रविवार, 16 जनवरी 2022

स्वामी विवेकानंद एवं उत्तिष्ठ भारत की परिकल्पना

जाग्रत प्राप्य वरान्निबाधत
क्षुरस्थ धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति

अर्थात - उठो, जागो और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो। कठोपनिषद के इस सूत्र वाक्य का प्रयाग स्वामी विवेकानंद ने सदैव युवाओं को जागृत करने के लिए किया।

नव भारत का उदय होने दो... उसका उदय हल चलाने वाले किसानों की कुटिया से, मछुए, मोचियों और मेहतरों की झापड़ियों से हो, बनिये की दुकान से, रोटी बेचने वाले की भट्टी के पास से प्रकट हो। कारखानों, हाटों और बाजारों से वह निकलें। वह नव भारत अमराइयों और जंगलों से, पहाड़ों और पर्वतों से प्रकट हो। विवेकानन्द जी इस प्रकार नव भारत का उदय चाहते थे।
ओ युवा भारत
क्या आप यह हृदयभेदी आहवान सुन रहे हैं..? “उठो, जागो”

यह वही ध्वनि है, जिसकी इस राष्ट्र को कब से प्रतीक्षा थी। यह वही ध्वनि है, जिसने इस घोर राष्ट्र को घोर निद्रा से जगाया...

19वीं सदी के उत्तरकाल में भौतिकवाद, व्यक्तिवाद, एकेश्वरवाद (‘मेरा भगवान् ही सच्चा है’ की मानसिकता जिसने लोगों को मत परिवर्तन करने के लिए बाध्य किया) अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण अपने चरम सीमा पर था। ऐसा लगता था मानो परस्परावलंबन, संवेदनशीलता और आध्यात्मिकता जैसे मूल्य अपना आधार खोते जा रहे थे।

भारतभूमि जिसने इनको अपने राष्ट्रीय जीवन में उतारा था, ऐसा लगने लगा था कि इन सदिओं पुराने मूल्यों पर अविश्वास के कारण स्वयं गहरे संकट में है। परन्तु, चुनौतियों से सामना करने का इस चिरंतन राष्ट्र का अपमन ही मार्ग रहा है। भारत की ऐसी पृष्ठभूमि पर, श्रीरामकृष्ण परमहंस और उनके श्रेष्ठ शिष्य स्वामी विवेकानंद का प्रादुर्भाव हुआ।

स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने हिमालय की कंदराओं में जाकर स्वयं के मोक्ष के प्रयास नहीं किये बल्कि भारत के उत्थान के लिए अपना जीवन खपा दिया। विश्व धर्म सम्मेलन के मंच से दुनिया को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में ही था, क्योंकि विवेकानंद अपनी मातृभूमि भारत से असीम प्रेम करते थे। भारत और उसकी उदात्त संस्कृति के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा थी। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं, जो स्वामी जी या फिर अन्य महान आत्माओं के जीवन से प्रेरणा लेकर भारत की सेवा का संकल्प लेते हैं।

स्वामी विवेकानंद भारत माता के ऐसे ही बेटे थे, जो उनके एक-एक धूलि कण को चंदन की तरह माथे पर लपेटते थे। उनके लिए भारत का कंकर-कंकर शंकर था। उन्होंने स्वयं कहा है- "पश्चिम में आने से पहले मैं भारत से केवल प्रेम करता था, परंतु अब (विदेश से लौटते समय) मुझे प्रतीत होता है कि भारत की धूलि तक मेरे लिए पवित्र है, भारत की हवा तक मेरे लिए पावन है, भारत अब मेरे लिए पुण्यभूमि है, तीर्थ स्थान है।"

भारत के बाहर जब स्वामी विवेकानंद ने अपना महत्वपूर्ण समय बिताया तब उन्होंने दुनिया की नजर में भारत को देखा, भारत के बारे में बनाई गई मिथ्या प्रतिमा खंड-खंड हो गईं। भारत का अप्रतिम सौंदर्य उनके सामने प्रकट हुआ। दुनिया की संस्कृतियों के उथलेपन ने उन्हें सिन्धु सागर की अथाह गहराई दिखा दी। एक महान आत्मा ही लोकप्रियता और आकर्षण के सर्वोच्च शिखर पर बैठकर भी विनम्रता से अपनी गलती को स्वीकार कर सकती है।

स्वामी विवेकानंद लिखते हैं - हम सभी भारत के पतन के बारे में काफी कुछ सुनते हैं... कभी मैं भी इस पर विश्वास करता था, मगर आज अनुभव की हृढ़ भूमि पर खड़े होकर दृष्टि को पूर्वाग्रहों से मुक्त करके और सर्वोपरि अन्य देशों के अतिरंजित चित्रों को प्रत्यक्ष रूप से उचित प्रकाश तथा छयाओं में देखकर मैं विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं कि मैं गलत था।

हे भारत, तू कभी पतित नहीं हुआ 
राजदंड टूटते रहें और फेंके जाते रहें... 
शक्ति की गेंद, एक हाथ से दूसरे में उछलती रही... पर भारत में दरबारों तथा राजाओं का प्रभाव सदा अल्प लोगों को ही छू सका, उच्चतम से निम्नतम तक जनता की विशाल राशि अपनी अनिवायं जीवनधारा का अनुसरण करने के लिए मुक्त रही है।

देशाटन के काल में नरेन्द्रनाथ ने भारत दशा का सभी तरह से प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया। सर्वत्र पुरातन भारत का गौरव चाहे वह राजनीतिक, सांस्कृतिक या आध्यात्मिक हो, उन्हें अपनी आँखों के सामने प्रबलता से दिखाई दिया। इस महान शिक्षा के चलते भारतीय समुदाय की दुर्गति की पीड़ा उनके मन में छा गई। जिससे उनकी यह इक्षा प्रबल हो गयी कि भारत की अवनति से सम्बंधित परेशानियों के उपशमन के लिए कुछ करना होगा। इस दिशा में संबल जुटाने के लिए वे एक रियासत से दूसरी रियासत में घूमते रहें...

