शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

भगवान रामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण



अब हम श्री राम से जुडे कुछ अहम् सबुत पेश करने जा रहे हैं........
जिसे पढ़ के नास्तिक भी सोच में पड जायेंगे की रामायण सच्ची हैं या काल्पनिक ||

भगवान रामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण >>>>
पुराने उपलब्ध प्रमाणों और राम अवतार जी के शोध और अनुशंधानों के अनुसार कुल १९५ स्थानों पर राम और सीता जी के पुख्ता प्रमाण मिले हैं जिन्हें ५ भागों में वर्णित कर रहा हूँ

१.>>>वनवास का प्रथम चरण गंगा का अंचल >>>
सबसे पहले राम जी अयोध्या से चलकर तमसा नदी (गौराघाट,फैजाबाद,उत्तर प्रदेश) को पार किया जो अयोध्या से २० किमी की दूरी पर है |
आगे बढ़ते हुए राम जी ने गोमती नदी को पर किया और श्रिंगवेरपुर (वर्त्तमान सिंगरोर,जिला इलाहाबाद )पहुंचे ...आगे 2 किलोमीटर पर गंगा जी थीं और यहाँ से सुमंत को राम जी ने वापस कर दिया |
बस यही जगह केवट प्रसंग के लिए प्रसिद्ध है |
इसके बाद यमुना नदी को संगम के निकट पार कर के राम जी चित्रकूट में प्रवेश करते हैं|
वाल्मीकि आश्रम,मंडव्य आश्रम,भारत कूप आज भी इन प्रसंगों की गाथा का गान कर रहे हैं |
भारत मिलाप के बाद राम जी का चित्रकूट से प्रस्थान ,भारत चरण पादुका लेकर अयोध्या जी वापस |
अगला पड़ाव श्री अत्रि मुनि का आश्रम

२.बनवास का द्वितीय चरण दंडक वन(दंडकारन्य)>>>
घने जंगलों और बरसात वाले जीवन को जीते हुए राम जी सीता और लक्षमण सहित सरभंग और सुतीक्षण मुनि के आश्रमों में पहुचते हैं |
नर्मदा और महानदी के अंचल में उन्होंने अपना ज्यादा जीवन बिताया ,पन्ना ,रायपुर,बस्तर और जगदलपुर में
तमाम जंगलों ,झीलों पहाड़ों और नदियों को पारकर राम जी अगस्त्य मुनि के आश्रम नाशिक पहुँचते हैं |
जहाँ उन्हें अगस्त्य मुनि, अग्निशाला में बनाये हुए अपने अशत्र शस्त्र प्रदान करते हैं |

३.वनवास का तृतीय चरण गोदावरी अंचल >>>
अगस्त्य मुनि से मिलन के पश्चात राम जी पंचवटी (पांच वट वृक्षों से घिरा क्षेत्र ) जो आज भी नाशिक में गोदावरी के तट पर है यहाँ अपना निवास स्थान बनाये |यहीं आपने तड़का ,खर और दूषण का वध किया |
यही वो "जनस्थान" है जो वाल्मीकि रामायण में कहा गया है ...आज भी स्थित है नाशिक में
जहाँ मारीच का वध हुआ वह स्थान मृग व्यघेश्वर और बानेश्वर नाम से आज भी मौजूद है नाशिक में |
इसके बाद ही सीता हरण हुआ ....जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पार हुई जो इगतपुरी तालुका नाशिक के ताकीद गाँव में मौजूद है |दूरी ५६ किमी नाशिक से |
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इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया क्यों की यहीं पर मरणसन्न जटायु ने बताया था की सम्राट दशरथ की मृत्यु हो गई है ...और राम जी ने यहाँ जटायु का अंतिम संस्कार कर के पिता और जटायु का श्राद्ध तर्पण किया था |
यद्यपि भारत ने भी अयोध्या में किया था श्राद्ध ,मानस में प्रसंग है "भरत किन्ही दस्गात्र विधाना "
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४.वनवास का चतुर्थ चरण तुंगभद्रा और कावेरी के अंचल में >>>>
सीता की तलाश में राम लक्षमण जटायु मिलन और कबंध बाहुछेद कर के ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढे ....|
रास्ते में पंपा सरोवर के पास शबरी से मुलाकात हुई और नवधा भक्ति से शबरी को मुक्ति मिली |जो आज कल बेलगाँव का सुरेवन का इलाका है और आज भी ये बेर के कटीले वृक्षों के लिए ही प्रसिद्ध है |
चन्दन के जंगलों को पार कर राम जी ऋष्यमूक की ओर बढ़ते हुए हनुमान और सुग्रीव से मिले ,सीता के आभूषण प्राप्त हुए और बाली का वध हुआ ....ये स्थान आज भी कर्णाटक के बेल्लारी के हम्पी में स्थित है |

