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया।

~परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी...
बलात्कार के रूप में ।

~आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी।

~जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है ।

गुरुवार, 6 सितंबर 2018

आइए जानते हैं... साईं आखिर था कौन..?

पिछले साठ सालों से शिरडी साईं ट्रस्ट एक मुस्लिम फ़क़ीर साईं बाबा उर्फ चांदमियाँ को ना केवल हिंदू ब्राह्मण साबित करने का कुत्सित प्रयास कर रहा है बल्कि अवतार प्रमाणित करने मे लगा हुआ है।
धर्म का मूल उद्देश्य ही सत्य की खोज हैं...
उस आस्था का क्या मूल्य जो झूठ और कपट के सहारे खड़ी हुई हो... सत्य तो यह है कि मौला साई के 99% भक्तों को उनकी असलियत के बारे में कुछ मालूम ही नहीं हैं... मौला साईं के जीवन के बारे में सबसे प्रामाणिक जानकारी उनके सेवक गोविंदराव दाभोलकर की पुस्तक "साई सतचरित्र" मे मिलती हैं... यह पुस्तक स्वयं मौला साईं के द्वारा ही लिखी मानी जाती हैं क्योंकि गोविंद राव ने जब बाबा से उनकी जीवनी लिखने की आज्ञा माँगी तो बाबा ने उन्हे आशीर्वाद देते हुए कहा कि "मैं तुम्हारे अंतकरण में प्रकट होकर स्वयं ही अपनी जीवनी लिखूंगा" गोविंद राव ने मस्जिद में होने वाली घटनाओं को संकलित कर सर्वप्रथम मराठी में पुस्तक लिखी... यही वह पुस्तक है जिसके बल पर चाँदमियाँ को महिमामंडित किया गया हैं, प्रस्तुत लेख मे साईं सतचरित्र पुस्तक के उन तथ्यों को लिखा गया है जो साबित करते हैं कि साई बाबा कट्टर मुस्लिम था। इस लेख का मूल उद्देश्य सत्य को प्रकट करना हैं...
1 :: साई बाबा सारा जीवन मस्जिद में रहें। ( पुस्तक में हर जगह इस बात का उल्लेख है)
नोट :: मौला साई लगभग पेंसठ वर्ष तक शिर्डी मे रहें पर एक भी रात उन्होोंने किसी हिंदू मंदिर मे नहीं गुज़ारी..!
2 :: "अल्लाह मालिक" सदा उनके ज़ुबान पर था, वो सदा अल्लाह मालिक पुकारते रहते... ( पूरी पुस्तक में जगह-जगह इस बात का उल्लेख है)
नोट :: मौला साई के मुख से कभी 'जय श्रीराम, हर हर महादेव या जय माता दी' नहीं निकलता था, ना ही कभी वो का उच्चारण करते थे..!