भारत भ्रमण करके नरेन्द्रनाथ को पता चला कि धर्म ही भारत की शक्ति और सम्पदा है। अपने देश के प्रति प्रेम होने पर भी विवेकानन्द ने उसकी गलतियों को अनदेखा नहीं किया। लोगों की गरीबी, शिक्षा का अभाव और स्त्रियों की दुर्गति पर उनका ध्यान गया।

कन्याकुमारी वो अपनी यात्रा के अंतिम चरण में पहुंचे। अपने करोड़ों देश वासियों के दुःख से व्यथित ह्रदय लेकर, वो उस विराट समुद्र की लहरों को चिर कर दक्षिण सागर तट से कुछ दूर स्थित शिला पर बैठ कर पूरी रात गहरे ध्यान में मग्न हो गए। तीन दिन एवं तीन रात तक चला यह ध्यान ईश्वर के प्रति नहीं..! अपितु उसी भारत माता के प्रति था, जो स्वामी विवेकानंद के लिए भगवती दुर्गा की अवतार थी। तीन दिन व तीन रात 25, 26, 27 दिसम्बर 1892 को उस गहन ध्यान के पश्चात उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य खोज लिया। नरेन्द्रनाथ भविष्य में स्वामी विवेकानंद के रूप में परिवर्तित हुए।

वास्तव में शिकागो की धर्म संसद में स्वामी जी की उपस्थिति भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना रहीं... श्री अरविन्द कहते हैं, “ विवेकानंद का पश्चिम में जाना… विश्व के सामने पहला जीता-जागता संकेत था कि भारत जाग उठा हैं, न केवल जीवित रहने के लिए बल्कि विजयी होने के लिए” स्वामी विवेकानंद का स्वदेश लौटे विजयी वीर की तरह जय-ध्वनि के साथ स्वागत हुआ। यह किसी व्यक्ति की मात्र स्वदेश वापसी नहीं थी। यह तो भारत की आत्मा की वापसी थी।
शिकागो से लौटकर चेन्नई में दिए गये उनके प्रसिद्ध भाषण से एक अंश उद्धृत कर रहा हूँ...
युगों से जनता को आत्मग्लानि का पाठ पढ़ाया गया है। उसे सिखाया गया है कि वह नगण्य है। संसार में सर्वत्र जनसाधारण को बताया गया है कि तुम मनुष्य नहीं हो..! शताब्दियों तक वह इतना भीरु रहा है कि अब पशु-तुल्य हो गया है। कभी उसे अपने आत्मन का दर्शन ही नहीं करने दिया गया। उसे आत्मन को पहचानने दो, जानने दो कि अध्यात्म जीव में भी आत्मन का निवास है... जो अनश्वर है, अजन्मा है... जिसे न शस्त्र छेद सकता है, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकती है; जो अमर है, अनादि है, अनन्त उसी निर्वीकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी आत्मन को जानने दो”

“हम उस धर्म के अन्वेषी हैं, जो मनुष्य का उद्धार करें। हम सर्वत्र उस शिक्षा का प्रसार चाहते हैं जो मनुष्य को मुक्त करें। मनुष्य का हित करें, ऐसे ही शास्त्र हम चाहते हैं। सत्य की कसौटी हाथ में लो… जो कुछ तुम्हें मन से, बुद्धि से, शरीर से निर्बल करें... उसे विष के समान त्याग दो, उसमें जीवन नहीं है, वह मिथ्या है, सत्य हो ही नहीं सकता। सत्य शक्ति देता है। सत्य ही शुचि है, सत्य ही परम ज्ञान है… सत्य शक्तिकर होगा ही, कल्याणकर होगा ही, प्राणप्रद होगा ही… यह दैन्यकारक प्रमाद त्याग दो, शक्ति का वरण करो… कण-कण में ही तो सहज सत्य व्याप्त है, तुम्हारे अस्तित्व जैसा ही सहज है वह…उसे ग्रहण करो”

“मेरी परिकल्पना है, देश–देशान्तर में प्रचारित करने की योग्यता रखने वाले हमारे शास्त्रों का सत्य नवयुवकों को प्रदान करने वाले विद्यालय भारत में स्थापित हों। मुझे और कुछ नहीं चाहिए..! साधन चाहिए; 
समर्थ, सजीव, हृदय से सच्चे नवयुवक मुझे दो, शेष सब आप ही प्रस्तुत हो जायेगा... सौ ऐसे युवक हों तो संसार में क्रांति हो जाएं... आत्मबल सर्वोपरि है, वह सर्वजयी है क्योंकि वह परमात्मा का अंश है… निस्संशय तेजस्वी आत्मा ही सर्वशक्तिमान है”

दक्षिणपंथी हों या वामपंथी सभी इन मुद्दों पर ध्‍यान देने से कतराते हैं। रही बात विवेकानंद का नाम लेकर दुकान चला रहे झंडाबरदारों की, तो वो सिर्फ उतनी ही बातें सामने लाते हैं जिनसे उनकी दुकान जारी रहें... उनके लिये विवेकानंद का जिक्र ’उत्तिष्‍ठ’ जागृत से शुरू होता है और शिकागो वाले सम्मेलन के जिक्र पर खत्‍म हो जाता है। बस..!’