५.बनवास का पंचम चरण समुद्र का अंचल >>>>
कावेरी नदी के किनारे चलते ,चन्दन के वनों को पार करते कोड्डीकराई पहुचे पर पुनः पुल के निर्माण हेतु रामेश्वर आये जिसके हर प्रमाण छेदुकराई में उपलब्ध है |सागर तट के तीन दिनों तक अन्वेषण और शोध के बाद राम जी ने कोड्डीकराई और छेदुकराई को छोड़ सागर पर पुल निर्माण की सबसे उत्तम स्थिति रामेश्वरम की पाई ....और चौथे दिन इंजिनियर नल और नील ने पुल बंधन का कार्य प्रारम्भ किया |
...इति शुभम

आइए जानते हैं... क्यों मनाई जाती हैं, सावन महीने की शिवरात्रि..?

सावन का महीना सनातन धर्म में देवाधिदेव भगवान शंकर की उपासना का महीना होता है। साल में दो शिवरात्रि आती हैं, एक फाल्गुन के महीने की महाशिवरात्रि कहलाती है,  इसी दिन भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए ये पर्व पूरे भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। एक शिवरात्रि सावन के महीने में आती हैं... एक समय की बात है इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर कहीं जा रहे थे, तभी दुर्वासा ऋषि उन्हें रास्ते मे मिले... दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को एक माला भेंट की जिसे घमण्ड में चूर इंद्र ने अपने ऐरावत हाथी को पहना दिया और ऐरावत ने वो माला अपनी सूंड से उतारकर पैरों से कुचल दी। जिसे देख दुर्वासा ऋषि क्रोध में भर गए और उन्होंने इंद्र को ये श्राप दिया कि तेरा राज्य नष्ट हो जाए... जिसके कारण दैत्यों ने हमला करके इंद्र का राज्य स्वर्ग उससे छीन लिया। इससे परेशान होकर, जब इंद्र विष्णु भगवान के पास गए... तब भगवान विष्णु ने इंद्र से सागर मंथन के लिए कहा... वे बोले कि देवता और असुर दोनों मिलकर सागर का मंथन करो... इस मंथन से जब अमृत निकलेगा तो उसे तुम सभी देवता पी लेना... जिससे तुम सभी अमरत्व को प्राप्त हो जाओगे और असुरों से पराजित नहीं होंगे। भगवान विष्णु इतना कहकर खुद राजा बलि के पास गए... उन्हें देखकर राजा बलि अत्यंत प्रसन्न हुए क्योंकि वे भगवान विष्णु के सच्चे भक्त थे। भगवान विष्णु ने राजा बलि के सामने सागर मंथन का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि सभी देवता और असुर मिलकर सागर मंथन करेंगे और उसमें से जो भी रत्न, अन्य सभी वस्तुएं और अमृत निकलेगा तो इन सभी वस्तुओं को देव और असुर आपस मे बांट लेंगे।विष्णु जी के द्वारा दिये गए प्रस्ताव को राजा बलि ने सहर्ष स्वीकार किया। इसके बाद वासुकी नाग की रस्सी बनाकर और मंदराचल पर्वत की मंथनी बनाकर देवों और असुरों के बीच सागर मंथन शुरू हुआ। सबसे पहले मंथन में से कालकूट नाम का महाभयंकर विष निकला जिसके प्रभाव से देवता और असुर दोनों ही बुरी तरह से विचलित हो गए... सभी की सांसें टूटने लगी। ये विष इतना ज्यादा भयंकर था कि इसका तोड़ स्वयं ब्रह्मा जी के पास भी नहीं था। जब सभी देवता और असुर इसकी ज्वाला से जलने लगे... तब ब्रह्मा जी ने शंकर भगवान का ध्यान किया। केवल वो ही ऐसे थे, जो इसका उपचार कर सकते थे। जब ब्रह्मा जी समेत सभी देवों-असुरों ने मिलकर शिवजी से विनती की तब भगवान ने सृष्टि के कल्याण के लिए इस महाभयंकर कालकूट विष का पान कर लिया, जिसकी वजह से प्रभु का कंठ नीला पड़ गया और तभी से महादेव नीलकंठ के नाम से जाने गए। सावन महीने की त्रयोदशी के दिन भगवान शंकर ने इस विष को ग्रहण किया, तभी से प्रत्येक वर्ष सावन महीने की त्रयोदशी को शिवरात्रि मनाई जाती है। चूंकि कालकूट विष इतना ज्यादा भयंकर था कि उसके प्रभाव से भगवान शिव के कंठ में जलन होने लगी और वे विचलित होकर तांडव करने लगे तब हज़ारों साल समाधि के बाद भगवान ने उस विष की ज्वाला को शांत किया। इसी कारण शिवरात्रि के दिन शिवजी को जल, दूध और दही इत्यादि चढ़ाया जाता है क्योंकि इसी दिन भगवान ने विष को अपने कण्ठ में ग्रहण किया था, उसी कालकूट विष की अग्नि के प्रभाव को कम करने और भगवान को आराम पहुंचे, इसके लिए ही भगवान को सब वस्तुए चढ़ाई जाती हैं।
                  🙌🏻  हर हर महादेव ⛳