3 :: रोहीला मुसलमान आठों प्रहार अपनी कर्कश आवाज़ में क़ुरान शरीफ की कल्मे पढ़ता और अल्लाह ओ अकबर के नारे लगाता... परेशान होकर जब गाँव वालों ने बाबा से उसकी शिकायत की तो उन्होंने कहा कि "वे उसकी कलमो के समक्ष उपस्थित होने का साहस करने मे असमर्थ हैं" और बाबा ने गाँव वालों को भगा दिया।( अध्याय 3 पेज 5 )
नोट :: शिरडी साईं ट्रस्ट इन्हीं मौला साईं को अखिल ब्रह्मांड नायक कहता है, जो क़ुरान की कलमो से डर गया।
4 :: तरुण फ़क़ीर को उतरते देख, म्हलसापति ने उन्हें सर्वप्रथम "आओ साईं" कहकर पुकारा...(अध्याय 5 पेज 2 )
नोट :: मौला साईं मुस्लिम फ़क़ीर थे और फ़क़िरो को अरबी और उर्दू मे साईं नाम से पुकारा जाता हैं... साईं शब्द मूल रूप से हिन्दी नहीं हैं..!
5 :: मौला साईं हमेशा कफनी पहनते थे।(अध्याय 5 पेज 6 )
नोट :: कफनी एक प्रकार का पहनावा है, जो मुस्लिम फ़क़ीर पहनते हैं।
6 :: मौला साईं सुन्नत(ख़तना) कराने के पक्ष में थे। (अध्याय 7 पेज 1 )
नोट :: सुन्नत कराना मुस्लिम धर्म की परंपरा है।
7 :: फ़क़िरो के संग बाबा माँस और मछली का सेवन भी कर लेते थे।(अध्यया 7 पेज 3)
नोट :: कोई भी हिंदू संत ऐसा घृणित काम नहीं कर सकता..!
8 :: बाबा ने कहा "मैं मस्जिद में एक बकरा हलाल करने वाला हूँ, हाज़ी सिधिक से पूछो कि उसे क्या रुचिकर होगा... बकरे का माँस, नाध या अंडकोष"(अध्याय 11 पेज 5 )
नोट :: हिंदू संत कभी स्वप्न में भी बकरा हलाल नहीं कर सकता..! न ही ऐसे वीभत्स भोजन खा सकता हैं..!
9 :: एक बार मस्जिद में एक बकरा बलि चढ़ने लाया गया, तब साईं बाबा ने काका साहेब से कहा "मैं स्वयं ही बलि चढ़ाने का कार्य करूँगा"(अध्याय 23 पेज 6)
नोट :: हिंदू संत कभी ऐसा जघ्न्य कृत्य नहीं कर सकते..!
10:: मालेगाँव के फ़क़ीर पीर मोहम्मद का साईं बाबा बहुत आदर करते, वे सदैव उन्हे अपने दाहिने ओर बैठाते... सबसे पहले वो चिलम पीते फिर बाबा को देते... बाबा के पास जो भी दक्षिणा एकत्रित होती, उसमें से रोज पचास रुपये वो पीर मोहम्म्द को देते... जब वो लौटते तो बाबा भी सौ कदम तक उनके साथ जाते...(अध्याय 23 पेज 5 )
नोट :: मौला साईं इतना सम्मान कभी किसी हिंदू संत को नहीं देते थे..! रोज पचास रुपये वो उस समय देते थे, जब बीस रुपया तोला सोना मिलता था।

