शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा अपने मामाजी को लिखा पत्र....

श्रीमान् मामाजी सादर प्रणाम !

आपका पत्र मिला। देवी की बीमारी का हाल जानकर दुःख हुआ। आपने अपने पत्र में जो कुछ भी लिखा सो ठीक ही लिखा है। इसका क्या उत्तर दूँ, यह मेरी समझ में नहीं आता। परसों आपका पत्र मिला, तभी से विचारों का एवं कर्तव्यों का तुमुल युद्ध चल रहा है। एक ओर तो भावना और मोह खींचते हैं तो दूसरी ओर पुरखों की आत्माऐं पुकारती है। आपके लिखे अनुसार पहिले तो मेरा भी यही विचार था कि मैं किसी स्कूल में नौकरी कर लूंगा तथा साथ ही वहाँ का संघ कार्य भी करता रहूँगा। यही विचार लेकर में लखनऊ आया था परन्तु लखनऊ में आजकल की परिस्थिति तथा आगे कार्य का असीम क्षेत्र देख कर मुझे यही आज्ञा मिली कि बजाय एक नगर में कार्य करने के एक जिले में कार्य करना होगा। इस प्रकार सोते हुए हिन्दू समाज से मिलने वाले कार्यकर्ताओं की कमी को पूरा करना होता है। सारे जिले में काम करने के कारण न तो एक स्थान पर दो चार दिन से अधिक ठहराव संभव है और न किसी भी प्रकार की नौकरी। संघ के स्वयंसेवक के लिये पहला स्थान समाज और देश के कार्य का रहता है। और फिर अपने व्यक्तिगत कार्यों का। अतः मुझे समाज कार्य के लिये जो आज्ञा मिली थी, उसका पालन करना पड़ा।

मैं यह मानता हूँ कि मेरे इस कार्य से आपको कष्ट हुआ होगा। परन्तु आप जैसे विचारवान् एवं गंभीर पुरूषों को भी समाज कार्य में संलग्न रहते देखकर कष्ट हो तो फिर समाज कार्य करने के लिये कौन आगे आएगा ? शायद संघ के विषय में आपको अधिक मालूम न होने के कारण आप डर गये हैं। इसका कांग्रेस से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है और यह किसी भी राजनीति मे भाग भी नहीं लेता है। न यह सत्याग्रह करता है न यह जेल जाने में विश्वास रखता है। न यह अहिंसावादी ही और न यह हिंसावादी ही। इसका तो एक मात्र कार्य हिन्दुओं का संगठन करना है। इस कार्य को यह लगातार 17 साल से करता आ रहा है।  इसकी सारे भारतवर्ष में 1000 से ऊपर शाखाएँ तथा दो लाख से अधिक स्वयंसेवक है। मैं अकेला ही नहीं परन्तु इसी प्रकार 300 से ऊपर कार्यकर्ता हैं जो एक मात्र संघ कार्य ही करते हैं। सब शिक्षित और अच्छे और घरों के हैं। बहुत से बी.ए., एम.ए. और एल.एल.बी. पास हैं। ऐसा तो कोई शायद ही होगा जो कम से कम हाई स्कूल न हो और वह भी इने-गिने लोग। इतने लोगों ने अपना जीवन केवल समाज कार्य के लिये क्यों दे दिया, इसका एकमात्र कारण यही है कि बिना समाज की उन्नति हुए व्यक्ति की उन्नति संभव नहीं है। व्यक्ति कितना भी क्यों न बढ़ जाए, जब तक उसका समाज उन्नत नहीं होता, तब तक उसकी उन्नति का कोई अर्थ नहीं। यही कारण है कि हमारे यहाँ के बड़े बड़े नेताओं का दूसरे देशों में जाकर अपमान होता है। हरिसिंह गौड़ जो कि हमारे यहाँ के इतने बड़े व्यक्ति हैं, वे जब इंग्लैण्ड के एक होटल में गए तो वहां ठहरने को स्थान नहीं दिया गया, क्योंकि वे भारतीय थे। हिन्दुस्तान में आप हमारे बड़े से बड़े आदमी को ले लीजिये, क्या उसकी वास्तविक उन्नति है ? मुसलमान गुण्डे बड़े से बड़े आदमी की इज्जत को पल में खाक में मिला देते हैं, क्योंकि वे स्वयं बड़े हो सकते हैं पर जिस समाज के वे अंग हैं वह दुर्बल है, अधः पतित है, शक्तिहीन व स्वार्थी है।