बुधवार, 19 जुलाई 2017

कौन है पुरुष (who is a male)

कौन है पुरुष (who is a male)
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¤ भगवान की ऐसी रचना जो बचपन से ही त्याग
और समझौता करना सीखता है ।
¤ वह अपने चॉकलेटस का त्याग करता है बहन के
लिये ।
¤ वह अपने सपनो का त्याग कर माता-
पिता की खुशी के लिये उनके अनुसार कैरियर
चुनता है।
¤ वह अपनी पूरी पॉकेट मनी गर्ल फ़्रेंड के लिये
गिफ़्ट खरीदने में लगाता है ।
¤ वह अपनी पूरी जवानी बीवी-बच्चों के लिये
कमाने में लगाता है ।
¤ वह अपना भविष्य बनाने के लिये लोन लेता है
और बाकी की ज़िंदगी उस लोन को चुकाने में
लगाता है ।
¤ इन सबके बावजुद वह पूरी ज़िंदगी पत्नी,
माँ और बॉस से डांट सुनने में लगाता है ।
¤ पूरी ज़िंदगी पत्नी, माँ, बॉस और सास उस पर
कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं ।
¤ उसकी पूरी ज़िंदगी दुसरो के लियेही बीतती है

और बेचारा पुरुष
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¤ बीवी पर हाथ उठाये तो "बेशर्म" ।
¤ बीवी से मार खाये तो "बुजदिल" ।
¤ बीवी को किसी और के साथदेख कर कुछ कहे
तो "शक्की" ।
¤ चुप रहे तो "डरपोक" ।
¤ घर से बाहर रहे तो "आवारा" ।
¤ घर में रहे तो "नाकारा" ।
¤ बच्चों को डांटे तो"ज़ालिम" ।
¤ ना डांटे तो "लापरवाह" ।
¤ बीवी को नौकरी करने से रोके तो"शक्की" ।
¤ बीवी को नौकरी करने दे तो बिवी की "कमाई
खाने वाला" ।
¤ माँ की माने तो"चम्मचा" ।
¤ बीवी की माने तो "जोरु का गुलाम"।
पूरी ज़िंदगी समझौता, त्याग और संघर्ष में
बिताने के बावजुद वह अपने लिये कुछ
नहीं चाहता ।
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इसलिये पुरुष की हमेशा इज़्ज़त करें ।
पुरुष ,बेटा, भाई, बॉय फ़्रैंड, पति, दामाद,
पिता हो सकता है, जिसका जीवन हमेशा मुश्किलों से भरा हुआ है ।

आओ अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने.