11 :: एक बार बाबा के भक्त मेघा ने उन्हे गंगा जल से स्नान कराने की सोचा तो बाबा ने कहा "मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो, मैं तो एक फ़क़ीर हूँ... मुझे गंगाजल से क्या प्रायोजन(अध्याय 28 पेज 7 )
नोट :: किसी हिंदू के लिए गंगा स्नान जीवन भर का सपना होता है, गंगा जल का दर्शन भी हिंदुओं मे अति पवित्र माना जाता है।
12 :: कभी बाबा मीठे चावल बनाते और कभी माँस मिश्रित चावल(पुलाव) बनाते थे। (अध्याय 38 पेज 2)
नोट :: माँस मिश्रित चावल अर्थात मटन बिरयानी सिर्फ़ मुस्लिम फ़क़ीर ही खा सकता हैं, कोई हिंदू संत उसे देखना भी पसंद नहीं करेगा।
13 :: एक एकादशी को बाबा ने दादा केलकर को कुछ रुपये देकर कुछ माँस खरीद कर लाने को कहा...(अध्याय 38 पेज 3 )

नोट :: एकादशी हिंदुओं का सबसे पवित्र उपवास का दिन होता है, कई घरों में इस दिन चावल तक नहीं पकता...

14 :: जब भोजन तैयार हो जाता तो बाबा मस्जिद से बर्तन मंगाकर, मौलवी से फातिहा पढ़ने को कहते थे।(अध्याय 38 पेज 3)
नोट :: फातिहा मुस्लिम धर्म का संस्कार है।
15 :: एक बार बाबा ने दादा केलकर को माँस मिश्रित पुलाव चख कर देखने को कहा... केलकर ने मुँहदेखी कह दिया कि अच्छा हैं, तब बाबा ने केलकर की बाँह पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन मे डालकर बोले थोड़ा-सा इसमें से निकालो, अपना कट्टरपन छोड़कर चख कर देखो...(अध्याय 38 पेज 5 )
नोट :: मौला साईं ने परीक्षा लेने के नाम पर जीव हत्या कर, एक ब्राह्मण का धर्म भ्रष्ट कर दिया किंतु कभी अपने किसी मुस्लिम भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा नहीं ली।


अन्य तथ्य जो सिद्ध करते हैं, साईं बाबा मुसलमान थे।
1 :: मौला साईं का सेवक अब्दुल बाबा जो लगभग तीस साल तक बाबा के साथ मस्जिद में ही रहा, रोज बाबा को क़ुरान सुनाता था। वो कभी रामायण या गीता नहीं सुनते थे।
2 :: महाराष्ट्र मे शिर्डी साईं मंदिर में गाई जाने वाली आरती का अंश "मंदा त्वांची उदरिले, मोमीन वंशी जन्मुनी लोँका तारिले” उपरोक्त आरती में "मोमिन वंशी जन्मुनी" अर्थात् मुसलमान वंश मे जन्मे शब्द स्पष्ट आया है।(15 साल से मोमीन वंशी गा रहे हैं फिर भी मौला को ब्राह्माण बता रहे हैं)
3 :: मौला साईं ने अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले औरंगाबाद के मुस्लिम फ़क़ीर शमशूद्दीन मियाँ को दो सौ पचास रुपये भिजवाया ताकि उनका मुस्लिम रीति रिवाज़ से अंतिम संस्कार कर दिया जाएं तथा सूचना भिजवाई कि वो अल्लाह के पास जाने वाले हैं।(ये एक तरह से मृत्यु पूर्व बयान जैसा है, जिसे कोर्ट भी सच मानती है। अगर बाबा हिंदू होते तो तेरहवीं करवाते, गंगाजली करवाते...)
4 :: मौला साईं जब तक जीवित रहे, शिरडी मे सूफ़ी फ़क़ीर के नाम से ही जाने जाते थे।
5 :: मौला साईं की मृत्यु के बाद उनकी मज़ार बनाई गई थी, जो 1954 तक थी। फिर उसे समाधी मे बदल दिया गया...


हम न मौला साईं विरोधी हैं, न सांप्रदायिक हैं लेकिन हमारा प्रयास है कि चांदमियां को जानबूझकर हिन्दु न साबित किया जाएं। पिछले पचास साल से पैसा कमाने के लिए जैसा अधर्म शिरडी ट्रस्ट ने किया, वैसा इतिहास में कभी नहीं हुआ..! 


शिर्डी साईं संस्थान के झूठ :-


जिस मौला साईं के जन्म तिथि का कोई अता-पता नहीं, उनकी कपट पूर्वक राम नवमी के दिन जयंती मनाई जा रही है।

 मौला साईं हमेशा "अल्लाह मलिक" पुकारते थे, जबकि "सबका मलिक एक" नानक जी कहते थे।

जो मौला साईं जीवन भर मस्जिद में रहें, उसे मंदिर में बैठा दिया गया... जो मौला साईं व्रत उपवास के विरोधी थे, उनके नाम से साईं व्रत कथा छप रही हैं। जो मौला साईं हमेशा अल्लाह मालिक बोलते थे, उनके साथ और राम को जोड़ दिया। जो मौला साईं रोज कुरान पड़ते थे, उनके मंत्र बनाये जा रहे हैं...पुराण लिखी जा रही है।