हमारे यहाँ एक व्यक्ति स्वार्थों में लीन है तथा अपनी ही सोचता है। नाव में छेद हो जाने पर अपने बोझ को आप कितना भी ऊंचा क्यों न उठाइए वह तो आपके साथ डूबेगा ही। आज हिन्दू समाज की यही हालत है। घर में आग लग रही है, परन्तु प्रत्येक अपने अपने घर की परवाह कर रहा है। उस आग को बुझाने का किसी को ख्याल नहीं है। क्या आप अपनी स्थिति को सुरक्षित समझते हैं ? क्या आपको विश्वास है कि मौका पड़ने पर समाज आपका साथ देगा ? नहीं, इसलिए यहीं कि हमारा समाज संगठित नहीं है, इसीलिए हमारी आरती और बाजों पर लड़ाईयाँ होती है। इसीलिए हमारी माँ बहिनों को मुसलमान भगाकर ले जाते हैं, अंग्रेज सिपाही उन पर निःशंक होकर दिन दहाड़े अत्याचार करते हैं और हम अपनी बड़ी भारी इज्जत की दम भरने वाले, समाज में ऊंची नाक रखने वाले अपनी फूटी आँख से देखते रहते हैं। हम उसका प्रतिकार नहीं कर सकते हैं। अधिक हुआ तो इस सनसनीखेज मामले की खबर अखबारों में दे दी या महात्माजी ने ‘हरिजन’ में एक आर्टिकल लिख दिया। क्यों ? क्या हिन्दुओं में ऐसे ताकतवर आदमियों की कमी है जो उन दुष्टों का मुकाबला कर सकें ? नहीं, कमी तो इस बात की है कि किसी को विश्वास नहीं है कि वह कुछ करे तो समाज उसका साथ देगा। सच तो यह है कि किसी के हृदय में इन सब कांडों को देखकर टीस ही नहीं उठती है।
जब किसी मनुष्य के किसी अंग को लकवा मार जाता हैं तो वह चेतनाशून्य हो जाता है। इसी भांति हमारे समाज को लकवा मार गया है। उसको कोई कितना भी कष्ट क्यों न दे, कुछ महसूस ही नहीं होता। हरेक तभी महसूस करता है जब चोट उसके सिर पर आकर पड़ती है। आज हूणों का आक्रमण सिंध में है। हमको उसकी परवाह नहीं परन्तु वही हमारे प्रान्त में होने लग जाए तब कुछ खलबली मचेगी और होश तो तब आएगा जब हमारी बहू-बेटियों में से किसी को वे उठाकर ले जाएँ। फिर व्यक्तिगत रूप से यदि कोई बड़ा हो भी गया तो उसका क्या महत्व ? वह तो हानिकारक ही है। हमारा सारा शरीर का शरीर ही मोटा होता जाए तो ठीक है परन्तु यदि खाली पैर ही सूजकर कुप्पास हो गया और बाकी शरीर वैसा ही रहा हो तो वह फीलपाँव रोग हो जाएगा। यही कारण है कि इतने कार्यकर्ताओं ने व्यक्तिगत आकांक्षाओं को छोड़कर अपने आपको समाज उन्नति में ही लगा दिया है। हमारे पतन का कारण हममें संगठन की कमी है। बाकी बुराईयां अशिक्षा आदि तो पतित अवस्था के लक्षण मात्र ही हैं। इसीलिये संगठन करना ही संघ का ध्येय है और यह कुछ भी नहीं करना चाहता है। संघ का क्या व्यवहाकरिक रूप है, यह आप यदि कभी आगरा आवें तो देख सकते हैं। मेरा ख्याल है कि एक बार संघ के रूप को देखकर तथा उसकी उपयोगिता समझने के बाद आपको हर्ष ही होगा कि आपके एक पुत्र ने भी इसी कार्य को अपना जीवन कार्य बनाया है।

परमात्मा में हम लोगों को सब प्रकार समर्थ बनाया है, क्या फिर हम अपने में से एक को भी देश के लिये नहीं दे सकते हैं। उस कार्य के लिये जिसमें न मरने का सवाल है, न जेल की यातनाएँ सहन करने का, न भूखों मरना है और न नंगा रहना है। सवाल है केवल चंद रूपयों के न कमाने का। वे रूपये जिनमें निजी खर्च के बाद शायद ही कुछ बचा रहता। रही व्यक्तिगत नाम और यश की बात, सो तो आप जानते ही हैं कि गुलामों का कैसा नाम और कैसा यश ? फिर मास्टरों की तो इज्जत ही क्या है ? आपने मुझे शिक्षा-दीक्षा देकर सब प्रकार से योग्य बनाया। क्या अब आप मुझे समाज के लिये नहीं दे सकते, जिस समाज के हम इतने ऋणी हैं ? यह तो एक प्रकार से त्याग भी नहीं है, इनवेस्टमेंट है। समाज रूपी खेत में खाद देना है। आज हम केवल, फसल काटना तो जानते हैं पर खेत में खाद देना भूल गए हैं, अतः हमारा खेत जल्द ही अन उपजाऊ हो जाएगा ?