'सबसे पहले भारत को अपना मानो, फिर भारत को जानो, उसके बाद भारत के बनो और सबसे आखिर में भारत को बनाओ।’
भारत के निर्माण में जो भी कोई अपना योगदान देना चाहता है, उसे पहले इन बातों को अपने जीवन में उतरना होगा। भारत को मानेंगे नहीं तो उसकी विरासत पर विश्वास और गौरव नहीं होगा..! भारत को जानेंगे नहीं तों उसके लिए क्‍या करना है, क्‍या करने की आवश्यकता है, यह ध्यान ही नहीं आएगा..! भारत के बनेंगे नहीं तो बाहरी मन से भारत को कैसे बना पाएंगे..? भारत को बनाना है तो भारत का भक्त बनना होगा... उसके प्रति अगाध श्रद्धा मन में उत्पन्न करनी होगी।

यूरोप भ्रमण के दौरान गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर ने प्रसिद्ध चिंतक साहित्यकार रोमारोलां से कहा कि यदि भारत को जानना चाहते हो तो विवेकानंद को पढ़ो-समझो... वहाँ सब कुछ सकारात्मक है, नाकरात्मक कुछ भी नहीं मिलेगा।

✍🏻नीरज कृष्ण 
एडवोकेट पटना हाई कोर्ट

बुधवार, 12 जनवरी 2022

आज की आधुनिक माँ..!


कृपया पूरा लेख अवश्य पढ़े...

बात सच्ची है, इसलिये कड़वी भी हैं।

माँ जो एक पवित्र भावना है, संवेदना है, कोमल अहसास है।

तपती दोपहरी में मीठे पानी का झरना है, इक खुशबू है माँ जो कभी मिटती नहीं..!

देह मिट भी जाये तो अपने बच्चों की देह में रूह बन कर सिमट जाती है।

उनके लब पर दुआ तो कभी मन में अहसास बन कर ढल जाती है।

आज मैं उस माँ की बात नहीं कर रहा, जो बेसन की रोटी पर खट्टी चटनी जैसी लगती थी।

आज उस माँ की बात भी नहीं, जिसका बेटा परदेश में रोता था तो देश में उसका प्यार भीग जाया करता था।

मैं मेक्सिम गोर्की की माँ की बात भी नहीं कर रहा और ना #जीजा_बाई की जिसने एक बालक को शिवा जी बना दिया।
आज बात है... आज के दौर की, आज की नारी की, आज की माँ की, आधुनिक भारतीय नारी की...

वो अब खुद गीले में सोकर अपने बच्चे को सूखे में सुलाने की भूल नहीं करती, वो अब अपने बच्चे को खुद से दूर झूले में सुलाती है। 


नींद में खलल नहीं पड़े, इसलिए बच्चे के मुहँ में दूध की बोतल चिपका दी जाती है।

ये आधुनिक माताएं अपने शौक के लिए, पैसों के लिए अपनी कोख भी किराए पर देने में नहीं चूकती...

अपने स्वार्थों के लिए ये कोख में ही अपनी बेटी का गला घोट डालने में ज़रा संकोच नहीं करती..!

अपने अवसर, अपने करियर की खातिर ये बच्चों को "आया" के हवाले कर चल देती है। 

बच्चों से पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें बहुत छोटी उमर में ही प्ले स्कूल में छोड़ देती है।

गए वो दिन जब माँ दो-तीन वर्ष की उम्र तक के बच्चों को घर में ही पढ़ाया करती थी।

संस्कारों, जीवन मूल्यों के पाठ अब अधिकतर घरों में नहीं पढ़ाये जाते..!

बच्चों को अब रातों को कोई कहानियाँ नहीं सुनाई जाती और ना कोई लोरी..!

अपने काम अपने शौक और अपने फायदे को देखने वाली इन moms के पास अपने बच्चों के लिए कोई समय नहीं..!

ऐसा नहीं है कि उन्हें अपने बच्चों की चिंता नहीं है, दिन में एक दो बार फोन करके वो "आया" से अपने बच्चों का हाल जरुर पूछ लेती हैं।

बच्चे भी अब माँ से ज्यादा अपनी दूध की बोतल और आया को प्यार करते हैं।

थोड़े बड़े होकर वीडियों गेम और फिर नेट और मोबाईल उनके साथी बन जाते है।

जितनी दूर माँ हो रही है बच्चों से, उतने ही दूर बच्चे भी हो रहे हैं माँ से...

यही वजह है कि जितने झूलाघर रोज खुल रहे हैं, उनसे कहीं ज्यादा वृद्धाश्रम (old age home) बनाये जा रहे हैं।

आधुनिक जीवन शैली और पुरुषों की नक़ल करने के चक्कर में महिलाओं ने खुद को अपने स्त्रियोंचित गुणों से दूर कर लिया है। महिलाओं में पुरुषों की तरह शराब और सिगरेट पीने का चलन भी अब आम बात है।

चिंता ये है कि जो युवतियां अपनी रातें "पब" में शराब और सिगरेट के धुएं में बिताती हैं, क्या कल ये युवतियां एक अच्छी पत्नी या इक अच्छी माँ बन सकेगी..?

क्या फिर कोई मुनव्वर राणा ये कह पायेगे कि “मैं जब तक घर नहीं जाता, मेरी माँ सजदे में रहती है"

ये कैसी महिलाए हैं..? ये कैसी भविष्य की माताएं हैं..?

जिनके दिल में किसी के लिए प्रेम नहीं, वात्सल्य नहीं, ये सिर्फ खुद से प्रेम करती हैं। 

खुद के सुखों की खातिर अपना घर परिवार बच्चे सब कुछ इक झटके में तोड़ देती हैं, छोड़ देती है।
{रोज बिखरते परिवार इसका उदाहरण है}

अक्सर मैंने देखा है, शादी पार्टी या कोई होटल या रेस्टोरेंट में आजकल महिलायें कभी भी अपने बच्चों को गोद में नहीं उठाती..!
इनके पति बच्चों को देखते हैं या फिर आया को साथ रखती हैं।
बच्चे रोये या बिलखते रहे इन्हें परवाह नहीं, इनकी साड़ी या मेकअप खराब नहीं होना चाहिए।
अपने बच्चों को अपनी गोद में रखने में इन्हें अब शर्म आती है।
आजकल पिताओं को मैंने बच्चों की ज्यादा परवाह करते देखा है।

यदि वास्तव में माँ की कहानियों और लोरियों में ताकत होती, पकड़ होती तो युवा पीढ़ी इस कदर भटकती नहीं..!

