शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

बेलपत्र कब और कैसे लगाएं...

बेल, बिल्व या बेलपत्र भारत में होने वाला एक फल का पेड़ है। बेल भारत के प्राचीन फलों में से एक है। बेल वृक्ष को हिन्दू धर्म में पवित्र माना जाता है। इस वृक्ष का इतिहास वैदिक काल में भी मिलता है। बेल को ‘श्रीफल’ के नाम से भी जाना जाता है। इस वृक्ष की पत्तियों का उपयोग पारम्परिक रूप से भगवान शिव को चढ़ाने के लिए किया जाता है। बेल का फल 5 से 17 सेंटीमीटर व्यास का होता हैं। इनका हल्के हरे रंग का खोल कड़ा व चिकना होता है। पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है जिसे तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है। इस गूदे में छोटे, बड़े कई बीज होते हैं। बेल विभिन्न प्रकार की बंजर भूमि (ऊसर, बीहड़, खादर, शुष्क एवं अर्धशुष्क) में उगाया जा सकने वाला एक पोषण (विटामिन-ए, बी.सी., खनिज तत्व, कार्बोहाइड्रेट) एवं औषधीय गुणों से भरपूर फल है। इससे अनेक परिरक्षित पदार्थ (शरबत, मुरब्बा) बनाया जा सकता है। इसके पेड़ प्राकृतिक रूप से भारत के अलावा दक्षिणी नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं थाईलैंड में उगते हैं।

★पौधे की उत्त्पत्ति◆●
स्कंद पुराण के अनुसार मंदार पर्वत पर माता पार्वती के पसीने की बूंदे गिरने से बेल के पेड़ की उत्पत्ति हुई थी। यह पेड़ सकारात्मक ऊर्जा का भंडार होता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में माना जाता है कि बेलपत्र से ही पूरे ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है। मान्यता है कि बेल वृक्ष में भगवान शिव, माता पार्वती, लक्ष्मी जी समेत कई देवी-देवताओं का वास होता है।

★बेलपत्र के पौधे की पूजा◆●
स्कंद पुराण के अनुसार, रविवार और द्वादशी के दिन बेलपत्र के पेड़ का पूजन करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिनों में पूजा करने से घर की दरिद्रता समाप्त हो जाती है। इसके साथ ही ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

पौधा लगाने के पहले ध्यान रखने वाली बातें◆●
बेल का पौधा उगाने से पहले इन बातों का ध्यान रखें। 
आपको गमला थोड़ा बड़ा लेना होगा क्योंकि इसका पौधा बहुत तेजी से बढ़ता है। बीज से अगर आप इसे उगा रहे हैं, तो पौधा बड़ा होने में काफी समय लेगा। पौधे की अच्छी बढ़वार के लिए मिट्टी की क्वालिटी बेहतर होना जरूरी है। बेल का पौधा जमीन पर लगाने के लिए सही समय जुलाई-अगस्त माह का है, पर गमले में आप इसे वर्षा ऋतु के अलावा वसंत ऋतु में भी लगा सकते हैं।

अगर बीज से उगा रहे हैं तो◆●
बेल फल के अंदर मिलने वाले बीजों को धोकर सुखा लीजिए। इसके बाद बीज को लगभग 12 घंटों के लिए पानी में डुबाया जाता हैं इसके बाद इन्हे सीधे खेत में या नर्सरी में बोया जाता है। बीजों को 2-3 इंच मिट्टी के नीचे गाड़ दीजिए। इसे पानी की जरूरत होगी, लेकिन कभी ओवर वॉटर ना करें। 10-12 दिनों में आप देखेंगी कि बीज से पौधा निकलना शुरू हो गया है। हालांकि, बीज से लगे पौधे को पूरा बढ़ने में 3-4 साल का समय लग सकता हैं।

अगर नर्सरी से पौधा लाते है तो◆◆
बेल पत्र का पौधा घर पर जल्दी उगाना है, तो इसे नर्सरी से खरीद कर लाये, इसे आप सरकारी नर्सरी से भी ला सकते है। हां, इसे खरीदते वक़्त आपको ये ध्यान रखना है कि लाए हुए पौधे में किसी तरह की कोई बीमारी ना हो। अगर पौधे की पत्तियां मुड़ी हुई या सफेद दिख रही हैं, तो उसे ना खरीदें। तने पर छेद नहीं होना चाहिये।