जिस समाज और धर्म की रक्षा के लिये राम ने वनवास सहा, कृष्ण ने अनेकों कष्ट उठाएँ, राणा प्रताप जंगल-जंगल मारे फिरे, शिवाजी ने सर्वस्व अर्पण कर दिया, गुरू गोविन्द सिंह के छोटे-छोटे बच्चे जीते जी किले की दीवारों में चुने गए, क्या उनकी खातिर हम अपने जीवन की आकांक्षाओं का, झूठी आकांक्षाओं का त्याग भी नहीं कर सकते हैं ? आज समाज हाथ पसार कर भीख मांगता है और यदि हम समाज की ओर से ऐसे उदासीन रहें, तो एक दिन वह आएगा जब हमको वे चीजें, जिन्हें हम प्यार करते हैं, जबरदस्ती छोड़नी पड़ेगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि आप संघ की कार्य प्रणाली से पहिले से परिचित होते तो आपके हृदय में किसी भी प्रकार की आशंका नहीं उठती। आप यकीन रखिये कि मैं ऐसा कोई भी कार्य नहीं करूंगा जिससे कोई भी आपकी ओर अंगुली उठाकर देख भी सके। उल्टा आपको गर्व होगा कि आपने देश और समाज के लिये अपने एक पुत्र को दे दिया। बिना किसी दबाव के केवल कर्तव्य के ख्याल से आपने लालन-पालन किया। अब क्या अंत में भावना कर्तव्य को धर दबाएगी ? अब वही कर्तव्य सारे हिन्दू समाज के प्रति हो गया है। यह तो केवल समय की प्रगति के साथ-साथ आपके कर्तव्य का विकास मात्र ही है। भावना से कर्तव्य सदैव ऊँचा रहता है। लोगों ने अपने इकलौते बेटों को सहर्ष सौंप दिया है। फिर आपके पास एक स्थान पर तीन-तीन पुत्र हैं, क्या उनमें से आप एक को भी समाज के लिये नहीं दे सकते हैं ? मैं जानता हूँ कि आप ‘नहीं’ नहीं कह सकते, कोई दूसरा स्वार्थी प्रवृति वाला मनुष्य चाहे एक बार कुछ कह भी देता।

आप शायद सोचते होंगे कि यह क्या उपदेश लिख दिया है। न मेरी इच्छा है, न मेरा उद्देश्य ही यह है। इतना सब इसलिये लिखना पड़ा कि आप संघ से ठीक-ठाक परिचित हो जाएँ। किसी भी कार्य की भलाई-बुराई का निर्णय उसकी परिस्थितियों और उद्देश्य को देखकर ही तो किया जाता है। पंडित श्याम नारायण जी मिश्र, जिनके पास मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ, वे स्वयं यहाँ के लीडिंग एडवोकेट है तथा बहुत ही माननीय (जेल जाने वाले नहीं) जिम्मेदार व्यक्तियों में से है। उनकी संरक्षता में रहते हुए मैं कोई भी गैर जिम्मेदारी का कार्य कर सकूँ, यह कैसे मुमकिन है।
शेष कुशल है। कृपा पत्र दीजिएगा। मेरा तो ख्याल है कि देवी का एलोपैथिक इलाज बन्द करवा के होमियोपैथिक इलाज करवाइए। यदि आप देवी की पूरी हिस्ट्री... और बीमारी तथा सम्पूर्ण लक्षण लिख भेजें तो यहाँ पर बहुत ही मशहूर होमियोपैथ है, उनसे पूछकर दवा लिख भेजूंगा। होमियापैथ इलाज यदि दवा ठीक लग गई तो बिना खतरे के ठीक प्रकार हो सकता है। भाई साहब व भाभी जी को नमस्ते, देवी व महादेवी को स्नेह। पत्रोत्तर दीजियेगा। भाई साहब को कभी पत्र लिखते ही नहीं।
                             

आपका भांजा

दीना (दीनदयाल)

रविवार, 30 अगस्त 2020

#क्या_कभी_सोचा_है_गणेश_प्रतिमा_का_विसर्जन_क्यों..?

गणेश जी को कभी भी विदा नहीं करना चाहिए क्योंकि विघ्न हरता ही अगर विदा हो गए तो तुम्हारे विघ्न कौन हरेगा..?

#ओम_एकदंताय_नमो_नमः

अधिकतर लोग एक दूसरे की देखा-देखी गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर रहे हैं और 3, 5, 7 या 11 दिन की पूजा के उपरांत उनका विसर्जन भी करेंगे। आप सब से निवेदन है कि आप गणपति की स्थापना करें, पर विसर्जन नहीं... 
विसर्जन केवल महाराष्ट्र में ही होता हैं, क्योंकि गणपति वहाँ एक मेहमान बनकर गये थे। वहाँ लाल बाग के राजा कार्तिकेय ने अपने भाई गणेश जी को अपने यहाँ बुलाया और कुछ दिन वहाँ रहने का आग्रह किया था। जितने दिन गणेश जी वहां रहें, उतने दिन माता लक्ष्मी और उनकी पत्नी रिद्धि व सिद्धि वहीं रही... इनके रहने से लालबाग धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया, तो कार्तिकेय जी ने उतने दिन का गणेश जी को लालबाग का राजा मानकर सम्मान दिया। यही पूजन गणपति उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।
 
अब रही बात देश की अन्य स्थानों की... तो गणेश जी हमारे घर के मालिक हैं और घर के मालिक को कभी विदा नहीं किया जाता..! वहीं अगर हम गणपति जी का विसर्जन करते हैं तो उनके साथ लक्ष्मी जी व रिद्धि-सिद्धि भी चली जायेगी तो जीवन में बचा ही क्या..?

हम बड़े शौक से कहते हैं... गणपति बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ इसका मतलब हमने एक वर्ष के लिए गणेश जी लक्ष्मी जी आदि को जबरदस्ती पानी मे बहा दिया तो आप खुद सोचो... कि आप किस प्रकार से नवरात्रि पूजा करोंगे..? किस प्रकार दीपावली पूजन करोंगे..? आप कैसे पूजन करने का अधिकार रखते हो, जब आपने उन्हें एक वर्ष के लिए उन्हें भेज ही दिया...

