मंगलवार, 26 सितंबर 2017

जय माँ बनभौरी ( माता भ्रामरी देवी )


 

ऐतिहासिक शक्तिपीठ माता बनभौरी धाम में माता भ्रामरी देवी की सच्चे मन से मांगी गई हर श्रद्धालु की मन्नत पूरी करती है। बनभौरी धाम में भक्तजन मन्नतों का धागा बांध कर मुरादें मांगते हैं तथा उनके पूरा होने पर फिर सिर झुकाने व दरबार में हाजिरी लगाने मां के चरणों में आते हैं।
देवताओं की सहायता के लिए देवी ने अनेक अवतार लिए। भ्रामरी देवी का अवतार लेकर देवी ने अरुण नामक दैत्य से देवताओं की रक्षा की थी। इसकी कथा इस प्रकार है - पूर्व समय की बात है। अरुण नामक दैत्य ने कठोर नियमों का पालन कर भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की... तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव प्रकट हुए और अरुण से वर मांगने को कहा... अरुण ने वर मांगा कि 'कोई युद्ध में मुझे नहीं मार सके, न किसी अस्त्र-शस्त्र से मेरी मृत्यु हो, स्त्री-पुरुष के लिए मैं अवध्य रहूं और न ही दो व चार पैर वाला प्राणी मेरा वध कर सकें, साथ ही मैं देवताओं पर विजय प्राप्त कर सकूं।' ब्रह्माजी ने उसे यह सारे वरदान दे दिए। वर पाकर अरुण ने देवताओं से स्वर्ग छीनकर उस पर अपना अधिकार कर लिया। सभी देवता घबराकर भगवान शंकर के पास गए। तभी आकाशवाणी हुई कि सभी देवता देवी भगवती की उपासना करें, वे ही उस दैत्य को मारने में सक्षम हैं। आकाशवाणी सुनकर सभी देवताओं ने देवी की घोर तपस्या की... प्रसन्न होकर देवी ने देवताओं को दर्शन दिए। उनके छह पैर थे। वे चारों ओर से असंख्य भ्रमरों (एक विशेष प्रकार की बड़ी मधुमक्खी) से घिरी थीं। उनकी मुट्ठी भी भ्रमरों से भरी थी। 
भम्ररों से घिरी होने के कारण देवताओं ने उन्हें "भ्रामरी देवी" के नाम से संबोधित किया। देवताओं से पूरी बात जानकार देवी ने उन्हें आश्वस्त किया तथा भ्रमरों को अरुण को मारने का आदेश दिया। पल भर में ही पूरा ब्रह्मांड भ्रमरों से घिर गया। कुछ ही पलों में असंख्य भ्रमर अतिबलशाली दैत्य अरुण के शरीर से चिपक गए और उसे काटने लगे। अरुण ने काफी प्रयत्न किया लेकिन वह भ्रमरों के हमले से नहीं बच पाया और उसने प्राण त्याग दिए। इस तरह देवी भगवती ने भ्रामरीदेवी का रूप लेकर देवताओं की रक्षा की...

बुधवार, 20 सितंबर 2017

आइये जानें भारत विश्व गुरू क्यों था ?

१. शतरंज के खेल की खोज भारत मे हुई थी।

२. भारत ने अपने इतिहास में किसी भी देश पर कब्जा नहीं किया।

३. अमरिका के जेमोलोजिकल संस्थान के अनुसार 1896 तक भारत ही केवल हीरो का स्त्रोत था।

४. भारत 17वीं सदी तक धरती पर सबसे अमीर देश था, इसलिए यह सोने की चीड़िया कहलाता था।

५. भारत में हीं संख्या पद्धति का आविष्कार हुआ और आर्यभट्ट ने शून्य की कल्पना की...

६. नाविक विद्दा की खोज 6000 पूर्व भारत में सिन्ध नदी में हुई थी।

७. विश्व का पहला विश्वविद्दालय तक्षशिला 700 बीसी में भारत में स्थापित किया गया था।

८. संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है।

९. भास्कराचार्य ने पृथ्वी द्वारा सूर्य का ग्रह पथ का समय ३६५.२५८७५६४८४ दिन पांचवी शताब्दी में ही दिया था यानी न्यूटन के दादा के जन्म से पहले...

