शनिवार, 2 अक्टूबर 2021
क्या #शास्त्री_जी की #हत्या का रहस्य छुपाने के लिए दो और हत्याएं की गईं थी..?
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021
70 प्रकार की बीमारियों को ठीक कर देता है #चूना
बुधवार, 15 सितंबर 2021
कान छिदवाने के फायदे...
हिंदू धर्म में 16 संस्कारों में से एक #कर्ण_वेध संस्कार का उल्लेख मिलता है। इसे उपनयन संस्कार से पहले किया जाता है। विशेष मुहूर्त में कान छिदवाने के बाद उसमें सोने का तार पहना जाता है। कान पके नहीं इसके लिए हल्दी को नारियल के तेल में मिलकर तब तक लगाएं तब तक की छेद अच्छे से फ्री ना हो जाए। दोनों ही कान छिदवाना चाहिए। आओ जानते हैं कान छिदवाने के फायदे...
1. कान छिदवाने से राहु और केतु के बुरे प्रभाव का असर खत्म होता है। जीवन में आने वाले आकस्मिक संकटों का कारण राहु और केतु ही होते हैं।
2. इसे मंदा केतु जब ठीक हो जाता है तो संतान पक्ष से भी व्यक्ति को कई कठिनाई नहीं होती है। धर्म के अनुसार इससे संतान स्वस्थ, निरोगी रोग और व्याधि मुक्त रहती है।
3. केतु और चंद्र की पटती नहीं है, यदि आपने कान में चांदी पहन रखी है तो यह नुकसान दायक होगी।
4. कानों में सोना पहनने से गुरु का साथ मिल जाता है, यह जंगल में भी मंगल कर देता है। यह भी कहा जाता है कि इससे बुरी शक्तियों का प्रभाव दूर होता है और व्यक्ति दीर्घायु होता है।
5. मंदा केतु पैर, कान, रीढ़, घुटने, लिंग, किडनी और जोड़ के रोग पैदा कर सकता है। इसे मन में मतिभ्रम और हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। इससे व्यक्ति के भीतर अपराधी प्रवृत्ति भी जन्म ले सकती है। ऐसे में कान छिदवाने से से यह सभी समस्या दूर हो जाती है।
6. कान छिदवाने से मेधा शक्ति बेहतर होती है तभी तो पुराने समय में गुरुकुल जाने से पहले कान छिदवाने की परंपरा थी।
7. मान्यता अनुसार कान छिदवाने से व्यक्ति के रूप में निखार आता है।
विज्ञान के अनुसार लाभ :
1- कहते हैं कि कान छिदवाने से सुनने की क्षमता बढ़ जाती है।
2- कान छिदवाने से आंखों की रोशनी तेज होती है।
3- कान छिदने से तनाव भी कम होता है।
4- कान छिदने से लकवा जैसी गंभीर बीमारी होने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
5- पुरुषों के द्वारा कान छिदवाने से उनमें होने वाली हर्निया की बीमारी खत्म हो जाती है।
6- यह भी कहा जाता है कि पुरुषों के अंडकोष और वीर्य के संरक्षण में भी कर्णभेद का लाभ मिलता है।
7. इससे मस्तिष्क में रक्त का संचार समुचित प्रकार से होता है। इससे दिमाग तेज चलता है।
रविवार, 12 सितंबर 2021
राजनीतिक तौर पर सजग रहने का संस्कृतिक महत्व...
बुधवार, 8 सितंबर 2021
समोसे की दुकान
एक बड़ी कंपनी के गेट के सामने एक प्रसिद्ध समोसे की दुकान थी।
लंच टाइम मे अक्सर कंपनी के कर्मचारी वहां आकर समोसे खाया करते थे।
एक दिन कंपनी का एक मॅनेजर समोसे खाते-खाते समोसे वाले से मजाक के मूड में आ गए।
मॅनेजर साहब ने समोसेवाले से कहा, "यार गोपाल, तुम्हारी दुकान तुमने बहुत अच्छे से मेंटेन की हैं, लेकीन क्या तुम्हें नहीं लगता के तुम अपना समय और टॅलेंट समोसे बेचकर बर्बाद कर रहे हो..?