इसलिए गणेश जी की स्थापना करें पर विसर्जन कभी न करें।

हे मेरे प्रभु गणेशा! आप रहना साथ हमेशा... 🙏🏻⛳

शनिवार, 29 अगस्त 2020

#सार्वजनिक_जीवन_में_मर्यादा_से_रहें

जिस प्रकार किसी को मनचाही स्पीड में गाड़ी चलाने का अधिकार नहीं है, क्योंकि रोड सार्वजनिक है। ठीक उसी प्रकार किसी भी लड़की को मनचाही अर्धनग्नता युक्त वस्त्र पहनने का अधिकार नहीं है क्योंकि जीवन सार्वजनिक है। एकांत रोड में स्पीड चलाओ, एकांत जगह में अर्द्धनग्न रहो। मगर सार्वजनिक जीवन में नियम मानने पड़ते हैं।

भोजन जब स्वयं के पेट मे जा रहा हो तो केवल स्वयं की रुचि अनुसार बनेगा, लेकिन जब वह भोजन परिवार खायेगा तो सबकी रुचि व मान्यता देखनी पड़ेगी।

लड़कियों का अर्धनग्न वस्त्र पहनने का मुद्दा उठाना उतना ही जरूरी है, जितना लड़को का शराब पीकर गाड़ी चलाने का मुद्दा उठाना जरूरी है। दोनों में एक्सीडेंट होगा ही...

अपनी इच्छा केवल घर की चहारदीवारी में उचित है। घर से बाहर सार्वजनिक जीवन मे कदम रखते ही सामाजिक मर्यादा लड़का हो या लड़की उसे रखनी ही होगी।

जितना गलत बुर्का है, उतना ही गलत अर्धनग्नता युक्त वस्त्र है। बड़ी उम्र की लड़कियों का बच्चों-सी फ़टी निक्कर पहनकर, छोटी टॉप पहनकर फैशन के नाम पर घूमना भारतीय संस्कृति का अंग नहीं है।

जीवन भी गिटार या वीणा जैसा वाद्य यंत्र है, ज्यादा कसना भी गलत है और ज्यादा ढील छोड़ना भी गलत है।

सँस्कार की जरूरत स्त्री व पुरुष दोनों को है, गाड़ी के दोनों पहिये में सँस्कार की हवा चाहिए, एक भी पंचर हुआ तो जीवन डिस्टर्ब होगा।

नग्नता यदि मॉडर्न होने की निशानी है, तो सबसे मॉडर्न जानवर है जिनके संस्कृति में कपड़े ही नहीं है। अतः जानवर से रेस न करें, सभ्यता व संस्कृति को स्वीकारें...
कुत्ते को अधिकार है कि वह कहीं भी यूरिंन पास कर सकता है, सभ्य इंसान को यह अधिकार नहीं है। उसे सभ्यता से बन्द टॉयलेट उपयोग करना होगा। इसी तरह पशु को अधिकार है नग्न घूमने का, लेकिन सभ्य स्त्री को उचित वस्त्र का उपयोग सार्वजनिक जीवन मे करना ही होगा।
अतः विनम्र अनुरोध है, सार्वजनिक जीवन मे मर्यादा न लांघें, सभ्यता से रहें। 🙏🏻⛳

मरदूद शायर लानत #इंदौरी ने नरक से यह ताज़ा ग़ज़ल भेजी है-

यहां तो यमदूत पीट रहे हैं, जन्नत इसका नाम थोड़ी है..!
चित्रगुप्त हिसाब कर रहे हैं, किसी हूर का निज़ाम थोड़ी है!

ओसामा है, कसाब है और अफ़ज़ल भी है यहां,
यह कोई ख़ुदा या फ़रिश्तों का मुक़ाम थोड़ी है..!

घूमते हैं यहाँ हर तरफ़ लिजलिजे सूअर🐷
यहाँ बहत्तर हूरों के हुस्न का जाम थोड़ी है!

भरे पड़े हैं यहाँ तमाम ग़द्दार मेरे ही जैसे...
यहाँ किसी मुल्क का शरीफ़ अवाम थोड़ी है!

मुल्क से ग़द्दारी पे सौ-सौ बार मुझको “लानत”
उसी की सजा है, ख़िदमत का इनाम थोड़ी है।
👴🏻

😜😂😂

बुधवार, 19 अगस्त 2020

#ब्रह्म_रंध्र का रहस्योद्घाटन:

योग विज्ञान के अनुसार सिर के सबसे ऊपरी बिंदु पर एक छेद या मार्ग होता है, जिसे "ब्रह्मरंध्र" या "सहस्त्रार चक्र" कहते हैं। भारतीय ऋषि मुनि बताते रहें हैं कि इसी मार्ग से जीव गर्भ में पल रहे भ्रूण में प्रवेश करता है।रंध्र एक संस्कृ‍त शब्द है मगर दूसरी भारतीय भाषाओं में भी इसका इस्तेमाल होता है। रंध्र का मतलब है- मार्ग, जैसे कोई छोटा छिद्र या सुरंग। यह शरीर का वह स्थान होता है, जिससे होकर जीवन भ्रूण में प्रवेश करता है।हठयोग में, मस्तिष्क के ऊपरी मध्य भाग में माना जानेवाला वह छिद्र या रंध्र जहाँ सुषुम्ना, इंगला और पिंगला ये तीनों नाड़ियाँ मिलती है। कहते है कि पुणात्मा लोगों और योगियों के प्राण इसी रंध्र को भेदकर निकलते हैं। ब्रह्म-रंध्र को शरीर का दसवाँ द्वार कहा जाता है। अन्य द्वार इन्द्रियाँ है जो खुली रहती है। किन्तु यह दसवाँ द्वार सदा बन्द रहता है। तपस्या द्वारा इसे खोला जाता है। इसके खुलने पर सहस्रार चक्र से अमृत रस निकलने लगता है जिससे योगी को अमर काया प्राप्त हो जाती है।
जब बच्चा पैदा होता है तो उसके सिर पर एक नर्म जगह होती है, जहां तब तक हड्डियां विकसित नहीं हुई होतीं, जब तक बच्चा एक खास उम्र में नहीं पहुंच जाता।
जीवन प्रक्रिया में इतनी जागरूकता होती है कि वह अपने विकल्पों को खुला रखता है। वह देखता है कि यह शरीर उस जीवन को बनाए रखने में सक्षम है या नहीं। इसलिए वह उस द्वार को एक खास समय तक खुला रखता है ताकि अगर उसे लगे कि यह शरीर उसके अस्तित्व के लिए ठीक नहीं है तो वह उसी रास्ते से चला जाए। वह शरीर में मौजूद किसी अन्य मार्ग से नहीं जाना चाहता, वह जिस तरह आया था, उसी तरह जाना चाहता है। एक अच्छा मेहमान हमेशा मुख्य द्वार से आता है और उसी से वापस जाता है। अगर वह मुख्य द्वार से आकर पिछले दरवाजे से चला जाए तो इसका मतलब है कि वह आपका घर साफ करके गया है! आप भी जब शरीर छोड़ते हैं, तो पूरी जागरूकता के साथ आप चाहे शरीर के किसी भी भाग से जाएं, उसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन अगर आप ब्रह्मरंध्र से शरीर छोड़ सकें, तो यह शरीर छोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है।
हो सकता है जीव लौट जाए और शिशु मृत पैदा हो
कई मेडिकल मामले हैं, जहां मेडिकल साईंस के सभी मानदंडों से भ्रूण के स्वस्थ होने और सब कुछ ठीक होने के बावजूद बच्चा मृत पैदा होता है।
इसकी वजह सिर्फ यह है कि भीतर मौजूद जीवन अब भी चयन कर रहा होता है। जब किसी भ्रूण के अंदर जीव प्रवेश करता है और शिशु बनने की प्रक्रिया में उस भ्रूण को ठीक नहीं पाता है, तो वह उससे बाहर निकल जाता है। इसीलिए एक द्वार खुला रखा जाता है।
यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में एक गर्भवती स्त्री के आस-पास अलग तरह का माहौल बनाने के लिए कई सावधानियां रखी जाती थीं। आजकल हम उन चीजों को आधुनिक बनने और मौडर्न बनने के चक्कर में छोड़ते जा रहे हैं, मगर इन सब के पीछे यही उम्मीद होती थी कि आपकी कोख में आने वाला आपसे बेहतर और स्वस्थ हो। इसलिए एक गर्भवती स्त्री को आराम और खुशहाली की एक खास स्थिति में रखा जाता था। उसके आस-पास सही तरह की सुगंध, ध्वनियों और भोजन की व्यवस्था की जाती थी। ताकि उसका शरीर सही किस्म के प्राणी का स्वागत करने के लिए अनुकूल स्थिति में हों।
ब्रह्मरंध्र एक प्रकार से जीवात्मा का कार्यालय है इस दृश्य जगत में जो कुछ है और जहाँ तक हमारी दृष्टि नहीं पहुँच सकती उन सबकी प्राप्ति की प्रयोगशाला है। भारतीय तत्त्वदर्शन के अनुसार यहाँ 17 तत्त्वों से संगठित ऐसे विलक्षण ज्योति पुँज विद्यमान् हैं जो दृश्य जगत में स्थूल नेत्रों से कहीं भी नहीं देखे जा सकते।
साभार : 🙏
#धर्मो_रक्षति_रक्षितः

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

जानिए पुत्री को अपने पिता का गोत्र क्यों नहीं प्राप्त होता..? आइए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें...

हमारे धार्मिक ग्रंथ और हमारी सनातन हिन्दू परंपरा के अनुसार पुत्र (बेटा) को कुलदीपक अथवा वंश को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है अर्थात उसे गोत्र का वाहक माना जाता है।

क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों केवल पुत्र को ही वंश का वाहक माना जाता है, पुत्री को नहीं..?

असल में इसका कारण... पुरुष प्रधान समाज अथवा पितृसत्तात्मक व्यवस्था नहीं..! बल्कि हमारे जन्म लेने की प्रक्रिया है।

अगर हम जन्म लेने की प्रक्रिया को सूक्ष्म रूप से देखेंगे तो हम पाते हैं कि...
एक स्त्री में गुणसूत्र (Chromosomes) XX होते है और पुरुष में XY होते है।

इसका मतलब यह हुआ कि... अगर पुत्र हुआ (जिसमें XY गुणसूत्र है) तो उस पुत्र में Y गुणसूत्र पिता से ही आएगा क्योंकि माता में तो Y गुणसूत्र होता ही नहीं..!

और यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र) तो यह गुणसूत्र पुत्री में माता व पिता दोनों से आते है।

XX गुणसूत्र अर्थात पुत्री

अब इस XX गुणसूत्र के जोड़े में एक X गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा X गुणसूत्र माता से आता है।

तथा इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है, जिसे Crossover कहा जाता है।

जबकि... पुत्र में XY गुणसूत्र होता है।

अर्थात... जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि... पुत्र में Y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्योंकि माता में Y गुणसूत्र होता ही नहीं है।

और... दोनों गुणसूत्र असमान होने के कारण... इन दोनों गुणसूत्र का पूर्ण Crossover नहीं... बल्कि केवल 5% तक ही Crossover होता है।

और 95% Y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही बना रहता है।

तो इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण Y गुणसूत्र हुआ क्योंकि Y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है कि... यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है।

बस... इसी Y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है, जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था।

इस तरह ये बिल्कुल स्पष्ट है कि हमारी वैदिक गोत्र प्रणाली गुणसूत्र पर आधारित है अथवा Y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है।

उदाहरण के लिए... यदि किसी व्यक्ति का गोत्र शांडिल्य है तो उस व्यक्ति में विद्यमान Y गुणसूत्र शांडिल्य ऋषि से आया है...  या कहें कि शांडिल्य ऋषि उस Y गुणसूत्र के मूल हैं।

अब चूँकि...  Y गुणसूत्र स्त्रियों में नहीं होता है इसीलिए विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है।

वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व स्त्री भाई-बहन कहलाएं क्योंकि उनका पूर्वज (ओरिजिन) एक ही है। 

परन्तु ये थोड़ी अजीब बात नहीं कि जिन स्त्री व पुरुष ने एक-दुसरे को कभी देखा तक नही और दोनों अलग-अलग देशों में परन्तु एक ही गोत्र में जन्मे, तो वो भाई-बहन हो गये..?

इसका मुख्य कारण एक ही गोत्र होने के कारण गुणसूत्रों में समानता है। 

आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार भी...  यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनके संतान... आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी क्योंकि... ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक जैसी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता एवं ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। 
यही कारण था कि शारीरिक विषमता के कारण अंग्रेज राज परिवार में आपसी विवाह बन्द हुए। 

 इस गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके, इसलिये विवाह से पहले कन्यादान कराया जाता है और गोत्र मुक्त कन्या का पाणिग्रहण कर भावी वर अपने कुल गोत्र में उस कन्या को स्थान देता है। यही कारण था कि उस समय विधवा विवाह भी स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि कुल गोत्र प्रदान करने वाला पति तो मृत्यु को प्राप्त कर चुका है।

इसीलिए कुंडली मिलान के समय वैधव्य पर खास ध्यान दिया जाता और मांगलिक कन्या होने पर ज्यादा सावधानी बरती जाती है।
आत्मज या आत्मजा का सन्धिविच्छेद तो कीजिये...
आत्म + ज  अथवा  आत्म + जा 
आत्म = मैं, ज या जा = जन्मा या जन्मी, यानी मैं ही जन्मा या जन्मी हूँ।

जैसा कि हम जानते हैं कि... पुत्री में 50% गुणसूत्र माता का और 50% पिता से आता है।

फिर, यदि पुत्री की भी पुत्री हुई तो... वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा...
और फिर... यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा।

इस तरह से सातवीं पीढ़ी में पुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा.

अर्थात... एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है... और यही है "सात जन्मों के साथ का रहस्य"

लेकिन... यदि संतान पुत्र है तो... पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है...
और यही क्रम अनवरत चलता रहता है।

जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं... अर्थात, यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है।

इसीलिये अपने ही अंश को पित्तर जन्म जन्मान्तरों तक आशीर्वाद देते रहते हैं और हम भी अमूर्त रूप से उनके प्रति श्रध्येय भाव रखते हुए, आशीर्वाद ग्रहण करते रहते हैं और यही सोच हमें जन्मों तक स्वार्थी होने से बचाती है एवं सन्तानों की उन्नति के लिये समर्पित होने का सम्बल देती है।

एक बात और... माता-पिता यदि कन्यादान करते हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कन्या को कोई वस्तु समकक्ष समझते हैं..!
 बल्कि इस दान का विधान इस निमित किया गया है कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुलधात्री बनने के लिए उसे गोत्र मुक्त होना चाहिये। डीएनए मुक्त तो हो नहीं सकती क्योंकि भौतिक शरीर में वे डीएनए रहेंगे ही... इसलिये मायका अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है।

 गोत्र यानी पिता के गोत्र का त्याग किया जाता है। तभी वह भावी वर को यह वचन दे पाती है कि उसके कुल की मर्यादा का पालन करेगी यानी उसके गोत्र और डीएनए को दूषित नहीं होने देगी, वर्णसंकर नहीं करेगी क्योंकि कन्या विवाह के बाद कुल वंश के लिये रज का रजदान करती है और मातृत्व को प्राप्त करती है। यही कारण है कि प्रत्येक विवाहित स्त्री माता समान पूज्यनीय हो जाती है।

यह रजदान भी कन्यादान की ही तरह कोटि यज्ञों के समतुल्य उत्तम दान माना गया है जो एक पत्नी द्वारा पति को दान किया जाता है।

आश्चर्य की बात है कि... हमारी ये परंपराएं हजारों-लाखों साल से चल रही है, जिसका सीधा-सा मतलब है कि हजारों लाखों साल पहले... जब पश्चिमी देशों के लोग नंग-धड़ंग जंगलों में रहा करते थे और चूहा, बिल्ली, कुत्ता वगैरह मारकर खाया करते थे...