पौधा किस तरह की मिट्टी में लगाएं◆●
अगर आपको इसका पौधा उगाना है, तो आपको अच्छे से ड्रेन होने वाली मिट्टी का इस्तेमाल करना है। सूखी मिट्टी, रेत, गोबर खाद समान मात्रा में लेकर 20% इट पत्थर के टुकड़े भी मिलाये है। सरसो खली नीम खली अरंडी खली फंगीसाइड को मिलाकर मिट्टी तैयार करें। बेलपत्र के पौधे को बहुत ज्यादा फर्टिलाइजर की जरूरत नहीं होती है, इस लिए एक बार सही से खाद देने पर पूरे मौसम ग्रोथ होती रहती है। बेलपत्र एक कांटों वाला पौधा होता है और सूखा ग्रस्त इलाकों में भी उग सकता है इसलिए मिट्टी उसी हिसाब से बनानी चाहिए। बेल का वृक्ष कई प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है इसे दलदलीय, क्षारीय, पथरीली मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता है। बेल के लिए दोमट मिट्टी सर्वश्रेष्ठ है। इसके लिए मिट्टी का पी.एच. मान 5-8 होना चाहिए।

नमी और सिचाई◆●
बेलपत्र के पौधे को बार-बार पानी देने से बचे, हमेशा मिट्टी जांच कर ही पानी दे। एक बार पानी देकर 2 से 3 दिन बाद ही दुबारा पानी देने पर विचार करें। तेज गर्मियो में रोजाना पनीं दे सकते हैं।

मिट्टी की सफाई है और गुड़ाई◆●
जब बेल का पौधा छोटा होता है तब इसकी मिट्टी में खरपतवार जादा उग जाते हैं। उस समय मिट्टी की गुड़ाई करके इसकी जड़ों पर हवा लगने दे, खर पतवार को बढ़ने न दे। ये पौधे की वृद्धि में बाधा उत्पन्न करते हैं।

पौधे को घना करने के लिए◆●
बेल का पौधा जब छोटा होता है तब 1 से 2 महीने में एक बार इसे फर्टिलाइजर दिया जा सकता है। गोबर की खाद और वर्मी कम्पोस्ट ऐसे कम पानी में पनपने वाले पौधों के लिए बेस्ट होती है। मिट्टी का PH लेवल बढ़ाने के लिए आप 1 कप छाछ को एक लीटर पानी में मिलाकर भी इस पौधे में डाल सकती हैं। ध्यान रखें छाछ शुद्ध होनी चाहिए इसमें किसी भी तरह का कोई मसाला ना मिला हो। पौधे की घनी पत्तियों के लिए इसकी छंटाई बहुत जरूरी है। आपको 2 महीने में एक बार इसकी छंटाई करनी चाहिए जिससे पौधा लंबा होने पर नहीं घना होने पर ध्यान देगा।

उजाला और सूर्य प्रकाश◆●
बेल के पौधे को भरपूर सूरज की धूप चाहिए इसलिए इसे ऐसी लोकेशन पर ही रखना चाहिए जहां धूप अच्छी हो। हां, जब पौधा बहुत छोटा होता है तब दोपहर की कड़ी धूप से गर्मियों में बचाया जा सकता है। एक बार पौधा 2-3 फिट का हो गया, तो इसे कहीं भी धूप में रख दें फर्क नहीं पड़ेगा।

बीमारी से बचाव◆●
इसमें कीड़े और बीमारियां लग सकती हैं। इसके लिए बाजार से दवा खरीदकर लाने की जगह नीम ऑयल को पानी में डाइल्यूट कर इसकी पत्तियों पर महीने में एक बार छिड़काव करना ही काफी होगा। तने के रोग से बचाने के लिए तने की समय समय पर जांच करते रहे।

पौधे के औषधीय गुण◆●
बेल पत्र के पौधे को शुभ माना जाता है वह तो अलग बात है, इस पौधे में बहुत सारे औषधीय गुण भी हैं। बेल पत्र और फल दोनों ही एंटी माइक्रोबियल गुण रखते हैं। इनमें एंटीवायरल और रेडियो प्रोटेक्टिव गुण भी हैं। गर्मियों में ये शरीर को ठंडा रख सकते हैं। कुछ हद तक डायरिया की दिक्कत में भी यह मददगार साबित हो सकते हैं। बेल के फल में टैनिन, फ्लेवोनोइड्स और कुमेरिन जैसे केमिकल्स पाए जाते हैं जो प्राकृतिक रूप से सूजन कम करने में मदद करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार बेल के पत्तों का तेल त्वचा को संक्रमित करने वाले फंगस को रोकता है। साथ ही रैशेज और खुजली जैसी समस्या के भी फायदेमंद है। बेल एक कार्डियो-प्रोटेक्टिव फल है, जिसमें एंटीऑक्सिडेंट की भरपूर मात्रा पाई गई है, जो हार्ट डिजीज के जोखिम को भी कम कर सकता है।