यही है हमारी संस्कृति की पहचान.

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( ०१ )    दो पक्ष-

कृष्ण पक्ष ,
शुक्ल पक्ष !

( ०२ )    तीन ऋण -

देव ऋण ,
पितृ ऋण ,
ऋषि ऋण !

( ०३ )    चार युग -

सतयुग ,
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग ,
कलियुग !

( ०४ )    चार धाम -

द्वारिका ,
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी ,
रामेश्वरम धाम !

( ०५ )   चारपीठ -

शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,
शृंगेरीपीठ !

( ०६ )   चार वेद-

ऋग्वेद ,
अथर्वेद ,
यजुर्वेद ,
सामवेद !

( ०७ )   चार आश्रम -

ब्रह्मचर्य ,
गृहस्थ ,
वानप्रस्थ ,
संन्यास !

( ०८ )   चार अंतःकरण -

मन ,
बुद्धि ,
चित्त ,
अहंकार !

( ०९ )   पञ्च गव्य -

गाय का घी ,
दूध ,
दही ,
गोमूत्र ,
गोबर !

( १० )   पञ्च देव -

गणेश ,
विष्णु ,
शिव ,
देवी ,
सूर्य !

( ११ )   पंच तत्त्व -

पृथ्वी ,
जल ,
अग्नि ,
वायु ,
आकाश !

( १२ )   छह दर्शन -

वैशेषिक ,
न्याय ,
सांख्य ,
योग ,
पूर्व मिसांसा ,
दक्षिण मिसांसा !

( १३ )   सप्त ऋषि -

विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज ,
गौतम ,
अत्री ,
वशिष्ठ और कश्यप!

( १४ )   सप्त पुरी -

अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी ,
माया पुरी ( हरिद्वार ) ,
काशी ,
कांची
( शिन कांची - विष्णु कांची ) ,
अवंतिका और
द्वारिका पुरी !

( १५ )   आठ योग -

यम ,
नियम ,
आसन ,
प्राणायाम ,
प्रत्याहार ,
धारणा ,
ध्यान एवं
समािध !

( १६ )   आठ लक्ष्मी -

आग्घ ,
विद्या ,
सौभाग्य ,
अमृत ,
काम ,
सत्य ,
भोग ,एवं
योग लक्ष्मी !

( १७ )   नव दुर्गा --

शैल पुत्री ,
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा ,
कुष्मांडा ,
स्कंदमाता ,
कात्यायिनी ,
कालरात्रि ,
महागौरी एवं
सिद्धिदात्री !

( १८ )   दस दिशाएं -

पूर्व ,
पश्चिम ,
उत्तर ,
दक्षिण ,
ईशान ,
नैऋत्य ,
वायव्य ,
अग्नि
आकाश एवं
पाताल !

( १९ )   मुख्य ११ अवतार -

मत्स्य ,
कच्छप ,
वराह ,
नरसिंह ,
वामन ,
परशुराम ,
श्री राम ,
कृष्ण ,
बलराम ,
बुद्ध ,
एवं कल्कि !

( २० )   बारह मास -

चैत्र ,
वैशाख ,
ज्येष्ठ ,
अषाढ ,
श्रावण ,
भाद्रपद ,
अश्विन ,
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष ,
पौष ,
माघ ,
फागुन !