१०. आयुर्वेद का जन्म भारत में हुआ।

११. अर्थशास्त्र का जन्म भारत में चाण्क्य के द्वारा...

१२. विश्व का सबसे पुराना पुस्तक "वेद" भारत में...

१३. मानव जाती का विकाश भारत में...

१४. सभ्यता संस्कृति का विकास भारत में...

१५. विज्ञान का विकाश भारत में...

१६. वायुयान का आविष्कार शिवकरवापूजी तलपड़े ने 1895 में किया था।

१७. पायथागोरस परिमेय का सुत्र उपनिषदों में पाया गया है।

१८. बैटरी निर्माण बिधि का आविष्का रसर्वप्रथम
महर्षि अगस्त्य ने किया था (अगस्त्य संहिता ) बेंजामिन फ्रेंक्लिनके जन्म से पहले...

१९. सबसे पहले व्याकरण की रचना भारत में महर्षि पाणिनी द्वारा...

२०. लोकतंत्र का जन्म भारत मे...

२१. सबसे पुराना शहर काशी (भारत)

२२. प्लास्टिक सर्जरी का आविष्कारकऋषि सुश्रुत भारत में...

२३. सबसे पुराना धर्म सनातन धर्म भारत में...

जाने गऊ सेवा के चमत्कार

अनादिकाल से मानवजाति गौमाता की सेवा कर अपने जीवन को सुखी, समृद्ध, निरोग, ऐश्वर्यवान एवं सौभाग्यशाली बनाती चली आ रही है. गौमाता की सेवा के माहात्म्य से शास्त्र भरे पड़े है. आईये शास्त्रों की गौ महिमा की कुछ झलकियाँ देखे –

गौ को घास खिलाना कितना पुण्यदायी
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तीर्थ स्थानों में जाकर स्नान दान से जो पुन्य प्राप्त होता है, ब्राह्मणों को भोजन कराने से जिस पुन्य की प्राप्ति होती है, सम्पूर्ण व्रत-उपवास, तपस्या, महादान तथा हरि की आराधना करने पर जो पुन्य प्राप्त होता है, सम्पूर्ण प्रथ्वी की परिक्रमा, सम्पूर्ण वेदों के पढने तथा समस्त यज्ञो के करने से मनुष्य जिस पुन्य को पाता है, वही पुन्य बुद्धिमान पुरुष गौ माता को ग्रास खिलाकर प्राप्त कर लेता है.

गौ सेवा से वरदान की प्राप्ति
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जो पुरुष गौ की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, उस पर संतुष्ट होकर गौ माता उसे अत्यंत दुर्लभ वर प्रदान करती है.

गौ सेवा से मनोकामनाओ की पूर्ति
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गौ की सेवा यानि गाय को चारा डालना, पानी पिलाना, गाय की पीठ सहलाना, रोगी गाय का ईलाज करवाना आदि करने वाले मनुष्य पुत्र, धन, विद्या, सुख आदि जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, वे सब उसे प्राप्त हो जाती है, उसके लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होती.

भूमि दोष समाप्त होते है
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गौ का समुदाय जहा बैठकर निर्भयतापूर्वक साँस लेता है, उस स्थान की शोभा को बढ़ा देता है और वह के सारे पापो को खीच लेता है.

सबसे बड़ा तीर्थ गौ सेवा
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देवराज इंद्र कहते है- गौ में सभी तीर्थ निवास करते है. जो मनुष्य गाय की पीठ स्पर्श करता है और उसकी पूछ को नमस्कार करता है वह मानो तीर्थो में तीन दिनों तक उपवास पूर्वक रहकर स्नान कर लेता है.

असार संसार छः सार पदार्थ
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भगवान विष्णु, एकादशी व्रत, गंगा नदी, तुलसी, ब्रह्मण और गाय – ये 6 इस दुर्गम असार संसार से मुक्ति दिलाने वाले है.

मंगल होगा
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जिसके घर बछड़े सहित एक भी गाय होती है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते है और उसका मंगल होता है. जिसके घर में एक भी गौ दूध देने वाले न हो उसका मंगल कैसे हो सकता है ? और उसके अमंगल का नाश कैसे हो सकता है ?.