बेल फल का उपयोग◆●
बेल एक लाभकारी फल है अत: इसके अधिकाधिक उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। कच्चे फलों को मुरब्बा एवं कैंडी, या भुनकर खाने से पेचिश, भूख न लगना एवं अन्य पेट के विकारों से छुटकारा पाया जा सकता है। और इसका उपयोग शरबत, जेम, टाफी, बेल चूर्ण बनाने में भी किया जाता है। जो कि पाचन को दुरुस्त करता है।

सोमवार, 29 जनवरी 2024

बुद्धिमान व्यक्ति के कुछ खास लक्षण...

1. ज्यादा सोचने वाले या कल्पना करने वाले लोग...

अगर आप बहुत ज्यादा सोचते हो या आप बहुत ज्यादा कल्पना करते हो। तो आप बुद्धिमान हो। अब आप कहोगे कि इस तरह तो बहुत से लोग हैं, जो हमेशा सोचते रहते हैं। एक बुद्धिमान व्यक्ति का दिमाग, एक ऐसी दुनिया की कल्पना करता है जोकि हमारी इस दुनिया से अलग हो। यानि एक ऐसी दुनिया जिसमें पेंटसी तो हो पर सच्चाई के साथ। उनकी कल्पना ऐसी होती है जैसे कि वो अपनी कल्पना में बिलकुल हकीकत को देख रहे होते हैं। पर वे यह जानते हैं कि ये कल्पना हकीकत में नहीं है।


2. खुद से बातें करना...

अगर आप सदैव स्वयं से ही बातें करते रहते हैं तो ये दिखाता है कि आपका दिमाग दूसरों से ज्यादा बुद्धिमान है। यानि आप एक जीनियस हो। जब आप स्वयं से ही बातें करते रहते हो, तो आपका दिमाग पहले से ज्यादा काम करता है। और चीजों को बेहद गहराई से सोचता है।


3. व्यंग करने वाले लोग...

सदैव दूसरों की बातों को अपोजिट करने वाले व्यक्ति, या दूसरों का हंसी-मजाक करके व्यंग करने वाले व्यक्तियों का दिमाग दूसरों से काफी ज्यादा सोचता है। दरसअल वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसा करने वाले व्यक्ति अपने दिमाग का इस्तेमाल कुछ ज्यादा ही करते हैं। और उनका दिमाग अपनी अवधारणाओं को दूसरों के सामने प्रकट कर एक्सपेक्ट होता जाता है।


4. सजने-संवरने पर ध्यान ना देने वाले लोग...

अगर आप भी सजन-संवरने और फैशन पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं, और एक ही कपड़ को बार-बार पहनते हैं। तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि आपके पास इन सब व्यर्थ की चीजों के लिए टाइम नहीं है। आप सदैव दूसरे जरूरी कामों की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं। और आपका दिमाग सदैव क्रियात्मकता की तरफ ज्यादा सोचता है।


5. एक ही समय में बहुत ज्यादा चीजों को सोचना...

अगर आप बहुत ज्यादा चीजों के बारे में एक ही समय में सोचते रहते हैं, और आप किसी एक चीज पर फोकस नहीं कर पाते हैं। तो इसका मतलब यह है कि आपका दिमाग निरंतर एक्सपेंड हो रहा है। आपका दिमाग हमेशा नई-नई चीजों को डबलप कर रहा है। और आप निरंतर ही नई-नई उपलब्धियों को हासिल करना चाहते हैं। यह लक्षण ये बताता है कि आपका दिमाग दूसरों की तुलना में कई गुना ज्यादा तेज है।


6. अत्याधिक जिज्ञासु होना...