( २१ )   बारह राशी -

मेष ,
वृषभ ,
मिथुन ,
कर्क ,
सिंह ,
कन्या ,
तुला ,
वृश्चिक ,
धनु ,
मकर ,
कुंभ ,
कन्या !

( २२ )   बारह ज्योतिर्लिंग -

सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल ,
ओमकारेश्वर ,
बैजनाथ ,
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ ,
त्र्यंबकेश्वर ,
केदारनाथ ,
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !

( २३ )   पंद्रह तिथियाँ -

प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी ,
पंचमी ,
षष्ठी ,
सप्तमी ,
अष्टमी ,
नवमी ,
दशमी ,
एकादशी ,
द्वादशी ,
त्रयोदशी ,
चतुर्दशी ,
पूर्णिमा ,
अमावास्या !

( २४ )   स्मृतियां -

मनु ,
विष्णु ,
अत्री ,
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना ,
अंगीरा ,
यम ,
आपस्तम्ब ,
सर्वत ,
कात्यायन ,
ब्रहस्पति ,
पराशर ,
व्यास ,
शांख्य ,
लिखित ,
दक्ष ,
शातातप ,
वशिष्ठ !

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ॐ शाति ।।

बारिश के विषय में एक शानदार फार्मूला

कल एक बुजुर्ग ने बारिश के विषय में एक शानदार फार्मूला बताया कि
पुराने समय में जब घर से दूर जाना होता था, तो रास्ते में बारिश होगी या नहीं, यह जानने के लिए -
पहले कुछ दाने चीनी या चावल के 'कीड़ों के घर के पास या किसी पेड़ की "जड़'' में गिराया जाते थे।
अगर कीड़े या चींटियाँ वो दाने उठा कर जमीन पर रेंगते हुए जमीन के नीचे ले जाएँ, तो समझो अभी बारिश नही आएगी, जबकि अगर कीड़े वो दाने उठा कर पेड़ के ऊपर या दीवार के ऊपर की तरफ ले जाते दिखाई दें।
तो समझ लो बारिश के दिन नजदीक हैं, क्योंकि धरती के नीचे सूखे में रहने वाले ये जन्तु बारिश आने से पहले अपना घर बदल लेते हैं, और राशन भी ऊपर की तरफ ले जाते हैं । और ये बात कभी गलत साबित नही होती और आज भी लागू होती है !!🙏🏻🙏🏻🙏🏻

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

एक ही गोत्र में शादी क्यों नहीं..? वैज्ञानिक कारण...

एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम देख रहा था... उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा कि जेनेटिक बीमारी न हो, इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़ जींस" मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि नजदीकी रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नहीं हो पाता और जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस और एल्बोनिज्म होने की १००% संभावना होती हैं।

फिर मुझे बहुत ख़ुशी हुई, जब उसी कार्यक्रम में ये दिखाया गया कि आखिर हिन्दूधर्म में हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में कैसे लिखा गया हैं...

उस वैज्ञानिक ने कहा कि आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" हैं।


हिंदुओं में गोत्र का विशेष महत्व है। वेदों के अनुसार मनुष्य जाति विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य जैस महान ऋषियों की वशंज हैं।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक ऋषि की अपनी प्रतिष्ठा है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति एक ही गोत्र में शादी करते हैं तो वह एक ही परिवार के माने जाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार एक ही वंश में जन्मे लोगों का विवाह हिंदू धर्म में पाप माना जाता है। ऋषियों के अनुसार ये गौत्र परंपरा का उल्लंघन माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक गोत्र में शादी करने से विवाह दोष लगता है। गोत्र परंपरा का नाता रक्त संबंधों से होता है। ऐसे में एक ही कुल में शादी करने से न सिर्फ होने वाली संतान में शारीरिक दोष बल्कि चरित्र और मानसिक दोष भी हो सकते हैं।

एक ही गोत्र में कई अलग-अलग कुल होते हैं, इसलिए अलग-अलग समुदायों की अपनी परंपराएं हैं। कहीं 4 गोत्र टाले जाते हैं तो किसी वंश में 3 गोत्र टालने का भी नियम है। इससे विवाह में किसी तरह का दोष नहीं लगता है।

परंपराओं के अनुसार पहला गोत्र स्वयं का होता है। दूसरा मां का और तीसरा दादी का गोत्र होता है। कई लोग नानी के गोत्र का भी पालन करते हैं।

बुधवार, 12 जुलाई 2017

मुझे अच्छा लगता हैं, मर्द से मुकाबला ना करना और उससे एक दर्जा कमज़ोर रहना...