जो मौला साईं मांसाहारी थे, उन्हें हिन्दू अवतार बनाया जा रहा है। जिस मौला साईं ने गंगा जल छूने से इंकार कर दिया, उसके नाम से यज्ञ किये जा रहे हैं... गंगा जल से अभिषेक किया जा रहा है। जो खुद निगुरा था, उसे सदगुरु बनाया जा रहा है।
जो मौला साईं खुद अनपढ़ थे, उनके नाम से गीता छापी जा रही है। मरणधर्मा व्यक्ति के मंदिर बनाना हिंदू धर्म मे पाप है। इस देश मे हज़ारों संत हुए किंतु किसी की भी मंदिर नहीं हैं। व्यास जैसे ऋषि जिन्होंने 18 पुराण लिखे, गीता लिखी।अगस्त्य, विश्वामित्र, कपिल मुनि, नारद, दत्तात्रेय, भृिगु, पाराशर, सनक, सनन्दन सनतकुमार, शौनक, वशिष्ट, वामदेव, महर्षि वाल्मीकिल, तुलसीदास, गोरखनाथ, तुकाराम, नामदेव, मीरा, एकनाथ, मुक्ताबाई, नरहरी, नामदेव, सोपान, संत रविदास, चैतन्य महाप्रभु, राम कृष्ण परमहंस आदि-आदि... कितने ही संत हुए किंतु किसी के भी जगह जगह मंदिर नहीं हैं।

बुधवार, 29 अगस्त 2018

घोड़े की टांगो से जाने महापुरुष की मृत्यु का कारण

1. घोड़े के दोनों आगे के पैर हवा मे हो तो सम्मानित व्यक्ति युद्ध मे बलिदान हुआ है।
2. घोड़े का आगे का एक पैर हवा में हो तो युद्ध में प्राप्त जख्म के कारण सम्मानित व्यक्ति की मृत्यु हुई...
3. घोड़े के चारो पैर जमीन पर हो तो प्राकृतिक कारण से व्यक्ति की मृत्यु हुई है।
4. घोड़े का बाया पैर उठा होने पर समझ लेना चाहिए कि युद्ध में उसके राजा से पहले घोड़ा शहीद हुआ था जैसे महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और प्रसिद्ध नीलवर्ण घोडा चेतक का बाया पैर सदैव स्टेच्यू में उठा होता हैं...

बुधवार, 8 अगस्त 2018

सेंधा नमक : भारत से कैसे गायब कर दिया गया...

आइये आज हम आपको बताते हैं कि नमक मुख्य कितने प्रकार होते हैं। एक होता है समुद्री नमक, दूसरा होता है सेंधा नमक (rock salt) 

सेंधा नमक बनता नहीं है, पहले से ही बना बनाया है। पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को ‘सेंधा नमक’ या ‘सैन्धव नमक’, लाहोरी नमक आदि आदि नाम से जाना जाता है, जिसका मतलब है ‘सिंध या सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ’ वहाँ नमक के बड़े-बड़े पहाड़ है, सुरंगे है। वहाँ से ये नमक आता है। मोटे-मोटे टुकड़ो में होता है। आज-कल पीसा हुआ भी आने लगा हैं। यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मदद रूप, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है। इससे पाचक रस बढ़्ते हैं। 

आप ये समुद्री नमक के चक्कर से बाहर निकले। काला नमक, सेंधा नमक प्रयोग करे क्यूंकि ये प्रकर्ति/ईश्वर का बनाया हुआ है। 

और सदैव याद रखे इंसान जरूर शैतान हो सकता है लेकिन भगवान कभी शैतान नहीं होता।

भारत मे 1930 से पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खाता था विदेशी कंपनीया भारत मे नमक के व्यापार में आज़ादी के पहले से उतरी हुई हैं, उनके कहने पर ही भारत के अँग्रेजी प्रशासन द्वारा भारत की भोली-भली जनता को आयोडिन मिलाकर समुद्री नमक खिलाया जा रहा है।

हुआ ये कि जब ग्लोबलाईसेशन के बाद बहुत-सी विदेशी कंपनियो (अनपूर्णा, कैपटन कुक) ने नमक बेचना शुरू किया, तब ये सारा खेल शुरू हुआ।


अब समझिए खेल क्या था..? 