अगर आप सदैव नई-नई चीजों को जानने के लिए जिज्ञासु रहते हैं, तो आप जान लीजिए की आपका दिमाग एवरेज से थोड़ा ज्यादा वर्क करता है। एक जीनियस व्यक्ति सदैव दूसरों की बातों को जानने के लिए जिज्ञासु रहता है। यही नहीं वह रोमांचक चीजों को जानने के लिए सदैव उतावला रहता है।


7. चीजों को भूलना...

बुद्धिमान व्यक्ति सदैव चीजों को भूल जाता है। जी हां ये बिलकुल सच है, अगर आप सदैव चीजों को भूल जाते हैं, तो ये आप बिलकुल भी ना समझें कि आपके अंदर कोई कमी है। क्योंकि एक रिसर्च में सामने आया है कि ज्यादा बुद्धिमान लोग किसी चीज को या फिर पुरानी बातों को भूल जाते हैं। और ये एक नॉर्मल बात है।


8. अपनी भावनाओं को दूसरों के सामने व्यक्त करना...

जिन व्यक्तियों का दिमाग दूसरों के मुकाबले तेज होता है, वे लोग अपनी भावनाओं को बहुत ही तीव्र तरीके से व्यक्त करते हैं। और ये लोग दूसरों की भावनाओं को बहुत ही आसानी से समझ लेते हैं। वो ये समझ लेते हैं कि दूसरे व्यक्ति के मन में उसके लिए कौन सी भावनाएं पनप रही हैं। और इतना ही नहीं बुद्धिमान व्यक्ति किसी व्यक्ति, किसी जगह या किसी वस्तु से बहुत ही मजबूत भावनाओं से जुड़ जाता है।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

भगवान श्री कृष्ण के बारे में संपूर्ण जानकारी...

🔅 जन्म तिथि ● 3228 ईसा पूर्व

🔅 मास ● भाद्रपद 

🔅दिन ● अष्टमी

🔅नक्षत्र ● रोहिणी

🔅 दिन ● बुधवार

🔅समय ● 00:00 पूर्वाह्न

🔅 वंश ● चंद्रवंशी यदुवंशी क्षत्रिय राजपूत

🔅 कुल ● चंद्रवंशी क्षत्रिय राजपूत

🔅वर्तमान में श्री कृष्ण के वंशज ● जादौन, भाटी, जाड़ेजा, चुडासमा, सरवैया, रायजादा, सलारिया, छोकर, जाधव राजपूत ही श्रीकृष्ण के वास्तविक वंशज हैं ।

🔅 श्री कृष्ण ● 125 वर्ष, 08 महीने और 07 दिन जीवित रहे।

🔅 मृत्यु तिथि ● 3102 ईसा पूर्व।

🔅जब कृष्ण 89 वर्ष के थे ● मेगा युद्ध (कुरुक्षेत्र युद्ध) हुआ। 

🔅कुरुक्षेत्र युद्ध के 36 साल बाद ● उनकी मृत्यु हो गई। 

🔅कुरुक्षेत्र युद्ध ● मृगशिरा शुक्ल एकादशी, ईसा पूर्व 3139. यानी " 3139 ईसा पूर्व" को शुरू हुआ था और " 3139 ईसा पूर्व" को समाप्त हुआ था। 

🔅 "3139 ईसा पूर्व को दोपहर 3 बजे से शाम 5 बजे के बीच एक सूर्य ग्रहण था"; जयद्रथ की मृत्यु का कारण

🔅भीष्म की मृत्यु ● (उत्तरायण की पहली एकादशी) को 3138 ईसा पूर्व में हुई थी।

🔅 जैविक पिता ● महाराज वासुदेव

🔅 जैविक माता ● माता देवकी

🔅 दत्तक पिता ● नंद 

🔅 दत्तक माता ● यशोदा

🔅 बड़े भाई ● बलराम

🔅 बहन ● सुभद्रा

🔅जन्म स्थान ● मथुरा

🔅पत्नियाँ● रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविंदा, नग्नजिती, भद्रा, लक्ष्मणा