कहीं न कहीं कोई कमी जरुर है जिसे बच्चे बाहर जाकर पूरी कर रहे है, दोस्तों में, नशे में वो सुकून तलाश रहे है जो उन्हें घर में ही मिलना चाहिए था।

माताओं को सोचना होगा, क्यों बेटे-बेटियाँ उनसे दूर हो रहे हैं..?

क्या बेटे के दुःख से उनका आँचल अब भी भीगता है..! या उन्होंने अपने बच्चों की उगंली छोड़ दी है...

यदि माँ की पकड़ ढीली हो गयी तो क्या कोई बेटा परदेश में ये बात महसूस कर सकेगा..! “मैं रोया परदेश में, भीगा माँ का प्यार"

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

हवा के होते हैं सात प्रकार, जानिए उनका रहस्य...

मैं सुंदरकांड पढ़ते हुए 25वें दोहे पर थोड़ा रुक गया। तुलसीदास जी ने सुन्दरकांड में... जब हनुमानजी ने लंका में आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -

हरि प्रेरित तेहि अवसर, चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि, बढ़ि लाग अकास।।25।।

अर्थात : 
जब हनुमानजी ने लंका में आग लगाई तो भगवान की प्रेरणा से उन्चासों पवन चलने लगी। हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे 
और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे।

मैंने सोचा कि, इन उन्चास मरुत का क्या अर्थ है ? 🤔
यह तुलसीदास जी ने भी नहीं लिखा..!🧐
फिर मैंने सुंदरकांड पूरा करने के बाद समय निकालकर 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी खोजी...🕵️‍♂️
और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ।😇
तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ हैं।
        
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। 
अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है लेकिन उसका रूप बदलता रहता है... जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु लेकिन ऐसा नहीं है..!

दरअसल, 
जल के भीतर जो वायु है, उसका वेद-पुराणों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है, उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है, उसका नाम अलग और 
पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। 
नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है। 

इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।
ये 7 प्रकार हैं- 

1.प्रवह, 2.आवह, 3.उद्वह, 4.संवह, 
5.विवह, 6.परिवह और 7.परावह
 
1.प्रवह : पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है, जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं। 
 
2. आवह : आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घुमाया जाता है।
 
3. उद्वह : वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, 
जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घुमाया जाता है। 
 
4. संवह : वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, 
जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर 
संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
 
5. विवह : पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है। 
 
6. परिवह : वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, 
जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो 
सप्तर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।
 
7. परावह : वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, 
जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा 
अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।
 
इन सातों वायु के सात-सात गण हैं, जो निम्न जगह में विचरण करते हैं...

ब्रह्मलोक, इंद्रलोक, अंतरिक्ष, भूलोक की पूर्व दिशा, 
भूलोक की पश्चिम दिशा, भूलोक की उत्तर दिशा और 
भूलोक कि दक्षिण दिशा...

इस तरह  7 x 7 = 49 
कुल 49 मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।
  
है ना अद्भुत ज्ञान

हम अक्सर रामायण, भगवद् गीता पढ़ तो लेते हैं परंतु उनमें लिखी छोटी-छोटी बातों का गहन अध्ययन करने पर अनेक गूढ़ एवं ज्ञानवर्धक बातें ज्ञात होती हैं ।
साभार - राम कुमार अग्रवाल।

रविवार, 24 अक्टूबर 2021

करवा चौथ पर नारी की महिमा

नारी अति महान जगत में नारी अति महान...
जिसका घर-घर में सम्मान...
धर्म-कर्म शृंगार है इसके, सत्य-अहिंसा इसके प्राण,
जिसका घर-घर में सम्मान...


नारी का सत्कार यहां पे, पहले आये इसी का नाम,
सब कहते है सीता-राम, सब कहते है राधे श्याम,
लक्ष्मी-नारायण कहते सब, देवों से पाया वरदान...
जिसका घर-घर में सम्मान...

हर युग में भारत की नारी, पति की रक्षा करती आई।
कष्ट सह जीवन भर पत्नी, पति की सेवा करती आई।
कई बार तो पति की खातिर दे दें अपनी जान...
जिसका घर-घर में सम्मान...

आओ आज सुनाये तुम्हको #करवा_चौथ के व्रत की महिमा,
करवा चौथ की कथा बताती 'भारत की नारी' की महिमा...
इसी कथा और व्रत के कारण बढ़ा है नारी का सम्मान...
जिसका घर-घर में सम्मान...