ऐसा न करे
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गौ, ब्राह्मणों तथा रोगियों को जब कुछ दिया जाता है उस समय जो न देने की सलाह देते है वे मरकर प्रेत बनते है.

गोपूजा – विष्णुपूजा
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भगवान् विष्णु देवराज इन्द्र से कहते है कि हे देवराज! जो मनुष्य अस्वस्थ वृक्ष और गौ की सदा पूजा सेवा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरो और मनुष्यों सहित सम्पूर्ण जगत की भी पूजा हो जाती है. उस रूप में उसके द्वारा की हुई पूजा को मैं यथार्थ रूप से अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ.

गोधूली महान पापों की नाशक है
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गायो के खुरो से उठी हुई धूलि, धान्यो की धूलि तथा पुट के शरीर में लगी धूलि अत्यंत पवित्र एवं महापापो का नाश करने वाले है.

चारो सामान है
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नित्य भागवत का पाठ करना, भगवान् का चिंतन, तुलसी को सींचना और गौ की सेवा करना ये चारो सामान है

गौ को प्रणाम करने से
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धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारो की प्राप्ति होती है. अतः सुख की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान पुरुष को गायो को निरंतर प्रणाम करना चाहिए.

गौदुग्ध – धरती का अमृत
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गाय का दूध धरती का अमृत है. विश्व में गौ दुग्ध के सामान पौष्टिक आहार दूसरा कोई नहीं है. गाय के दूध को पूर्ण आहार माना गया है. यह रोग निवारक भी है. गाय के दूध का कोई विकल्प नहीं है. यह एक दिव्य पदार्थ है.
वैसे भी गाय के दूध का सेवन करना गौ माता की महान सेवा करना ही है. क्योकि इससे गोपालन को बढ़ावा मिलता है और अप्रत्यक्ष रूप से गाय की रक्षा ही होती है. गाय के दूध का सेवन कर गौमाता की रक्षा में योगदान तो सभी दे ही सकते है.

पंचगव्य
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गाय के दूध, दही, घी, गोबर रस, गो-मूत्र का एक निश्चित अनुपात में मिश्रण पंचगव्य कहलाता है. पंचगव्य का सेवन करने से मनुष्य के समस्त पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते है, जैसे जलती आग से लकड़ी भस्म हो जाते है.
मानव शरीर का ऐसा कोई रोग नहीं है, जिसका पंचगव्य से उपचार नहीं हो सकता. पंचगव्य से पापजनित रोग भी नष्ट हो जाते है.

* गौ के दर्शन, पूजन, नमस्कार, परिक्रमा, गाय को सहलाने, गौग्रास देने तथा जल पिलाने आदि सेवा के द्वारा मनुष्य दुर्लभ सिद्धियाँ प्राप्त होती है.

* गो सेवा से मनुष्य की मनोकामनाएँ जल्द ही पूरी हो जाती है.

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

आओ हम हिन्दी अपनाएँ, गैरों को परिचय करवाएँ...

हिन्दी मेरा आन हैं, हिन्दी मेरी पहचान हैं...
हिन्दू हूँ मैं... वतन भी मेरा प्यारा हिन्दुस्तान हैं...

हिन्दी की बिन्दी को मस्तक पे सजा के रखना हैं...
सर आँखो पे बिठाएँगे, यह भारत माँ का गहना हैं...

बढ़े चलो हिन्दी की डगर हो, अकेले फिर भी मगर...
मार्ग की काँटे भी देखना, फूल बन जाएँगे पथ पर...

हिन्दी को आगे बढ़ाना हैं, उन्नति की राह ले जाना हैं...
केवल इक दिन ही नहीं हमने नित हिन्दी दिवस मनाना हैं.

हिन्दी से हिन्दुस्तान हैं, तभी तो यह देश महान हैं...
निज भाषा की उन्नति के लिए अपना सब कुछ कुर्बान हैं.

निज भाषा का नहीं गर्व जिसे क्या प्रेम देश से होगा उसे...
वही वीर देश का प्यारा हैं, हिन्दी ही जिसका नारा हैं...