सोचो... अगर तुम मेरी तरह इस कंपनी में काम कर रहे होते तो आज कहा होते... हो सकता है, शायद तुम भी आज मेरी तरह मॅनेजर होते..!
इस बात पर समोसेवाले गोपाल ने बड़ा सोचा और बोला, "सर ये मेरा काम आपके काम से कही बेहतर है... 10 साल पहले जब मैं टोकरी में समोसे बेचता था, तभी आपकी जॉब लगी थी। तब मैं महीने में लगभग हजार रुपये कमाता था और आपकी पगार थी 10 हजार...
इन 10 सालों में हम दोनों ने खूब मेहनत की...
आप सुपरवाइजर से मॅनेजर बन गये...
और मैं टोकरी से इस प्रसिद्ध दुकान तक पहुंच गया...
आज आप महीना 40,000₹ कमाते हैं
और मैं महीना 20,000₹
लेकीन इस बात के लिए मैं मेरे काम को आपके काम से बेहतर नहीं कह रहा हूँ..!
ये तो मैं बच्चो के कारण कह रहा हूँ...
जरा सोचिए सर मैंने तो बहुत कम कमाई पर धंदा शुरू किया था, मगर मेरे बेटे को यह सब नहीं झेलना पडेगा... मेरी दुकान मेरे बेटे को मिलेगी। मैने जिंदगी मे जो मेहनत की हैं, उसका लाभ मेरे बच्चे उठाएंगे...
जबकी आपकी जिंदगी भर की मेहनत का लाभ, आपके मालिक के बच्चे उठाएंगे...
अब आपके बेटे को आप डिरेक्टली अपनी पोस्ट पर तो नहीं बिठा सकते ना..!
उसे भी आपकी ही तरह जीरो से शुरूआत करनी पड़ेगी... और अपने कार्यकाल के अंत मे वही पहुंच पाएंगा जहां अभी आप हो...
जबकी मेरा बेटा बिजनेस को यहां से और आगे ले जाएंगा..
और अपने कार्यकाल में हम सबसे बहुत आगे निकल जायेगा..
अब आप ही बताइये... किसका समय और टॅलेंट बर्बाद हो रहा है..?
मॅनेजर साहब ने समोसेवाले को 2 समोसे के 20 रुपये दिये और बिना कुछ बोले वहा से खिसक लिए...
सोमवार, 6 सितंबर 2021
#मरणोपरांत_परमवीरचक्र_विजेता_अब्दुल_हमीद_भी_फर्जी_निकला...
शनिवार, 4 सितंबर 2021
तो आज उर्दू हमारी राजभाषा होती...
हिंदी पखवाड़ा चल रहा है... ऐसे में एक शख्स को याद करना बेहद जरूरी है, जो नहीं होते तो आज उर्दू हमारी राजभाषा होती। वो थे - भारतेंदु हरिश्चंद्र ⛳
1192 में दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज तृतीय की पराजय के बाद से ही उत्तर में हिन्दी की स्थिति ज्यादा मजबूत नही रह गयी थी उसकी जगह फारसी ले चुकी थी। सिर्फ राजपूताना शेष था जो अब भी हिन्दी मे कार्य कर रहा था मगर धीरे धीरे वह मुगलो के हाथ मे आ गया और आधिकारिक स्तर पर हिन्दी अब बस एक समय की बात होकर रह गयी।
1757 में मुगलो की सत्ता उजड़ गयी और मराठो का प्रादुर्भाव हुआ, मराठो की राजभाषा संस्कृत तथा मराठी थी और फारसी को वे स्वीकारना नही चाहते थे। अंततः पुनः देवनागरी लिपि में हिंदुस्थानी लिखी जाने लगी, हिंदुस्थानी में हिंदी और उर्दू दोनों शब्दों का मेल था।
मगर देवनागरी का प्रयोग उस समय बहुत कठिन बात थी, इसलिए सिर्फ मराठा राजाओ और पेशवाओ को पत्र लिखते समय ही इसका प्रयोग होता था बाकी उर्दू और फारसी चलती रही। 1818 में मराठा साम्राज्य गिर गया और अंग्रेजो का शासन आया तो अंग्रेजी चरम पर पहुँच गयी।