भारत की नारी सब से प्यारी, इसको माने दुनिया सारी,
तन-मन दोनों से ही सूंदर, पति की सेवा धर्म है जिसका,
घर को माने है ये मंदिर, सास-ससुर को माने भगवान...
डोली बैठ पति संग आये, सारा जीवन धर्म निभाए...
अंत काल यही इच्छा इसकी, पति के कंधो पर ही जाएं,
ऐसे अपना धर्म निभाएं, पति के कंधो पर ही जाएं...🙏🏻⛳

शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

शस्त्र की महिमा

शस्त्र निष्क्रिय होते हुए भी सक्रिय होता है, मतलब अगर वो कहीं किसी आलमारी में पड़ा-पड़ा जंग खा रहा हो तो भी अपना काम करता रहता हैं... उसकी मौजूदगी ही शत्रुओं के बुरे और कुत्सित विचारों को नष्ट करने के लिए काफी होती हैं।

दुनिया में अशांति इसलिए है क्योंकि सज्जनों ने शस्त्रों का त्याग कर दिया है और दुर्जन सदैव की तरह शस्त्रों से लैस हैं, यही वजह है कि दुर्जन हावी हैं और धरती पर अनाचार फैलता जा रहा हैं।

दुनिया को दो हिस्सों में बांटा जा सकता हैं, एक जिनके पास शस्त्र होता है और दूसरा जिनके पास शस्त्र नहीं होता है। जिनके पास शस्त्र होता है, वो सदैव निडर और वीर बने रहते हैं और जिनके पास शस्त्र नहीं होते है, वो सदैव भयभीत होते हैं और कायर पुरुष बने रहते हैं।

जिस घर में अस्त्र-शस्त्र होते हैं, उस घर की स्त्रियों पर कभी किसी की कुदृष्टि डालने की हिम्मत भी नहीं होती है और जिनके घर में अस्त्र-शस्त्र नहीं होते हैं, उनकी स्त्रियों के साथ राह चलते छेड़खानी होती है... लव जिहाद जैसी घटनाएं होती हैं और वो सदैव थाने के चक्कर ही लगाते रह जाते हैं, उन्हें बदनामी के सिवाय कभी कुछ हासिल नहीं होता..!

"सत्यमेव जयते" यानी सत्य की ही विजय होती है, इस तरह की सूक्तियों के भरोसे बैठने से कोई फायदा नहीं है..! सत्य तो हिंदुओं के साथ ही है फिर उनका पलायन क्यों हो रहा हैं..? सत्य तो युद्धिष्ठिर के साथ था लेकिन फिर भी वन-वन भटकते रहें... जब युद्धिष्ठिर ने शस्त्र उठाया तभी सत्यमेव जयते हुआ। इसीलिए अब कहावतें बदल गई हैं... ये कलियुग है और कलियुग में सदैव शस्त्र मेव जयते होता है यानी जिसके पास शस्त्र होगा, उसी की विजय होगी। इसलिए शस्त्र की खरीद करो... अपने पास सदैव शस्त्र रखो।

ज्योतिष के हिसाब से भी ध्यान दें... 
शस्त्र का मतलब है मंगल ग्रह अगर आपके पास शस्त्र है तो आपका मंगल मजबूत है और अगर आपका मंगल मजबूत है तो आप शत्रुओं पर सदैव विजय प्राप्त करते रहेंगे... इसलिए अपनी भुजाओं को शस्त्रों से मजबूत करें।

एक बार अपने हाथ में शस्त्र लेकर देखो... तब आपको ये महसूस होगा कि देशद्रोही शत्रु चींटियों के समान हैं। शस्त्र का होना ही आत्मविश्वास वर्धक महान मानसिक औषधि हैं, इसका नित्य सेवन करते रहो।

राष्ट्र के शत्रुओं की संख्या गिनकर चिंता में मत पड़ो... चिंता सदैव इस बात की करो कि तुम्हारे पास कितने अस्त्र-शस्त्र है..! सदैव सुनिश्चित करो कि तुम्हारे अस्त्र-शस्त्रों की संख्या, तुम्हारे शत्रुओं की संख्या से ज्यादा हो।
 
जैसा को तैसा जवाब देना सीखो... शिकायत मत करो..! शिकायत लेकर किसके पास जा रहे हो..? ये संविधान, कानून, प्रशासन और व्यवस्था सिर्फ उनके लिए है, जो शक्तिशाली हैं। कायर लोगों का साथ तो भगवान भी नहीं देते..! कायर लोग सिर्फ शिकायत करते रह जाते हैं। इतने दिनों में आपको ये अवश्य महसूस हुआ होगा कि प्रशासन भी सदैव अत्याचार करने वाले शक्तिशालियों का साथ ही देता है।

अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी खुद लो। कोई सेना, कोई सरकार तुमको बचाने नहीं आएगी..! जब तुम पर संकट आएगा तो उस वक्त तुम और सिर्फ तुमको ही उसका सामना करना होगा। तुम्हारे सिवाय कोई तुम्हारी प्राण रक्षा नहीं कर सकता..!

इसीलिए नियमानुसार शस्त्रों का संचय करो... सदैव पराक्रमी बनो... सज्जन बनो लेकिन कायर नहीं... शस्त्र धारण करके सज्जन बनो, तभी तुम्हारी सज्जनता सुशोभित होगी। 

इस सूक्ति का नित्य पठन करते रहें “कोई सिंह को, वन के राजा के रूप में अभिषेक या संस्कार नहीं करता है..! अपने पराक्रम के बल पर सिंह स्वयं जंगल का राजा बन जाता है।”
  
✊🏻 जय हिंदुत्व ⛳ जय श्री राम 🏹

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

लाला हरदयाल एक संन्यासी क्रांतिकारी🙏🏻🇮🇳⛳

🔸#लाला_हरदयाल ऐसे ‘संन्यासी क्रांतिकारी’ थे, जो जिंदगीभर अंग्रेजों की आंख का कांटा रहें।🔸
   
◆ लाला हरदयाल जी सिविल सर्विस की नौकरी ठुकराकर, सारे ऐशो आराम छोड़कर देश को आजाद कराने के अभियान में शामिल हो गए थे। आज उनकी जन्म जयंती है, आम के बारे में जानते हैं...