राष्ट्र की पहचान है जो, भाषाओं में महान है जो...
जो सरल सहज समझी जाए, उस हिन्दी को सम्मान दो...

अग्रेजी का प्रसार भले, हम अपनी भाषा भूल चले...
तिरस्कार माँ भाषा का जिसकी ही गोदि में हैं पले...

भाषा नहीं होती बुरी कोई, क्यों हमने मर्यादा खोई...
क्यों जागृति के नाम पर हमने स्व-भाषा ही डुबोई...

अच्छा बहु भाषा का ज्ञान, इससे ही बनते हैं महान...
सीखो जी भर भाषा अनेक पर राष्ट्र भाषा न भूलो एक...

इक दिन ऐसा भी आएगा, हिन्दी परचम लहराएगा...
इस राष्ट्र भाषा का हर ज्ञाता भारतवासी कहलाएगा...

निज भाषा का ज्ञान ही उन्नति का आधार हैं...
बिन निज भाषा ज्ञान के नहीं होता सद-व्यवहार हैं...

आओ हम हिन्दी अपनाएँ, गैरों को परिचय करवाएँ...
हिन्दी वैज्ञानिक भाषा हैं, यह बात सभी को समझाएँ...

नहीं छोड़ो अपना मूल कभी, होगी अपनी भी उन्नति तभी
सच्च में ज्ञानी कहलाओगें, अपनाओगे निज भाषा जभी...

हिन्दी ही हिन्द का नारा हैं, प्रवाहित हिन्दी धारा हैं...
लाखों बाधाएँ हो फिर भी, नहीं रुकना काम हमारा हैं...

हम हिन्दी ही अपनाएँगे, इसको ऊँचा ले जाएँगे...
हिन्दी भारत की भाषा हैं, हम दुनिया को दिखाएँगे।

जय हिंद जय हिंदी
                            

बुधवार, 13 सितंबर 2017

हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा #हिंदी_दिवस पर सिनेमा और सियासत से लेकर संस्कारों तक हुई हिंदी की दुर्दशा को व्यक्त करती कवि गौरव चौहान, इटावा, उत्तर प्रदेश की कविता

रे भारत मैं तेरी बेटी, तुलसी तेरे आँगन की,
जन जन की भाषा हूँ, परिभाषा हूँ सत्य सनातन की,

सकल विश्व का संवर्धन हूँ, दुविधा का निस्तारण हूँ,
नवजातों के मुख से निकला मैं पहला उच्चारण हूँ,

तुलसी के मानस का दर्पण,गीता का सम्बोधन हूँ,
मैं रहीम की दोहावलि हूँ, कबिरा का उद्बोधन हूँ,

कृष्ण प्रेम हूँ रसखानों का, मीरा की परिपाटी हूँ,
भक्ति मार्ग पर विचरण करते सूरदास की लाठी हूँ,

मैं दिनकर का इंकलाब हूँ, जय शंकर की छाया हूँ,
प्रेमचंद का गाँव, महादेवी की निर्मल काया हूँ,

मातृभूमि का हूँ सिंगार मैं तीन रंग की चोली हूँ,
सत्तावन से सैतालिस तक आज़ादी की बोली हूँ,

मेरी गरिमा,मान मेरा,अपनों ने ही बिसराया है,
नए दौर के चाल चलन ने मुझको ही ठुकराया है,

भारत हुआ इंडिया, सबको बहुत परायी लगती हूँ,
अंग्रेजो की अंग्रेजी से आज सताई लगती हूँ,

नए ज़माने की माताएं, होड़ लगाने वाली हैं,
अंग्रेजी की मैराथन में दौड़ लगाने वाली हैं,

माँ से मम्मा कहलाने में ज्यादा अच्छा लगता है,
और पिता को डैडी कहना ज्यादा सच्चा लगता है,

ट्विंकल ट्विंकल रटा रहे हैं, चन्दा मामा दूर हुए,
जॉनी जॉनी यस पापा भी हर घर में मशहूर हुए,

हल्लो हाय मची पड़ी है, और नमस्ते छूट गया,
जिंगल बैल बजी,दादी का उड़न खटोला टूट गया,

हिंदी फिल्मो से जिनकी मैं रोटी दाल चलाती हूँ,
उन्ही हिरोइन हीरों के हाथो से मारी जाती हूँ,