हिन्दी पहले ही उर्दू से जूझ रही थी अब अंग्रेजी भी सिर पर खड़ी हो गयी। अंततः 9 सितंबर 1850 को वाराणसी के एक धनाढ्य अग्रवाल परिवार में भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म हुआ। 15 वर्ष के होने तक उन्होंने हिन्दी व्याकरण के सभी शब्दो को खोज लिया।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिन्दी के प्रचार के लिये पानी की तरह पैसा बहाया, हिन्दू राजाओ से अपील भी की कि वे अपने राजकार्य हिन्दी मे करे। इस बीच उन्होंने दो नाटक लिखे "अंधेर नगरी" और "भारत की दुर्दशा", ये वे लेख थे जिन्होंने हिन्दी की क्रांति में मुख्य भूमिका निभाई।
एक बार काशी नरेश ने भारतेंदु से कहा, ‘बबुआ! घर को देखकर काम करो।’ इस पर उनका उत्तर था,‘हुजूर! इस धन ने मेरे पूर्वजों को खाया है, अब मैं इसे खाऊंगा।’
इन लेखों के माध्यम से उन्होंने हिन्दू धर्म मे लोगो की आस्था पुनः जगा दी और आखिरकार 1885 में उनकी मृत्यु हो गयी। वे जब स्वर्ग सिधारे उनके पास कोई विशेष संपत्ति नही रह गयी थी हिन्दी के उत्थान में उन्होंने अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था। भारतेंदु उन्हें उपाधि मिली थी, जिसका अर्थ था भारत का चंद्रमा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद तो मानो हिन्दी कवियों का मेला लग गया, मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी ने हिन्दी को पूरे भारत मे पहचान दिला दी। 1911 में बॉलीवुड की प्रथम फ़िल्म हरिश्चंद्र आयी, दादा साहेब फाल्के ने इसकी डबिंग पूर्ण हिन्दी में करके सूर्यवंश कालीन भारत जगा दिया। आज का बॉलीवुड जो भी हो तब के बॉलीवुड ने हिन्दी प्रचार में चार चाँद लगा दिए थे।
अंततः 1947 तक वीर सावरकर, महात्मा गांधी, गुरु गोलवलकर, पंडित नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे दिग्गज नेता अपने अपने कार्यक्षेत्र में हिन्दी ला चुके थे। ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त होते ही सारे राजकार्य हिन्दी मे आरंभ हो गए, हालांकि अब फिर से इसके साथ छेड़छाड़ जारी है उर्दू शब्दो को फिर से इसमें मिलाकर एक प्रयास जारी है कि हिन्दी को कभी प्राचीन भाषा का दर्जा ना मिले।
जिस बॉलीवुड ने हिन्दी को खड़ा करने में मुख्य भूमिका निभाई उस पर अंडरवर्ल्ड का साया पड़ने लगा, अब तो ये बात फैलाई जाने लगी कि भारत के पास अपनी कोई भाषा नही थी मुगलो ने आकर पढ़ना लिखना सीखाया। बहरहाल चुनौतियां हर युग मे है, हमारा युग भारतेंदु हरिश्चंद्र जितना बुरा भी नही है। जब जब हिन्दी पर संकट मंडराएगा भारतेंदु अवश्य जन्म लेंगे।
आप बस ये ध्यान रखे कि कोई नागरिक ये ना कहे कि उर्दू भारत की मूल भाषा है या फिर हिन्दी पुरानी है तो उसमे उर्दू शब्द क्यो है? हिन्दी मे जबरदस्ती परिवर्तन किये गए है इसलिए उसका स्वरूप बिगड़ा, पृथ्वीराज के काल तक शुद्ध हिन्दी ही हमारी राष्ट्रभाषा थी।
लेखक - परख सक्सेना