◆ मार्टिनिक नाम था उस टापू का, उसी के समुद्र तट की किसी गुफा में डेरा जमाए हुए था वो संन्यासी, जो कभी सिविल सर्विस की नौकरी ठुकराकर आया था और जिसे दुनियाभर में मशहूर ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी (University of Oxford) में पढ़ने के लिए दो स्कॉलरशिप मिली थीं और वो जिंदगी के सारे ऐशो आराम छोड़कर, यहां दुनिया के दूसरे कोने में एक गुफा में साधना करने मे मग्न था और लक्ष्य था बस एक अपना राज #स्वराज 

◆ इतिहास में चंद चेहरों का ही जिक्र :
कभी क्रांतिकारियों की सूची में आपने लाला हरदयाल का नाम शायद ही पढ़ा हो..! ये भी बड़ी बिडंबना रही है कि हमारे देश के क्रांतिकारियों का इतिहास भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे गिनती के चेहरों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया। ऐसे में जो लोग सम्पन्न परिवारों से थे या किसी स्कॉलरशिप पर विदेश में उच्च शिक्षा के लिए गए और वहीं से देश की आजादी के लिए क्रांति की मशाल जलाई, वहीं विदेशी धरती पर सालों तक अलख जगाए रखने वाले, अंग्रेजी सरकार के कुकृत्यों को दुनियाभर के देशों के सामने एक्सपोज करने वाले और विदेशों से धन, हथियार, राजनीतिक समर्थन ही नहीं सशस्त्र क्रांतिकारियों तक को भेजने वाले लोगों को तो देश में गिनती के लोग ही जानते हैं।

◆ राजा महेन्द्र प्रताप, मदन लाल धींगरा, ऊधम सिंह, करतार सिंह सराभा, रास बिहारी बोस, श्यामजी कृष्ण वर्मा, भीखाजी कामा, वीर सावरकर और लाला हरदयाल जैसे कई नाम इनमें शामिल हैं। इन सभी ने भारत के साथ-साथ विदेश की धरती को अपनी क्रांति भूमि बनाया। किसी ने जापान, किसी ने अमेरिका, किसी ने ब्रिटेन तो किसी ने फ्रांस... 
लाला हरदयाल जी के पिता दिल्ली की एक डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में रीडर थे, दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से उन्होंने संस्कृत में डिग्री ली। प्रतिभाशाली इतने थे कि ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में पढ़ने के लिए उन्हें दो स्कॉलरशिप ऑफर की गईं।

◆ पढ़ाई के दौरान लिखा तीखा लेख :
लेकिन देश की आजादी को लेकर उनके तेवर शुरूआत से ही साफ और सख्त थे। ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई के दौरान ही 1907 में उन्होंने ‘इंडियन सोशलिस्ट’ मैगजीन में लिखे एक लेख में अंग्रेजी सरकार पर सवाल उठाये थे। उसी वक्त उन्हें आईसीएस यानी इंडियन सिविल सर्विस (उस वक्त की आईएएस) का पद ऑफर हुआ था, उन्होंने ‘भाड़ में जाए आईसीएस’ कहते हुए ऑक्सफोर्ड की स्कॉलरशिप तक छोड़ दी और अगले साल भारत वापस आ गए। यहां वो पूना जाकर तिलक जी से और लाहौर में लाला लाजपत राय से मिले। उस वक्त कांग्रेस के यही दो बड़े नेता थे, जो गरम दल की अगुवाई करते थे।

◆ लेकिन अब वो अंग्रेजी सरकार की नजरों में चढ़ चुके थे, उन पर नजर रखा जाना शुरू हो गय़ा था लेकिन भारत में उनका ये कड़े तेवरों वाला लेखन जब जारी रहा तो अंग्रेजी सरकार उन पर प्रतिबंध लगाने और गिरफ्तार करने की सोचने लगी... कहीं से इसकी जानकारी लाला लाजपत राय जी को मिल गई। लाजपत राय जी को ये संदेह था कि काला पानी जैसी सजा लाला हरदयाल के इरादे तोड़ सकती है..! लाला जी ने ही हरदयाल को सलाह दी कि फौरन देश छोड़ दो, ये 'क्रांतिकारी लेखन' विदेश की धरती से करोगे तो अंग्रेज सरकार कुछ नहीं कर पाएगी..! हरदयाल जी तब तक ब्रिटिश अराजकतावादी कम्युनिस्ट व्यक्ति एल्ड्रेड के संपर्क में आ चुके थे, जो ‘इंडियन सोशलिस्ट’ छापता था। दिलचस्प बात थी कि एक तरफ वो एक वामपंथी के लिए लिख रहे थे, दूसरी तरफ हिंदू वादी नेता, लाला लाजपत राय उनकी मदद कर रहे थे...

◆ लाला लाजपत राय की सलाह पर छोड़ा देश :
लाला हरदयाल ने लाला लाजपत राय जी की बात समझकर भारत छोड़ दिया और 1909 में वो पेरिस जा पहुंचे। जहां जाकर उन्होंने जिनेवा से निकलने वाली पत्रिका #वंदेमातरम का सम्पादन शुरू कर दिया। ये मैगजीन दुनियाभर में बिखरे भारतीय क्रांतिकारियों के बीच क्रांति की अलख जगाने का काम करती थी। हरदयाल के लेखों ने उनके अंदर आजादी की आग जला दी। हालांकि पेरिस में उन्हें लगा था कि भारतीय समुदाय मदद देगा लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने दुखी होकर पेरिस छोड़ दिया और वो अल्जीरिया चले गए... वहां भी उनका मन नहीं लगा, जहां से वो क्यूबा या जापान जाना चाहते थे लेकिन फिर #मार्टिनिक चले गए। यहां आकर वो एक सन्यासी की तरह जीवन जीने लगे... भाई परमानंद उन्हें ढूंढते हुए पहुंचे और उनसे भारतभूमि को आजाद करवाने, भारतीय संस्कृति के प्रसार के लिए मदद मांगी...