खेल ये था कि विदेशी कंपनियो को नमक बेचना है और बहुत मोटा लाभ कमाना है और लूट मचानी है तो पूरे भारत मे एक नई बात फैलाई गई कि आओडीन युक्त नामक खाओ, आओडीन युक्त नमक खाओ... आप सबको आओडीन की कमी हो गई है। ये सेहत के लिए बहुत अच्छा है आदि-आदि बातें पूरे देश मे प्रायोजित ढंग से फैलाई गई... और जो नमक किसी जमाने मे 2 से 3 रूपये किलो में बिकता था, उसकी जगह आओडीन नमक के नाम पर सीधा भाव 8 रूपये प्रति किलो पहुँच गया... जो आज तो 20 रूपये को भी पार कर गया है।

दुनिया के 56 देशों ने अतिरिक्त आओडीन युक्त नमक 40 साल पहले Ban(प्रतिबंध) कर दिया, अमेरिका मे नहीं है, जर्मनी मे नहीं हैं, फ्रांस मे नहीं, डेन्मार्क मे नहीं, डेन्मार्क की सरकार ने 1956 मे आओडीन युक्त नमक बैन कर दिया क्यों..? उनकी सरकार ने कहा हमें आओडीन युक्त नमक खिलाया (1940 से 1956 तक ) अधिकांश लोग नपुंसक हो गए। जनसंख्या इतनी कम हो गई कि देश के खत्म होने का खतरा हो गया। उनके वैज्ञानिको ने कहा कि आओडीन युक्त नमक बंद करवाओ तो उन्होंन बैन लगाया और शुरू के दिनों में जब हमारे🇮🇳 देश मे ये आओडीन का खेल शुरू हुआ, इस देश के बेशर्म नेताओं ने कानून बना दिया कि बिना आओडीन मुक्त नमक भारत मे बिक नहीं सकता। वो कुछ समय पूर्व किसी ने कोर्ट में मुकदमा दाखिल किया और ये बैन हटाया गया।

आज से कुछ वर्ष पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खाता था, 

सब सेंधा नमक ही खाते थे।

सेंधा नमक के फ़ायदे:-

सेंधा नमक के उपयोग से रक्तचाप और बहुत ही गंभीर बीमारियों पर नियन्त्रण रहता है क्योंकि ये अम्लीय नहीं ये क्षारीय है (alkaline) क्षारीय जब अमल मे मिलती है तो वो न्यूटल हो जाता है और रक्त अमलता खत्म होते ही शरीर के 48 रोग ठीक हो जाते हैं।

ये नमक शरीर मे पूरी तरह से घुलनशील है और सेंधा नमक की शुद्धता के कारण आप एक और बात से पहचान सकते हैं कि उपवास, व्रत में सब सेंधा नमक ही खाते है। तो आप सोचिए जो समुंदरी नमक आपके उपवास को अपवित्र कर सकता है वो आपके शरीर के लिए कैसे लाभकारी हो सकता है..?

सेंधा नमक शरीर मे 97 पोषक तत्वो की कमी को पूरा करता है। इन पोषक तत्वो की कमी ना पूरी होने के कारण ही लकवे (paralysis) का अटैक आने का सबसे बढ़ा जोखिम होता है। सेंधा नमक के बारे में आयुर्वेद में बोला गया है कि यह आपको इसलिये खाना चाहिए क्योंकि सेंधा नमक वात, पित्त और कफ को दूर करता है।

यह पाचन में सहायक होता है और साथ ही इसमें पोटैशियम और मैग्नीशियम पाया जाता है जो हृदय के लिए लाभकारी होता है। यही नहीं आयुर्वेदिक औषधियों में जैसे लवण भाष्कर, पाचन चूर्ण आदि में भी प्रयोग किया जाता है।