मुझे अच्छा लगता हैं, जब कहीं बाहर जाते हुए वह मुझसे कहता है "रुको, मैं तुम्हें ले जाता हूँ या मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।"
मुझे अच्छा लगता हैं, जब वह मुझसे एक कदम आगे चलता हैं। गैर महफूज़ और खतरनाक रास्ते पर उसके पीछे-पीछे उसके छोड़े हुए क़दमों के निशान पर चलते हुए एहसास होता हैं, उसे मेरा ख्याल खुद से ज्यादा हैं।
मुझे अच्छा लगता हैं, जब गहराई से ऊपर चढ़ते और ऊंचाई से ढलान की तरफ जाते हुए वह मुड़-मुड़ कर मुझे चढ़ने और उतरने में मदद देने के लिए बार-बार अपना हाथ बढ़ाता हैं।
मुझे अच्छा लगता हैं, जब किसी सफर पर जाते और वापस आते हुए सामान का सारा बोझ वह अपने दोनों कंधों और सर पर बिना हिचक किये खुद ही बढ़ कर उठा लेता है और अक्सर वज़नी चीजों को दूसरी जगह रखते वक़्त उसका यह कहना कि "तुम छोड़ दो, यह मेरा काम है।"
मुझे अच्छा लगता हैं, जब वह मेरी वजह से सर्द मौसम में सवारी गाड़ी का इंतज़ार करने के लिए खुद स्टेशन पे इंतजार  करता हैं।

मुझे अच्छा लगता हैं, जब वह मुझे ज़रूरत की हर चीज़ घर पर ही मुहैय्या कर देता है ताकि मुझे घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ बाहर जाने की दिक़्क़त ना उठानी पड़े और लोगों के नामुनासिब रावैय्यों का सामना ना करना पड़े..!
मुझे बहोत अच्छा लगता हैं, जब रात की खनकी में मेरे साथ आसमान पर तारे गिनते हुए वह मुझे ठंड लग जाने के डर से अपना कोट उतार कर मेरे कन्धों पर डाल देता हैं।
मुझे अच्छा लगता हैं, जब वह मुझे मेरे सारे गम आंसुओं में बहाने के लिए अपना मज़बूत कंधा पेश करता है और हर कदम पर अपने साथ होने का यकीन दिलाता हैं।
मुझे अच्छा लगता हैं, जब वह खराब हालात में मुझे अपनी जिम्मेदारी मान कर सहारा देने के लिए मेरे आगे ढाल की तरह खड़ा हो जाता है और कहता है "डरो मत, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा"
मुझे अच्छा लगता हैं, जब वह मुझे गैर नज़रों से महफूज़ रहने के लिए समझाया करता है और अपना हक जताते हुए कहता है कि "तुम सिर्फ मेरी हो"


लेकिन अफसोस हम में से अक्सर लड़कियां इन तमाम खुशगवार अहसास को महज मर्द से बराबरी का मुकाबला करने की वजह से खो देती हैं...
फिर۔۔۔۔
जब मर्द यह मान लेता है कि औरत उस से कम नहीं, तब वह उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाना छोड़ देता हैं। तब ऐसे खूबसूरत लम्हात एक-एक करके ज़िन्दगी से कम होते चले जाते हैं और फिर ज़िन्दगी बेरंग और बेमतलब होकर, अपनी खुशियां खो देती हैं।
मुक़ाबला आधुनिकता की इस दौड़ से निकल कर अपनी ज़िंदगी के ऐसे हसीन लम्हों का अहसास कर लीजिए...