जिस हिंदी को बोल करोड़ो रुपये रोज कमाते हैं,
वो अपनी दिनचर्या में उस हिंदी को खा जाते हैं,

हिंदी है सम्मान वतन का, बस फ़िल्मी व्यापार नहीं,
जो हिंदी ना बोले उसको अभिनय का अधिकार नही,

ये गौरव चौहान कहे, भारत की सब संतानो से,
निज भाषा की उन्नति सीखो चीन और जापानों से,

मैं हिंदी,घायल हूँ,खुद ही ज़ख्मो को सहलाती हूँ,
मुझको मेरा मान दिला दो, मैं झोली फैलाती हूँ,

सोमवार, 11 सितंबर 2017

दही में नमक डाल कर न खाऐं

कभी भी आप दही को नमक के साथ मत खाईये. दही को अगर खाना ही है, तो हमेशा दही को मीठी चीज़ों के साथ खाना चाहिए, जैसे कि चीनी के साथ, गुड के साथ, बूरे के साथ आदि.

इस क्रिया को और बेहतर से समझने के लिए आपको बाज़ार जाकर किसी भी साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट की दूकान पर जाना है, और वहां से आपको एक लेंस खरीदना है. अब अगर आप दही में इस लेंस से देखेंगे तो आपको छोटे-छोटे हजारों बैक्टीरिया नज़र आएंगे. ये बैक्टीरिया जीवित अवस्था में आपको इधर-उधर चलते फिरते नजर आएंगे. ये बैक्टीरिया जीवित अवस्था में ही हमारे शरीर में जाने चाहिए, क्योंकि जब हम दही खाते हैं तो हमारे अंदर एंजाइम प्रोसेस अच्छे से चलता है.

*हम दही केवल बैक्टीरिया के लिए खाते हैं.* दही को आयुर्वेद की भाषा में जीवाणुओं का घर माना जाता है. अगर एक कप दही में आप जीवाणुओं की गिनती करेंगे तो करोड़ों जीवाणु नजर आएंगे. अगर आप मीठा दही खायेंगे तो ये बैक्टीरिया आपके लिए काफ़ी फायेदेमंद साबित होंगे. *वहीं अगर आप दही में एक चुटकी नमक भी मिला लें तो एक मिनट में सारे बैक्टीरिया मर जायेंगे* और उनकी लाश ही हमारे अंदर जाएगी जो कि किसी काम नहीं आएगी. अगर आप 100 किलो दही में एक चुटकी नामक डालेंगे तो दही के सारे बैक्टीरियल गुण खत्म हो जायेंगे. क्योंकि नमक में जो केमिकल्स है वह जीवाणुओं के दुश्मन है.

आयुर्वेद में कहा गया है कि दही में ऐसी चीज़ मिलाएं, जो कि जीवाणुओं को बढाये ना कि उन्हें मारे या खत्म करे | दही को गुड़ के साथ खाईये. गुड़ डालते ही जीवाणुओं की संख्या मल्टीप्लाई हो जाती है और वह एक करोड़ से दो करोड़ हो जाते हैं. थोड़ी देर गुड मिला कर रख दीजिए. बूरा डालकर भी दही में जीवाणुओं की ग्रोथ कई गुना ज्यादा हो जाती है. मिश्री को अगर दही में डाला जाये तो ये सोने पर सुहागे का काम करेगी. भगवान कृष्ण भी दही को मिश्री के साथ ही खाते थे. पुराने समय के लोग अक्सर दही में गुड़ डाल कर दिया करते थे.

स्वामी विवेकानन्द जी का विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में दिया गया भाषण 

स्वामी विवेकानंद जी ने 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में एक बेहद चर्चित भाषण दिया था। विवेकानंद का जब भी जिक्र आता है उनके इस भाषण की चर्चा जरूर होती है। पढ़ें विवेकानंद जी का यह भाषण... 

अमेरिका के बहनो और भाइयो 
आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। 

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था। और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है। भाइयो, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है: जिस तरह अलग-अलग स्त्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।वर्तमान सम्मेलन जोकि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है: जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं। 

सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। 

अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।