◆ भारतीय भूमि से था खास लगाव :
खेलने कूदने की उम्र से ही लाला हरदयाल को मेरा देश, मेरी भूमि, मेरी संस्कृति, मेरी भाषा पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था। जबकि वो मंदिर तक नहीं जाते थे, पूजा नहीं करते थे। मित्र उन्हें नास्तिक बोलते थे लेकिन उनको भारतीय भूमि से निकले हर धर्म, सम्प्रदाय, महापुरुष में काफी आस्था थी। भारतीय परम्पराओं से उनका खासा लगाव था। जब एक बार लाहौर में उनकी वाईएमसीए (यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन) क्लब के सचिव से किसी बात को लेकर कहासुनी हो गई तो उन्होंने लाहौर मे ‘यंग मैन इंडियन एसोसिएशन’ की स्थापना कर डाली। इसी एसोसिएशन के उदघाटन समारोह में हरदयाल के मित्र अल्लामा इकबाल ने अपनी मशहूर रचना 'सारे जहां से अच्छा, हिंदुस्ता हमारा' पहली बार गाकर सुनाई थी। बाद में यही #इकबाल मुस्लिम लीग में शामिल होकर अलग पाकिस्तान की मांग करने लगे थे।

◆ आर्यसमाज से जोड़ना चाहते थे परमानंद :
दूसरी तरफ भाई परमानंद उन्हें आर्यसमाज से जोड़ना चाहते थे, उन्होंने उन्हें राजी किया कि वो अमेरिका में आर्यसमाज के प्रचार प्रसार में मदद करेंगे। लाला जी बोस्टन गए, वहां से कैलीफोर्निया गए, लेकिन फिर मेडीटेशन करने हवाई द्वीप के होनोलूलू में चले गए। जहां उनकी मुलाकात जापानी बौद्ध भिक्षुओं से हुई, काफी दिन उनके साथ गुजारे... साथ में वहीं उन्होंने कार्ल मार्क्स को पढ़ा। भाई परमानंद वापस उन्हें कैलीफोर्निया लेकर आए, वो लाला हरदयाल की प्रतिभा को जाया नहीं जाने देना चाहते थे।

◆ कार्ल मार्क्स का असर ये हुआ कि उन्हें मजदूरों की समस्याओं से रूबरू होने का मौका मिला। कैलीफोर्निया आते ही वो मजदूरों की यूनियन से जुड़ गए, वहीं दूसरी तरफ वो भारतीय दर्शन और संस्कृत का प्रचार प्रसार कर रहे थे। ये दक्षिणपंथ और वामपंथ का अनोखा संगम उनके अंदर पैदा हो गया था। बहुत जल्द उन्हें स्टेनफोर्ड यूनीवर्सिटी में इंडियन फिलॉसोफी और संस्कृत का लैक्चरर बनने का मौका मिला लेकिन जिस मजदूर यूनियन से वो जुड़ गए थे, दरअसल वो अराजकता वादियों का बड़ा समूह था। उससे रिश्तों के चलते लाला हरदयाल को स्टेनफोर्ड यूनीवर्सिटी से अपना पद छोड़ना पड़ गया। बाद में हरदयाल जी ने उस समूह से भी दूरी बना ली।

◆ कैलीफोर्निया में बनाया इंडिया हाउस :
कैलीफोर्निया में उनकी मुलाकातें उस सिख समूह से होने लगीं, जो अपने देश को आजाद करवाने के लिए अमेरिका में संघर्ष कर रहा था यानी #गदर_क्रांतिकारी वो उन श्यामजी कृष्ण वर्मा के संपर्क में भी आए, जो #लंदन में #इंडिया_हाउस बनाकर कई क्रांतिकारियों को शरण दे रहे थे। उनको लंदन में स्कॉलरशिप देकर भारत से बुला रहे थे। वीर सावरकर और मदन लाल धींगरा ऐसी ही स्कॉलरशिप पर लंदन आए थे।

◆ श्याम जी कृष्ण वर्मा से प्रेरित होकर लाला हरदयाल ने वैसी ही स्कॉलरशिप अमेरिका में शुरू कर दी, और एक घर इंडिया हाउस की ही तरह कैलीफोर्निया में उन स्टूडेंट्स के लिए खड़ा किया, जिनको स्कॉलरशिप पर अमेरिका पढ़ने के लिए बुलाया जा सकता था। करतार सिंह सराभा और विष्णु पिंगले जैसे 6 भारतीय लड़कों की अमेरिकी में पढ़ाई का इंतजाम किया गया। अमेरिका में उनकी मदद तेजा सिंह और तारक नाथ दास ने की... जबकि स्कॉलरशिप के लिए गुरु गोविंद सिंह एजुकेशनल स्कॉलरशिप फंड बनाने में उनकी मदद अमेरिका के अमीर किसान ज्वाला सिंह जी ने की...

◆ भाषण के बाद देखने लायक था माहौल :
जब दिल्ली में रास बिहारी बोस, बसंत विश्वास और अमीचंद जी ने लॉर्ड हॉर्डिंग पर दिल्ली में घुसते वक्त बम फेंक दिया तो अमेरिका में लाला हरदयाल ने उत्साहित होकर एक जोरदार भाषण दिया.. जिसमें मीर तकी मीर की दो लाइनें पढ़ डालीं -
पगड़ी अपनी सम्भालिएगा मीर,
ये और बस्ती नहीं..! दिल्ली हैं।