🔅 भगवान श्रीकृष्ण के 80 पुत्र ● 

किस रानी ने किस पुत्र को जन्म दिया। 
प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुचारू, चरुगुप्त, भद्रचारू, चारुचंद्र, विचारू और चारू रुक्मिणी के पुत्र थे। साम्ब, सुमित्र, पुरुजित, शतजित, सहस्त्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ और क्रतु जाम्बवती के पुत्र थे। भानु, सुभानु, स्वरभानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, वृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु, सत्यभामा के पुत्र थे। श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शांति, दर्श, पूर्णमास और सोमक, कालिंदी के पुत्र थे। वहीं वृक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महांस, पावन, वह्नि और क्षुधि, मित्रविन्दा के पुत्र कहलाएं। जबकि प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊध्र्वग, महाशक्ति, सह, ओज और अपराजित, लक्ष्मणा की गर्भ से जन्मे थे। वीर, चन्द्र, अश्वसेन, चित्रगुप्त, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु और कुंति, सत्या के पुत्र कहलाएं और संग्रामजित, वृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक भद्रा के पुत्र थे।

🔅 बताया जाता है कि कृष्ण ने अपने जीवनकाल में केवल 4 लोगों का नरसंहार किया थी। 

⚘️(i) चानूरा ● पहलवान
⚘️(ii) कंस ● उसके मामा
⚘️(iii) शिशुपाल ● और
⚘️(iv) दंतवक्र ● उसके चचेरे भाई. 

🔅श्रीकृष्ण का विभिन्न स्थानों पर जीवन काल कृष्ण ने अपना जीवन 3 प्रमुख भागों में बिताया ● 

⚘️ व्रज लीला ● 11 वर्ष 6 महीने (बृंदावन में एक बच्चे के रूप में)

⚘️ मथुरा लीला ● 10 वर्ष 6 महीने (अपने ⁰pमामा कंस को मारने के बाद एक किशोर के रूप में )

⚘️ द्वारका लीला ● 105 वर्ष 3 माह (द्वारका में राज्य स्थापित करने के बाद

🔅श्री कृष्ण के दादा दादी के नाम ●

⚘️श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था I

⚘️श्री कृष्ण की दादी का नाम मारिषा था I

🔅 वासुदेव श्री कृष्ण के माता पिता के नाम ● 

⚘️ श्रीकृष्‍ण की माता का नाम देवकी और पिता का नाम वासुदेव था I

⚘️ परंतु श्रीकृष्‍ण का लालन-पालन माता यशोदा व पिता नंदबाबा ने किया था I

⚘️ श्रीकृष्‍ण की सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) ‘नाग’ जनजाति की कन्या थीं।

🔅 योगेश्वर श्री कृष्ण की बुआ के नाम ● 

⚘️ श्रीकृष्‍ण की बुआ का नाम कुंती और सुतासुभा था। 

⚘️ श्रीकृष्‍ण की बुआ कुंती के पांच पांडव पुत्र थे, जिनके नाम :- युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन ये माता कुंती के पुत्र थे।

⚘️ नकुल और सहदेव की माता का नाम माद्री था और दूसरी बुआ सुतासुभा के एक पुत्र का नाम शिशुपाल था।

🔅 वासुदेव श्री कृष्ण के भाई बहनों के नाम

⚘️🔅 श्री कृष्ण के बड़े भाई का नाम बलराम और अन्य भाइयो के नाम नेमिनाथ और गद था।

⚘️🔅 वासुदेव श्री कृष्ण के बदले जेल में बदली गई यशोदा की पुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं।              
        
   
⚘️🔅भगवान कृष्ण की 3 बहनें भी थीं जिनका नाम ● 

⚘️ एकानंगा (यह यशोदा की पुत्री थीं), सुभद्रा और द्रौपदी (मानस भगिनी)।           

                                
⚘️ श्रीकृष्ण का द्रौपदी से अनूठा रिश्‍ता था। दौप्रदी को श्रीकृष्‍ण अपनी बहन के समान ही मानते थे। दोनों में भाई-बहन का प्रगाढ़ संबंध था।       
                                     
⚘️भगवान कृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन से किया था।     

⚘️जैन परंपरा के मुताबिक भगवान श्री कॄष्ण के चचेरे भाई का नाम तीर्थंकर नेमिनाथ था, जो हिंदू परंपरा में घोर अंगिरस के नाम से आगे चलकर प्रसिद्ध हुये थे।

🌹🔅श्री कृष्ण के पुत्र का नाम ●

⚘️योगेश्वर श्रीकृष्ण के पुत्र का नाम साम्ब था।

⚘️श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब की पत्नी का नाम लक्ष्मणा था।

⚘️श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब की पत्नी लक्ष्मणा दुर्योधन की पुत्री थी।