उस समय भी हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि... इंसानी शरीर में गुणसूत्र के विभक्तिकरण को समझ गए थे... और, हमें गोत्र सिस्टम में बांध लिया था।

इस बातों से एक बार फिर ये स्थापित होता है कि...
हमारा सनातन हिन्दू धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक है।

बस, हमें ही इस बात का भान नहीं है।

असल में... अंग्रेजों ने जो हम लोगों के मन में जो कुंठा बोई है... उससे बाहर आकर हमें अपने पुरातन विज्ञान को फिर से समझकर, उसे अपनी नई पीढ़ियों को बताने और समझाने की जरूरत है।

नोट : मैं पुत्र और पुत्री अथवा स्त्री और पुरुष में कोई विभेद नहीं करता और मैं उनके बराबर के अधिकार का पुरजोर समर्थन करता हूँ।

लेख का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ... गोत्र परंपरा एवं सात जन्मों के रहस्य को समझाना मात्र है।

🙏🏻 जय सनातन ⛳

रविवार, 12 जुलाई 2020

#आयुर्वेद_में_वर्णित_स्वर्ण (सोना) बनाने की कला

#स्वर्ण_निक्षेपण
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वैदिक मंत्र से धातु उत्पादन शक्ति
क्या आप जानते है
भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था ! भारत पर लगभग 1200 वर्षों तक मुग़ल, फ़्रांसिसी, डच, पुर्तगाली, अंग्रेज और यूरोप एशिया के कई देशों ने शासन किया एवं इस दौरान भारत से लगभग 30 हजार लाख टन सोना भी लूटा ! यदि यह कहा जाए कि आज सम्पूर्ण विश्व में जो स्वर्ण आधारित सम्रद्धि दिखाई दे रही है वह भारत से लुटे हुए सोने पर ही टिकी हुई है तो गलत न होगा ! यह एक बड़ा रहस्यमय सवाल है कि आदिकाल से मध्यकाल तक जब भारत में एक भी सोने की खान नहीं हुआ करती थी तब भी भारत में इतना सोना आता कहाँ से था ?

सबसे रहस्यमय प्रश्न यह है कि आखिर भारत में इतना स्वर्ण आया कहाँ से ? इसका एकमात्र जवाब यह है कि भारत के अन्दर हमारे ऋषि मुनियों ने जो आयुर्वेद विकसित किया उसमे औषधिय उपचार के लिए स्वर्ण भस्म आदि बनाने के लिए वनस्पतियों द्वारा स्वर्ण बनाने की विद्या विकसित की थी ! 

आयुर्वेद में स्वर्ण बनाने की विधि 
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पवित्र हिन्दू धर्म ग्रन्थ ऋग्वेद पर ही पूरे विश्व का सम्पूर्ण विज्ञान आधारित है ! ऋग्वेद के उपवेद आयुर्वेद में स्वर्ण बनाने की विधि बताई गयी है ! राक्षस दैत्य दानवों के गुरु जिन्हें शुक्राचार्य के नाम से भी संबोधित किया जाता है उन्होंने ऋग्वेदीय उपनिषद की सूक्त के माध्यम से स्वर्ण बनाने की विधि बतायी है ! श्री सूक्त के मंत्र व प्रयोग बहुत गुप्त व सांकेतिक भाषा में बताया गया है ! 
सम्पूर्ण सूक्त में 16 मंत्र है !

श्रीसूक्त का पहला मंत्र
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ॐ हिरण्य्वर्णां हरिणीं सुवर्णस्त्र्जां।
चंद्रां हिरण्यमणीं लक्ष्मीं जातवेदो मआव॥

शब्दार्थ – हिरण्य्वर्णां- कूटज, हरिणीं- मजीठ, स्त्रजाम- सत्यानाशी के बीज, चंद्रा- नीला थोथा, हिरण्यमणीं- गंधक, जातवेदो- पाराम, आवह- ताम्रपात्र।

श्रीसूक्त का दूसरा मंत्र
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तां मआवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं।
यस्या हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहं॥

शब्दार्थ – तां- उसमें, पगामिनीं- अग्नि, गामश्वं- जल, पुरुषानहं- बीस।

श्रीसूक्त का तीसरा मंत्र
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अश्व पूर्णां रथ मध्यां हस्तिनाद प्रमोदिनीं।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवीजुषातम॥

शब्दार्थ – अश्वपूर्णां- सुनहरी परत, रथमध्यां- पानी के ऊपर, हस्तिनाद- हाथी के गर्दन से निकलने वाली गंध, प्रमोदिनीं- नीबू का रस, श्रियं- सोना, देवी- लक्ष्मी, पह्वये- समृद्धि, जुषातम- प्रसन्नता।

(विशेष सावधानियां - इस विधि को करने से पहले पूरी तरह समझ लेना आवश्यक है ! इसे किसी योग्य वैद्याचार्य की देख रेख में ही करना चाहिए ! स्वर्ण बनाने की प्रक्रिया के दौरान हानिकारक गैसें निकलती है जिससे असाध्य रोग होना संभव है अतः कर्ता को अत्यंत सावधान रहना आवश्यक है !)