समुद्री नमक के भयंकर नुकसान :-

ये जो समुद्री नमक है आयुर्वेद के अनुसार ये तो अपने आप में ही बहुत खतरनाक है क्योंकि कंपनियाँ इसमे अतिरिक्त आओडीन डाल रही है। अब आओडीन भी दो तरह का होता है एक तो भगवान का बनाया हुआ जो पहले से नमक मे होता है, दूसरा होता है “Industrial Iodine”  ये बहुत ही खतरनाक है। तो समुद्री नमक जो पहले से ही खतरनाक है, उसमें कंपनिया अतिरिक्त industrial iodine डाल को पूरे देश को बेच रही है। जिससे बहुत सी गंभीर बीमरिया हम लोगो को आ रही है। ये नमक मानव द्वारा फ़ैक्टरियों मे निर्मित है।

आम तौर से उपयोग में लाये जाने वाले समुद्री नमक से उच्च रक्तचाप (high BP ) डाइबिटीज़, आदि गंभीर बीमारियो का भी कारण बनता है। इसका एक कारण ये है कि ये नमक अम्लीय (acidic) होता है, जिससे रक्त अम्लता बढ़ती है और रक्त अमलता बढ्ने से ये सब 48 रोग आते है। ये नमक पानी कभी पूरी तरह नहीं घुलता हीरे (diamond ) की तरह चमकता रहता है, इसी प्रकार शरीर के अंदर जाकर भी नहीं घुलता और अंत इसी प्रकार किडनी से भी नहीं निकल पाता और पथरी का भी कारण बनता है।

ये नमक नपुंसकता और लकवा (paralysis ) का बहुत बड़ा कारण है। समुद्री नमक से सिर्फ शरीर को 4 पोषक तत्व मिलते है और बीमारिया जरूर साथ में मिल जाती है।

रिफाइण्ड नमक में 98% सोडियम क्लोराइड ही है, शरीर इसे विजातीय पदार्थ के रुप में रखता है। यह शरीर में घुलता नहीं है। इस नमक में आयोडीन को बनाये रखने के लिए Tricalcium Phosphate, Magnesium Carbonate, Sodium Alumino Silicate जैसे रसायन मिलाये जाते हैं, जो सीमेंट बनाने में भी इस्तेमाल होते है। विज्ञान के अनुसार यह रसायन शरीर में रक्त वाहिनियों को कड़ा बनाते हैं, जिससे ब्लाक्स बनने की संभावना और आक्सीजन जाने मे परेशानी होती है। जोड़ो का दर्द और गढिया, प्रोस्टेट आदि होती है। आयोडीन नमक से पानी की जरुरत ज्यादा होती है। 1 ग्राम नमक अपने से 23 गुना अधिक पानी खींचता है। यह पानी कोशिकाओ के पानी को कम करता है। इसी कारण हमें प्यास ज्यादा लगती है।

निवेदन : पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी भोजन में सेंधा नमक के ही इस्तेमाल की सलाह दी गई है। भोजन में नमक व मसाले का प्रयोग भारत, नेपाल, चीन, बंगलादेश और पाकिस्तान में अधिक होता है। आजकल बाजार में ज्यादातर समुद्री जल से तैयार नमक ही मिलता है। जबकि 1960 के दशक में देश में लाहौरी नमक मिलता था। यहां तक कि राशन की दुकानों पर भी इसी नमक का वितरण किया जाता था। स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता था। समुद्री नमक के बजाय सेंधा नमक का प्रयोग होना चाहिए।