🌹🔅योगेश्वर श्री कृष्ण की पत्नियों के नाम ● 

⚘️श्री कृष्ण ने 16000 राजकुमारियों को
असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था।  
                                                                                  
⚘️श्रीकृष्ण की 8 पत्नियां थीं, जिनके नाम :- रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा था।

🔅. श्री कृष्ण के सखा व सखीयो नाम
भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा सहित राधा की अष्ट सखियां भी थीं।

⚘️ उन अष्टसखियों के नाम इस प्रकार हैं। 1. ललिता 2. विशाखा 3. चित्रा 4. इंदुलेखा 5. चंपकलता 6. रंगदेवी 7. तुंगविद्या और 8. सुदेवी।

⚘️ब्रह्मवैवर्त पुराण के मताअनुसार भगवान श्रीकृष्ण की सखियों के नाम इस प्रकार से थे। 1. चन्द्रावली, 2. श्यामा, 3. शैव्या, 4. पद्या, 5. राधा, 6. ललिता, 7. विशाखा तथा 8. भद्रा।
भगवान श्रीकृष्ण के कई बाल सखा थे। जिनके नाम इस प्रकार से थे :- सुदामा, श्रीदामा, मणिभद्र, सुभद्र, भद्र, सुबाहु, सुबल, मकरन्‍द, सदानन्द, मधुमंगल, भोज, तोककृष्ण, वरूथप, मधुकंड, विशाल, रसाल, चन्द्रहास, बकुल, शारद और बुद्धिप्रकाश आदि...
उद्धव और अर्जुन बाल सखा नहीं थे, वे बाद में सखा बने थे। परन्तु बलराम उनके बड़े भाई भी थे और उनके सखा भी थे।

🔅वासुदेव श्री कृष्ण के शरीर के बारे में जानकारी ● 

⚘️हाथों में बांसुरी, सिर पर मोर मुकुट, तन पर पीले वस्‍त्र और गले में बैजयंती माला धारण करने वाले योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का रूप बड़ा ही मनोरम नजर आता है। 
भगवान श्री कृष्ण को प्रा:य लोग काला या सांवला मानते हैं परन्तु भगवान श्री कृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल थी, काला या सांवला नहीं..!

⚘️श्री कृष्ण भगवान के शरीर से एक बहुत ही मादक गंध निकलती थी, जिसको वे युद्ध काल में छुपाने का हर समय प्रयास करते रहते थे जिससे उनकी और कोई भी आकर्षित ना हो।
जब भगवान श्री कृष्ण के परम धाम जाने का समय हुआ, तब ना तो उनका एक भी बाल सफ़ेद था और ना ही उनके शरीर और उनके चहरे पर पर किसी प्रकार की बुढ़ापे को दर्शाने वाली कोई झुर्री थीं। 
भगवान श्रीकृष्ण के बाल बड़े ही घुंघराले थे और उनकी आंखें बड़ी ही मनमोहक थी।

🔅 श्री कृष्ण की शिक्षा के बारे में 

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के गुरु सांदीपनी थे, जिनका आश्रम अवंतिका (उज्जैन) में था।

⚘️इसके अलावा भगवान श्रीकृष्ण के गुरु गर्ग ऋषि, घोर अंगिरस, नेमिनाथ, वेदव्यास आदि भी बताये जाते हैं।

⚘️भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भांजे अभिमन्यु को गर्भ में शिक्षा दी थी।

🌹🔅 श्री कृष्ण के अस्त्र शस्त्रों के नाम ●                                                   

⚘️देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण के शंख का नाम पांचजन्य था, जिसका रंग गुलाबी था।
योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के पास जो रथ था, उसका नाम जैत्र था।

⚘️भगवान श्री के रथ को चलाने वाले सारथी का नाम दारुक (बाहुक) था।
श्री कृष्ण के रथ में जो घोड़े (अश्वों) थे, उनके नाम प्रकार थे :- 1. शैव्य, 2. सुग्रीव, 3, मेघपुष्प और 4. बलाहक

🔅योगेश्वर श्री कृष्ण की युद्ध कला के बारे में जानकारी 

⚘️भगवान श्री कृष्ण की सेना नारायणी सेना के नाम से जनि जाती थी।

⚘️श्री कृष्ण ने 16 वर्ष की आयु में चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों के मलयुद्ध करके उनका वध किया था। 

