बुधवार, 11 अगस्त 2021

मृत्यु के 14 प्रकार

रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा - 
तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा ?

रावण बोला – मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे ?

अंगद बोले, सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते - साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है।

तब अंगद ने मृत्यु के 14 प्रकार बताएं -
1. कामवश - जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।

2. वाममार्गी - जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो; नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

3. कंजूस - अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।

4. अति दरिद्र - गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र-नारायण मानकर उनकी मदद करनी चाहिए।

5. विमूढ़ - अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए भी मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।

6. अजसि - जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।

7. सदा रोगवश - जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

8. अति बूढ़ा - अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।

9. सतत क्रोधी - 24 घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।

10. अघ खानी - जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

11. तनु पोषक - ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।

12. निंदक - अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है, ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

13. परमात्म विमुख - जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।

14. श्रुति संत विरोधी - जो संत, ग्रंथ, पुराणों का विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

अतः मनुष्य को उपरोक्त चौदह दुर्गुणों से यथासंभव दूर रहकर स्वयं को मृतक समान जीवित रहन से बचाना चाहिए।

🙏🏻 जय श्री सीता राम ⛳

शनिवार, 7 अगस्त 2021

प्रश्न :- गुरु बनाना क्यों जरूरी है, भक्ति तो घर पर भी कर सकते हैं..?

उत्तर :- प्रश्न ही गलत है...

प्रश्न पर विचार करें... गुरु बनाना 
अब सोचे... आप क्या गुरु को बनायेंगे, गुरु आपको बनायेगा। आपकी बनाई चीज आपसे छोटी ही होगी, याद रखें। तो किसी को गुरु बनाने की बात छोड़े... क्योंकि अध्यात्म कि ये राह कोई सांसारिक पाने खोने का मार्ग नहीं है , संसार की शिक्षा पाने के लिए आप किसी को शिक्षक चुन सकते हो, क्योंकी वहां दुकानें लगी हैं, एजुकेशन की...

यहां तो ये सवाल खड़ा करें कि मैं कैसे खुद को इतना योग्य बनाऊं की कोई गुरु मुझे चुन लें। मैं कैसे इतना पात्र बनूं की किसी जागृत गुरु का शिष्य होने योग्य हो पाऊं।

याद रखें जब शिष्य तैयार होता हैं तो गुरु खुद आता है। रामकृष्ण तैयार थे, तब उनके गुरु तोतापुरी आए गए... मार्ग दिखाकर फिर अपनी राह निकाल लिए... 
जब विवेकानन्द तैयार थे तो परमहंस ने उनको चुन लिया।

रज्जब शादी करने घोड़ी पे चढ़ा था कि दादू का गांव में आगमन हुआ और आवाज दी... अरे रज्जब तूने गजब किया, आया था हरि भजन को और पड़त नरक की ठौर...
बात ख़तम हो गई। वहीं रज्जब गुरु शरणागति को उपलब्ध हुआ।

और प्रश्न का दूसरा हिस्सा भी गलत है, भक्ति कि नहीं जाती, हो जाती हैं। जैसे मीरा को हो गई... फिर जब सांसारिक लोग ऐसे मस्तो की मस्ती देखते हैं, तो लालच आते है कि अरे सब कुछ पाया, ऐसी मस्ती नहीं मिली..! तो क्या पता भक्ति करने से मिल जाएं।
लेकिन जब संसारी आकर्षित होकर आता है तो उन्हीं के लिए कई और लालची लोग धर्मगुरु बनकर खड़े हो जाते हैं और फिर शुरू होता हैं... मांग और आपूर्ति का बाजार, धर्म का बाजार... इसलिए इन सबसे बचें। 

भक्ति करने कराने की बात नहीं, भक्ति तो घट जाती हैं। जब संसार में दौड़ कर समझ पक जाएं कि यहां कुछ हाथ आता नहीं, माटी का पलंग ही आखिरी मंजिल है। तब भक्ति, वैराग्य या ध्यान की ओर सही कदम बढ़ेंगे और जब शुरुआत सही होगी तो उसी राह पे वो परमात्मा खुद किसी ना किसी गुरु रूप में मार्ग दिखाने आए ही जायेंगे।

🙏🏻 ॐ शांति ⛳

क्या जीवन में एक ही गुरु बनाना चाहिए..?