एक दिन में 100 किलो सोना बनाते थे महान रसायन आयुर्वेदाचार्य नागार्जुन 
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नागार्जुन का जन्म सन 931 में गुजरात में सोमनाथ के निकट दैहक नामक किले में हुआ था ! नागार्जुन एक प्रसिद्द रसायनज्ञ थे ! 
उनके बारे में लोगों में यह विश्वास था कि वह ईश्वर के सन्देशवाहक है ! नागार्जुन ने रस रत्नाकर नामक पुस्तक लिखी ! इस पुस्तक की ख़ास बात यह है कि नागार्जुन ने यह पुस्तक उनके और देवताओं के बीच बातचीत की शैली में लिखी थी ! इस पुस्तक में रस (पारे के यौगिक) बनाने के प्रयोग दिए गए है !

 इस पुस्तक में देश में धातु कर्म और कीमियागिरी के स्तर का सर्वेक्षण भी दिया गया था ! इस पुस्तक में सोना, चांदी, टिन और ताम्बे की कच्ची धातु निकालने और उसे शुद्ध करने के तरीके भी बताये गए है !

पारे से संजीवनी और अन्य पदार्थ बनाने के लिए नागार्जुन ने पशुओं, वनस्पति तत्वों, अम्ल और खनिजों का भी उपयोग किया !

 पुस्तक में विस्तार पूर्वक दिया गया है कि अन्य धातुएं सोने में कैसे बदल सकती है ! यदि सोना न भी बने तो रसागम विशमन द्वारा ऐसी धातुएं बनायी जा सकती है जिनकी पीली चमक सोने जैसी ही होती है ! 

नागार्जुन ने "सुश्रुत संहिता" के पूरक के रूप में "उत्तर तंत्र" नामक पुस्तक भी लिखी ! इसके अलावा उन्होंने कक्षपूत तंत्र, योगसर एवं गोपाष्टक पुस्तकें भी लिखी !

कहा जाता है कि नागार्जुन एक दिन में 100 किलो सोना बनाया करते थे और उनको सोना बनाने में इस स्तर की महारत थी कि वह वनस्पतियों के अलावा अन्य पदार्थों तक से सोना बना देते थे ! लेकिन दुर्भाग्य है कि मूर्ख मुग़ल लुटेरों ने तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों के रहस्यपूर्ण ग्रंथों को जला दिया !

 गांधी का दुराग्रह देखिए कैसे नापसंद करता है वैदिक विज्ञान को कैसे मंत्र का विरोध करता है
गाँधी के सम्मुख कृष्णपाल शर्मा ने दो सो तोला सोना बनाकर स्वतंत्रता आन्दोलन हेतु दान कर दी राशि !

बनारस के आयुर्वेदाचार्य श्री कृष्णपाल शर्मा ने  गांधी के समक्ष स्वर्ण बनाने की आयुर्वेदिक प्रक्रिया का वर्णन किया तो गांधी ने सार्वजनिक रूप से उनका उपहास कर दिया, जिससे वह अपनी व आयुर्वेद की प्रतिष्ठा को दाव पर लगा हुआ देख तत्काल बनारस गए और वहां से कुछ वनस्पति पदार्थों को लेकर पुनः दिल्ली के बिरला मंदिर के अतिथि गृह में वापस आये और दिनांक 26 मई 1940 को गांधीजी, उनके सचिव श्री महादेव देसाई तथा विख्यात व्यवसाई श्री युगल किशोर बिडला की उपस्तिथि में उन पदार्थों के समिश्रण को बनाकर गाय के उपले में पकाकर मात्र 45 मिनट में स्वर्ण बना दिया ! जिसका शिलालेख आज भी बिरला मंदिर के अतिथि गृह पर लगा हुआ है ! 

इसलिए मुर्ख हिंदू उसको जाती का पिता कहते हैं किताब में हमको महापुरुष कहा जाता है और बचपन में विद्यालय में पढ़ाया जाता है जिसका ज्ञान नहीं होता है वह फिर महापुरुष कैसे बन जाता है इसलिए हमारे मुल्क का पतन हो रहा है॥
इसी तरह 6 नवम्बर 1983 के हिन्दुस्तान समाचार पत्र के अनुसार सन 1942 ई. में श्री कृष्णपाल शर्मा ने ऋषिकेश में मात्र 45 मिनट में पारा से दो सौ तोला सोने का निर्माण करके सबको आश्चर्य में डाल दिया ! उस समय वह सोना 75 हजार रुपये में बिका जो धनराशि स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए दान कर दी 
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---#राज_सिंह---

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