⚘️वासुदेव भगवान श्री कृष्ण ने कई अभियान और युद्धों का संचालन किया था, परंतु इसमें तीन युद्ध सर्वाधिक भयंकर थे। जिनमे मुख्यत: 1. महाभारत, 2. जरासंध और कालयवन के विरुद्ध 3. नरकासुर के विरुद्ध किया गया युद्ध
भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को अपनी हथेली के प्रहार से काट कर वध किया था।

⚘️श्री कृष्ण के जीवन का सबसे भयंकर द्वंद्व युद्ध सुभुद्रा की प्रतिज्ञा के कारण अर्जुन के साथ हुआ था। इस युद्ध में श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र और अर्जुन ने पाशुपतास्त्र निकाल लिए थे।
ये दोनों शस्त्र सबसे विनाशक शस्त्र मने जाते हैं। युद्ध के भयंकर परिणाम को देखते हुये देवताओं के हस्तक्षेप करने पर दोनों शांत हुए और युद्ध विराम के बाद सुलह हुई।

उज्जैन के संदीपनी आश्रम में मात्र कुछ महीनों में ही भगवान श्री कृष्ण ने अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी कर ली थी। संदीपनी आश्रम में उन्होंने 16 विद्याये और 64 कलाओं के बारे में सीखा।

🔅वासुदेव भगवान श्री कृष्ण का श्रीमद्भगवत गीता उपदेस ●

⚘️ सबसे पहले श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण सूर्य को दिया था। उसके बाद महाभारत युद्ध आरम्भ होने के ठीक पहले अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता का उपदेश दिया था, जो कालांतर बाद के श्रीमद्भगवत गीता नाम से प्रसिद्ध हुआ।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता में कर्म को प्रधान बताया... 
आएये जानते है भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता में क्या कहा...

🔅श्रीमद्भगवत गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं ●

⚘️भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता में ज्ञान योग, बुद्धि योग, कर्म योग, भक्ति योग आदि का उपदेश दिया था


⚘️श्रीमद्भगवत गीता में श्रीकृष्ण ने धेर्य, संतोष, शांति, मोक्ष, और सिद्धि को प्राप्त करने के बारे में उपदेश दिया।

⚘️तुम केवल एक आत्मा हो, तुम अपने आत्मीय स्वजन और बंधु बांधों के मोह का त्याग कर दो। तुम प्रेम से मुझ में अपना मन लगाकर कर्म करते हुये पृथ्वी पर निर्भय होकर विचरण करो।

⚘️इस संसार में जो कुछ मन से सोचा, वाणी से कहा, नेत्रों से देखा और श्रवण आदि इंद्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान माया मात्र मिथ्या है।

⚘️यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् II :- अर्थार्थ– जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं अपने स्वरूप की रचना करता हूँ


⚘️परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ :- अर्थार्थ — साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्कर्मियों का विनाश करने के लिए, और धर्म की स्थापना के लिए मैं हर युग में मानव के रूप में अवतार लेता हूँ।

⚘️कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ :- अर्थार्थ — भविष्य की चिंता किए बिना जो कर्म आप कर रहे हो, उसे पूरी दृढ़ता से करते रहना चाहिए। फल की चिंता मत करो। आपके जैसे कर्म होंगे, वैसा फल आपको निश्चित मिलेगा।
भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता के अलावा अनुगीता, उद्धव गीता के रूप में भी गीता का ज्ञान दिया था।

🔅भगवान् श्री कृष्ण ने 2 नगरों की स्थापना की थी...

⚘️द्वारिका (जिसका पहले नाम कुशावती था ) और दूसरी पांडव पुत्रों के द्वारा इंद्रप्रस्थ ( जिसका पहले नाम खांडवप्रस्थ) था।

⚘️वासुदेव भगवान श्री कृष्ण अपने अंतिम वर्षों को छोड़कर कभी भी 6 महीने से ज्यादा द्वारिका में नहीं रहें।

⚘️पौराणिक मान्यताओं अनुसार प्रभु श्री राम ने त्रेता युग में बाली को छुपकर तीर मारा था और श्री राम ने द्वापरयुग में कृष्णावतार रूप मे उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी प्रभु श्री राम ने बाली को दी थी।
            🙏🏻 जय श्री राम ⛳
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गुरुवार, 17 अगस्त 2023

खाना, भोजन और आहार में अंतर...