एक ही क्यों..? यदि ऐसी बन्दिश आप अपने पर लगाते हो तो आप तो पशुओं से भी अधम रह जाओगे। एक प्रेरक प्रसंग आपके समक्ष रख रहा हूँ।

एक बार एक महात्माजी अपने कुछ शिष्यों के सँग खेतों में से कहीं जा रहे थे। तभी उनकी नजर ऊपर आसमान में उड़ते कव्वों के एक झुण्ड पर पड़ी। उनमें से एक कौए की चोंच में एक चिड़िया थी तथा बाकी सब कौए उस कौए को चोंच मार रहे थे।अचानक उस कौए की चोंच से चिड़िया छूट गयी । अन्य कव्वों में से एक आगे बढ़ा और उस चिड़िया को लपक लिया।अब बाकी कव्वों ने उस कव्वे को चोंच मारनी शुरू कर दी ।इस बीच पहला कव्वा आहत होकर नीचे गिर पड़ा। महात्माजी उस कव्वे के पास गए और हाथ जोड़कर नमन करते हुए बोले," है कागराज! आज से आप मेरे गुरु हैं" और अपने शिष्यों से उसका उपचार करने का आदेश दिया। शिष्य आश्चर्यचकित थे कि इतने ज्ञानी गुरुजी ने एक निर्ज्ञानी कव्वे को गुरु बना लिया। कव्वे के उपचार करते हुए उन्होंने अपनी जिज्ञासा प्रकट की तो गुरुजी बोले," शिष्यों! आज इस कौए ने मुझे सिखाया है कि यदि किसी एक वस्तु के लिए एक से अधिक लोग झगड़ रहे हों तो उस वस्तु को छोड़ देना ही अच्छा है। अन्यथा आप जीवन खो दोगे और जिस उद्देश्य के लिए जीवन पाया है उसे पूर्ण न कर सकोगे। अतः जो भी हमें ज्ञान दे वह हमारा गुरु है और उसका हमें सम्मान करना चाहिए।"

इसलिए एक ही गुरु बनाकर सन्तुष्ट मत होईये। ज्ञान प्राप्ति की कोई सीमा नहीं है और मनुष्य शरीर में कोई पूर्णज्ञानी नहीं है। इसलिए जितने आपके गुरु होंगे उतने ही आप अधिक ज्ञानवान होंगे।

गुरु

अंधकार रूपी मायाजाल से प्रकाश रूपी परमार्थ पर व्यक्ति को लगाने वाले शक्ति का नाम ही गुरु है। गुरु का हर व्यक्ति के जीवन में बहुत बड़ी ही महत्व है। चाहे वो लोग सांसारिक हो चाहे सन्यासी गुरु सबको बनाना चाहिए। गुरु का महत्व इसी बात से लगाया जा सकता है कि जितने भी अवतार हुए भगवान के उन्होंने भी गुरु धारण किया है। गुरु के बिना जीवन उसी प्रकार है, जैसे पानी बिना घड़ा। भगवान शिव ने माता पार्वती से गुरु के महत्व को विस्तार से समझाया है। हर सत्कर्म में भागीदार होने से पहले दीक्षित होना जरुरी हैं। चाहे आप ईश्वर को ही क्यों न गुरु मान रहे हों।


गुरु को इसलिए मिली है ईश्वर की उपाधि

पं. शैलेंद्र शास्त्री ने बताया कि गुरु की रचना क्यों प्रभु ने की इसके पीछे भी बड़ा कारण है। सभी इंसान के कर्म इतने अच्छे नही है जो प्रभु प्रत्यक्ष सबके साथ रहे और उनका मार्गदर्शन करें। यही देखकर प्रभु से गुरु के रूप में अपने आप को प्रकट किया इसलिए गुरु और प्रभु में कोई भेद नही किया जाता। भगवान गुरु रूप में पृथ्वी पर विराजमान हैं। जो गुरु का सच्चा सेवक होता है फिर उसे किसी बात का डर नही होता। 

गुरु बनाते समय इन बातों का रखें ध्यान

जब भी किसी को गुरु बनाते है तो वो अपने अपने पंथ सम्प्रदाय अनुसार मन्त्र दीक्षा देता हैं। वो मंत्र कोई साधरण मंत्र नही होता उस मंत्र में पूरी गुरु परम्परा के सभी सिद्ध महात्मो की शक्ति समाई रहती है। ये मन्त्र किसी को भी बताया नही जाता। इसको बड़े गुप्त तरीके से गुरु अपने शिष्य के कान में फूंकता है ताकि अपने चारों और विद्यमान अदृश्य शक्तियां भी उसे सुन ना पाए। ये मंत्र हमें गुरु से अदृश्य रूप से जोड़े रखता है। गुरु मंत्र का जाप कभी भी बोलकर नही करना चाहिए।

शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

संजीवनी बूटी

हनुमान पंजा बूटी
संजीवनी एक वनस्पति का नाम है जिसका उपयोग चिकित्सा कार्य के लिये किया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम सेलाजिनेला ब्राहपटेर्सिस है और इसकी उत्पत्ति लगभग तीस अरब वर्ष पहले कार्बोनिफेरस युग से मानी जाती हैं।
लखनऊ स्थित वनस्पति अनुसंधान संस्थान में संजीवनी बूटी के जीन की पहचान पर कार्य कर रहे पाँच वनस्पति वैज्ञानिको में से एक डॉ॰ पी.एन. खरे के अनुसार संजीवनी का सम्बंध पौधों के टेरीडोफिया समूह से है, जो पृथ्वी पर पैदा होने वाले संवहनी पौधे थे। उन्होंने बताया कि नमी नहीं मिलने पर संजीवनी मुरझाकर पपड़ी जैसी हो जाती है लेकिन इसके बावजूद यह जीवित रहती है और बाद में थोड़ी सी ही नमी मिलने पर यह फिर से खिल जाती है। यह पत्थरों तथा शुष्क सतह पर भी उग सकती है। इसके इसी गुण के कारण वैज्ञानिक इस बात की गहराई से जाँच कर रहे है कि आखिर संजीवनी में ऐसा कौन सा जीन पाया जाता है जो इसे अन्य पौधों से अलग बनाता और इसे विशेष दर्जा प्रदान करता है। हालाँकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी असली पहचान भी काफी कठिन है क्योंकि जंगलों में इसके समान ही अनेक ऐसे पौधे और वनस्पतियाँ उगती है, जिनसे आसानी से धोखा खाया जा सकता है। मगर कहा जाता है कि चार इंच के आकार वाली संजीवनी लम्बाई में बढ़ने के अपेक्षा सतह पर फैलती है।

रामायण में इस औषधीय पौधे का उल्लेख मिलता है। भारत में इसकी 6 जातियां पाई जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार संजीवनी बूटी की सेलाजिनेला प्रजाति की ही थी। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला अपनी जड़ी बूटियों के खजाने के लिए विश्व विख्यात है। संजीवनी बूटी की सेलाजिनेला प्रजाति मिर्ज़ापुर के पहाड़ों में भी पाई जाती है।
सिलेजिनेला ब्रायोप्टेरिस कई महीनों तक एकदम सूखी या 'मृत' पड़ी रहती है और एक बारिश आते ही 'पुनर्जीवित' हो उठती है। डॉ. एन. के. शाह, डॉ. शर्मिष्ठा बनर्जी ने इस पर कुछ प्रयोग किए हैं और पाया है कि इसमें कुछ ऐसे अणु पाए जाते हैं, जो ऑक्सीकारक क्षति व पराबैंगनी क्षति से चूहों और कीटों की कोशिकाओं की रक्षा करते हैं तथा उनकी मरम्मत में मदद करते हैं।

मिर्ज़ापुर की स्थानीय भाषा में इसे संजीवनी बूटी के अलावा हनुमान पंजा भी कहते हैं।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

डायर नहीं..! ओडवायर को मारा था, उधम सिंह जी ने...

31 जुलाई उधम सिंह जी के शहादत दिवस पर विशेष...
लोगों में आम धारणा है कि उधम सिंह ने जनरल डायर को मारकर जलियाँवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया था, लेकिन भारत के इस सपूत ने डायर को नहीं बल्कि माइकल ओडवायर को मारा था, जो अमृतसर में बैसाखी के दिन हुए नरसंहार के समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था।

ओडवायर के आदेश पर ही जनरल डायर ने जलियाँवाला बाग में सभा कर रहे निर्दोष लोगों पर अंधाधुँध गोलियाँ बरसवाई थी। उधम सिंह इस घटना के लिए ओडवायर को जिम्मेदार मानते थे।

26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में जन्मे उधम सिंह ने जलियाँवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी। जिसे उन्होंने अपने सैकड़ों देशवासियों की सामूहिक हत्या के 21 साल बाद खुद अंग्रेजों के घर में जाकर पूरा किया।

उधम सिंह अनाथ थे। सन 1901 में उधम सिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधम सिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले।

अनाथालय में उधम सिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया और वह दुनिया में एकदम अकेले रह गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।

डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में लोगों ने ते
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन एक सभा रखी जिसमें उधम सिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे।

इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर ने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दें। इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियाँवाला बाग को घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी कर दी जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए।

जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएँ में छलाँग लगा दी। बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएँ से ही मिले।

आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी।

राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर उधम सिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओडवायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली।

उधम सिंह अपने काम को अंजाम देने के उद्देश्य से 1934 में लंदन पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक कार और एक रिवाल्वर खरीदी तथा उचित समय का इंतजार करने लगे। भारत के इस योद्धा को जिस मौके का इंतजार था, वह उन्हें 13 मार्च 1940 को उस समय मिला जब माइकल ओडवायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया।

उधम सिंह ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवाल्वर के आकार में काटा और उनमें रिवाल्वर छिपाकर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गए। सभा के अंत में मोर्चा संभालकर उन्होंने ओडवायर को निशाना बनाकर गोलियाँ दागनी शुरू कर दीं।

ओडवायर को दो गोलियाँ लगीं और वह वहीं ढेर हो गया। अदालत में उधम सिंह से पूछा गया कि जब उनके पास और भी गोलियाँ बचीं थीं, तो उन्होंने उस महिला को गोली क्यों नहीं मारी जिसने उन्हें पकड़ा था। इस पर उधम सिंह ने जवाब दिया हाँ ऐसा कर मैं भाग सकता था, लेकिन भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। 31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में उधम सिंह को फाँसी पर चढ़ा दिया गया जिसे उन्होंने हॅँसते-हँसते स्वीकार कर लिया।

उधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते...
31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उधम सिंह के अवशेष भारत को सौंप दिए। ओडवायर को जहाँ उधम सिंह ने गोली से उड़ा दिया, वहीं जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से घिर कर तड़प-तड़प कर बुरी मौत मारा गया।

किसकी मर्जी से..?

क्या औकात है तुम्हारी..?
सिवा अपने जीवन में विषाद कुंठा और असफलता का विष घोलने के अतिरिक्त...!

तुम माँ के पेट में थे... नौ महीने तक, कोई दुकान तो चलाते नहीं थे..! फिर भी जिए...
हाथ-पैर भी न थे कि भोजन कर लो, फिर भी जिए।
श्वास लेने का भी उपाय न था, फिर भी जिए।

नौ महीने माँ के पेट में तुम थे, कैसे जिए...?
तुम्हारी मर्जी क्या थी..?
किसकी मर्जी से जिए..?

फिर माँ के गर्भ से जन्म हुआ... जन्मते ही, जन्म के पहले ही माँ के स्तनों में दूध भर आया। किसकी मर्जी से..?
अभी दूध को पीनेवाला आने ही वाला है कि दूध तैयार है।
किसकी मर्जी से..?

गर्भ से बाहर होते ही तुमने कभी इसके पहले साँस नहीं ली थी, माँ के पेट में तो माँ की साँस से ही काम चलता था...
लेकिन जैसे ही तुम्हें माँ से बाहर होने का अवसर आया...
तत्क्षण तुमने साँस ली, किसने सिखाया..?
पहले कभी साँस ली नहीं थी,
किसी पाठशाला में गए नहीं थे,
किसने सिखाया कैसे साँस लो..?
किसकी मर्जी से..?

फिर कौन पचाता है तुम्हारे दूध को.. जो तुम पीते हो,
और तुम्हारे भोजन को..?
कौन उसे हड्डी-मांस में बदलता है..?

किसने तुम्हें जीवन की सारी प्रक्रियाएँ दी हैं..?
कौन जब तुम थक जाते हो, तुम्हें सुला देता है..?
और कौन जब तुम्हारी नींद पूरी हो जाती है, तुम्हें उठा देता है..?

कौन चलाता है, इन सूर्य-चंद्रमा को..?
कौन इन वृक्षों को हरा रखता है..?
कौन खिलाता है फूल...
अनंत-अनंत रंगों के और गंधों के..?

इतने विराट का आयोजन, जिस स्रोत से चल रहा है...
क्या एक तुम्हारी छोटी-सी जिंदगी, उसके सहारे न चल सकेगी..?

थोड़ा सोचो... थोड़ा ध्यान करो...

अगर इस विराट के आयोजन को तुम चलते हुए देख रहे हो,
कहीं तो कोई व्यवधान नहीं है..!
सब सुंदर चल रहा है, सुंदरतम चल रहा है;
सब बेझिझक चल रहा है।
इसलिए सीताराम-सीताराम सीताराम कहिए... 
जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए...

कर्म करो, फल की इच्छा मत करो...