आप इस अतिरिक्त आओडीन युक्त समुद्री नमक खाना छोड़िए और उसकी जगह सेंधा नमक खाइये... सिर्फ आयोडीन के चक्कर में समुद्री नमक खाना समझदारी नहीं है, क्योंकि जैसा हमने ऊपर बताया आओडीन हर नमक मे होता है। सेंधा नमक मे भी आओडीन होता है, बस फर्क इतना है इस सेंधा नमक मे प्राकृतिक (भगवान के द्वारा बनाया) आओडीन होता है, इसके इलावा आओडीन हमें आलू, अरवी के साथ-साथ हरी सब्जियों से भी मिल जाता है। आयोडीन लद्दाख को छोड़ कर भारत के सभी स्थानों के जल में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है।
।।साभार पूज्य स्वामी विवेकानंद जी महाराज।। 

सोमवार, 6 अगस्त 2018

जानिए बर्फ के आश्चर्यजनक लाभ

1-कड़वी दवाई खाने से पहले मुंह में बर्फ का टुकड़ा रख लें, दवाई कड़वी ही नहीं लगेगी।

2- यदि आपने बहुत ज्यादा खा लिया है और खाना पच नहीं रहा, तो थोड़ा-सा बर्फ का टुकड़ा खा ले। खाना शीघ्र पच जाएगा।

3- यदि आपके पास मेकअप का भी समय नहीं है या आपकी त्वचा ढीली पड़ती जा रही है तो एक बर्फ का छोटा-सा टुकड़ा लेकर उसे किसी कपड़े में (हो सके तो मखमल का) लपेट चेहरे पर लगाइए। इससे आपके चेहरे की त्वचा टाइट होगी और यह टुकड़ा आपकी त्वचा में ऐसा निखार ला देगा जो और कहीं नहीं मिलेगा।

4- प्लास्टिक में बर्फ का टुकड़ा लपेटकर सिर पर रखने से सिरदर्द में राहत मिलती है।

5- यदि आपको शरीर में कहीं पर भी चोट लग गई है और खून निकल रहा है तो उस जगह बर्फ मसलने से खून बहना बंद हो जाता है।

6- कांटा चुभने पर बर्फ लगाकर उस हिस्से को सुन्न कर ले, कांटा या फांस आसानी से निकल जाएगा और दर्द भी नहीं होगा।

7- अंदरुनी यानी गुम चोट लगने पर बर्फ लगाने से खून नहीं जमता व दर्द भी कम होता है।

8- नाक से खून आने पर बर्फ को कपड़े में लेकर नाक के ऊपर चारों और रखें, थोड़ी देर में खून निकलना बंद हो जाएगा।

9- धीरे-धीरे बर्फ का टुकड़ा चूसने से उल्टी बंद हो जाती है।

10- पैरों की एड़ियों में बहुत ज्यादा तीखा दर्द हो तो बर्फ की क्यूब मलने से आराम मिलेगा।

11- आंखों के काले घेरे दूर करने के लिए खीरे के रस और गुलाब जल को मिलाकर बर्फ जमा लीजिए, फिर उस टुकड़े से काले घेरों पर मालिश करे, बहुत जल्द आपकी समस्या दूर होगी। और यदि ज्यादा देर मोबाइल या कंप्यूटर चलाने के बाद आपकी आंखें दर्द कर रही हैं तो बर्फ के टुकड़े को अपनी आंखों पर रखिए, जल्द ही राहत मिलेगी।

12- यदि आइब्रो बनवाते समय दर्द होता है तो एक बर्फ का टुकड़ा आइब्रो के चारों और घिस लीजिए, इससे यह हिस्सा थोड़ी देर के लिए सुन्न हो जाएगा और आपको दर्द भी नहीं होगा। यही तरीका शरीर के किसी और हिस्से पर भी लागू कर सकते हैं।

13- बर्फ का टुकड़ा गले के बाहर धीरे-धीरे मलने से गले की खराश ठीक हो जाती है।

14- जल जाने के तुरंत बाद बर्फ का टुकड़ा जले हुए स्थान पर लगाने से छाले और जलन शांत होती है। और निशान भी गहरा नही पड़ेगा।

15- इंजेक्शन लगने पर या पैर में मोच आने पर बर्फ मलने से दर्द, सूजन व खुजली कम होती है।
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