खाना इस्लामिक शब्द 'खान' से बना है।

'खाना' खाते खल सभी, संत करें 'आहार'
सज्जन 'भोजन' को करें, भाषा क्रिया प्रकार...

अर्थात: खाना 'दुष्ट' लोग खाते हैं, भोजन 'सज्जन' लोग करते हैं और आहार 'संत' लोग करते हैं।

1. 'खाना' खाया जाता है, 'भोजन' किया जाता है, 'आहार' लिया जाता हैं।
2. 'खाना' काँटे-चाकू से खाया जाता है, 'भोजन' एक हाथ से किया जाता है, 'आहार' दोनों हाथ से लिया जाता हैं।
3. दूसरों का पेट काटकर अपना पेट भरने को 'खाना' कहा जाता है, जीवन जीने के लिए 'भोजन' है तथा त्याग, तपस्या, संयम और साधना के लिए पेट भरना 'आहार' है‌ं। 
तो आज से हम 'सज्जन लोग' 'भोजन' करेंगे और करवाएँगे...

🙏🏻 जय सनातन ⛳ जय श्री राम 🪔

गुरुवार, 8 जून 2023

उबंटू

उबंटू एक पारंपरिक अफ्रीकी अवधारणा है। यह एक ऐसा शब्द है; जिसमें मानवता का भाव है, जो सद्भाव और सामासिकता के गुण से भरा हुआ हैं। यह एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज की चिंता करता हैं। आप पूछेगें वो कैसे..? आइये जानते हैं...
एक मानव विज्ञानी, उबंटू जनजाति की आदतों और रीति-रिवाजों का अध्ययन, इस समाज के लोगों के साथ रहकर कर रहे थे। जब उनका अध्ययन समाप्त हो गया तो वो एअरपोर्ट जाने के लिये टैक्सी का इन्तजार कर रहे थे। अपनी स्टडी के दौरान वो वहां के बच्चों के साथ घुल मिल गये थे।

जाते-जाते उस मानव विज्ञानी ने उस जनजाति के बच्चों के साथ एक खेल खेलने का प्लान बनाया।

चूँकि वह बाहर से आये थे इसलिए वह शहर से बहुत सारा कैंडी और मिठाई लेकर आये थे। उन सबको उन्होंने एक सुंदर रिबन लगी टोकरी में डाल दिया और पास ही एक पेड़ के नीचे रख दिया और बच्चों को एक लाइन दिखाते हुए कहा कि आप लोग इस लाइन के पास खड़े रहो, जैसे ही मैं कहूँगा – जाओ... तब आप लोगों को जाना है और जो सबसे पहले जायेगा, उसे पूरी टोकरी की कैंडी मिल जायेगी...

जब उन्होंने कहा, “जाओ” बच्चों के कार्यकलाप देख, वह मानव विज्ञानी दंग रह गए। सभी बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और एक समूह के रूप में टोकरी की तरफ दौड़ पड़े... सबने कैंडी लिया और एक-दूसरे के साथ मिल बांटकर मजे के साथ खाने लगे।

मानव विज्ञानी बहुत हैरान था। उसने उन बच्चों से पूछा – ‘आप लोग सब एक ही साथ क्यों गए..? जबकि शर्त के अनुसार जो पहले जाता, उसे पूरी टोकरी मिल जाती... 
एक छोटी बच्ची ने सरलतापूर्वक कहा: "हममें से कोई एक कैसे खुश हो सकता हैं..! जबकि अन्य सभी दुखी हो"

मानव विज्ञानी चुपचाप और स्तब्ध था। वह वहां उनके बीच कई महीने से रहता चला आ रहा था लेकिन उनके वास्तविक परम्परा और संस्कार का पता उसे आज चला था, वो भी बच्चों के द्वारा... वास्तव में उसे उनकी असली सार का पता चल गया था।
"उबंटू" एक नैतिक अवधारणा, एक दर्शन और जीवन का एक तरीका हैं, जो हमारे पश्चिमी पूंजीवादी समाज में फैल रही संकीर्णता और व्यक्तिवाद का विरोध करता है। उबंटू की भावना है- "सामूहिक कल्याण की कीमत पर, व्यक्तिगत लाभ नहीं उठाना" 
"उबंटू" यानी "मैं हूँ, क्योंकि हम हैं।" 

आइये हम सब भी उबंटू बोले और इसे जिए...🧑🏻‍🤝‍🧑🏻⛳