◆ ये कार्यक्रम नालंदा हॉस्टल में हुआ था, उनके भाषण के बाद माहौल देखने लायक था। वंदेमातरम गीत पर युवा नाचने गाने लगे... सबको इंतजार था प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन के फंसने का, ताकि उसका फायदा उठाकर गदर क्रांति की जा सकें। सोहन सिंह भखना ने अमेरिका में ही गदर पार्टी की नींव रखी, दुनियाभर के क्रांतिकारियों से हाथ मिलाया। लंदन में श्याम जी कृष्ण वर्मा, भारत में बाघा जतिन और रास बिहारी बोस और अमेरिका में करतार सिंह सराभा और विष्णु पिंगले जैसे युवाओं ने कमान संभाल ली। लाला हरदयाल पत्र पत्रिकाओं में क्रांति के पक्ष में लेख लिख-लिखकर माहौल बनाने में इतने जुट गए थे की अमेरिकी सरकार उनके लेखों से परेशान हो गई। वो फिर से निशाने पर आ चुके थे। वैसे भी ब्रिटेन अब अमेरिका में बसे गदर क्रांतिकारियों के बारे में अमेरिका को आगाह कर रहा था।

◆ खुशी के बीच आई मातमी खबर :
हरदयाल प्रवासी सिखों के बीच अलख जगाने का काम करने लगे थे। वो अपने शानदार भाषणों के जरिए प्रवासी सिखों से भारत माता की सेवा करने के लिए भारत पहुंचने का आह्वान करते थे। माना जाता है कि दस हजार सिख उनसे प्रेरित होकर भारत निकल गए थे। उसी दौरान कामागाटामारू कांड भी हो गया। अप्रैल 1914 में लाला हरदयाल को अमेरिका में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वो किसी तरह निकल भागे और उनकी अगली मंजिल बर्लिन थी। वहां से वो स्वीडन निकल गए, इस तरह कुल 13 भाषाएं हरदयाल सीख गए थे।

◆ इसी बीच, वो अपनी पीएचडी लंदन की एक यूनीवर्सिटी से कर चुके थे। फिर वो लंदन में ही रहने लगे, अंग्रेजी सरकार उनकी हर हरकत पर नजर रखे हुई थी लेकिन वो उनकी नाक के नीचे ही लंदन में जमे रहें। 1927 में देशभक्तों ने उन्हें भारत लाने की काफी कोशिशें की थीं, जो कामयाब नहीं हो पाईं। 1938 में फिर ऐसी कोशिशें की... ब्रिटिश सरकार ने उन्हें भारत जाने की इजाजत दे दी। सब लोग भारत में इंतजार भी करने लगे, देश का माहौल भी काफी बदल चुका था। माना जाने लगा था कि देश को आजादी मिलने में ज्यादा देर नहीं..! लाला लंदन से निकल भी चुके थे कि अमेरिका के फिलाडेल्फिया से खबर आई कि 4 मार्च 1938 को लाला हरदयाल की मृत्यु हो गई है...😰

◆ जहर देने का किया था दावा :
किसी को समझ नहीं आया कि जब वो बेहतर स्वास्थ्य में थे, उन्हें भारत आने की अनुमति भी मिल गई थी लेकिन अचानक उनकी मौत कैसे हो गई..? उनके मित्र हनुमंत सहाय अपने मरने तक आरोप लगाते रहे कि हरदयाल को जहर देकर मारा गया था, उनकी मौत स्वभाविक नहीं थी..! लेकिन देश ना जाने कितने महापुरुषों की ऐसी #संदिग्ध_मौत देख चुका है।😓 श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर लाल बहादुर शास्त्री तक, किसी की मौत का खुलासा आज तक नहीं हुआ। सत्ता के खिलाफ जाने पर ऐसा अंजाम होने की आशंका तो रहती ही है।
साभार : zeenews.india.co.
भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी और 'गदर पार्टी' के संस्थापक #लाला_हरदयाल जी को उनकी जन्म जयंती पर कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि...🙏🏻⛳
भारत माता की जय 🇮🇳
#प्रेरणादायी_व्यक्तित्व

बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

दशहरा पर्व से जुड़ीं परंपराएं एवं कैसे करें शस्त्र पूजन, आप भी जानिए...

प्राचीनकाल से दशहरा (विजयादशमी) पर अपराजिता-पूजा, शमी पूजन, शस्त्र पूजन व सीमोल्लंघन की परंपरा रही है।
 
अपराजिता-पूजा : अपराजिता देवी सकल सिद्धियों की प्रदात्री साश्रात माता दुर्गा का ही अवतार हैं। भगवान श्री राम ने माता अपराजिता का पूजन करके ही रावण से युद्ध करने के लिए विजयदशमी को प्रस्थान किया था। ज्योतिषियों के अनुसार माता अपराजिता की पूजा का समय दोपहर के तत्काल बाद का होता है।
 
शमी पूजन : विजयादशमी के दिन शस्त्रों की पूजा के अलावा शमी के पौधे की पूजा का बेहद ही खास महत्व है। विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमी वृक्ष का पूजन अवश्य किया जाना चाहिए। खासकर क्षत्रियों में इस पूजन का महत्व ज्यादा है। कहा तो यह भी जाता है कि महाभारत के युद्ध में पांडवों ने इसी वृक्ष के ऊपर अपने हथियार छुपाए थे और बाद में उन्हें कौरवों से जीत प्राप्त हुई थी।
शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी। 
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया। तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता।।

शस्त्र पूजन : दशहरा के मौके पर शस्त्रधारियों के लिए हथियारों के पूजन का विशेष महत्व है। इस दिन शस्त्रों की पूजा घरों और सैन्य संगठनों द्वारा की जाती है। नौ दिनों की उपासना के बाद 10वें दिन विजय कामना के साथ शस्त्रों का पूजन किया जाता है। विजयादशमी पर शक्तिरूपा दुर्गा, काली की पूजा के साथ शस्त्र पूजा की परंपरा हिंदू धर्म में लंबे समय से रही है। छत्रपति शिवाजी ने इसी दिन मां दुर्गा को प्रसन्न कर भवानी तलवार प्राप्त की थी।

सीमोल्लंघन : इतिहास में क्षत्रिय राजा इसी अवसर पर सीमोल्लंघन किया करते थे। हालांकि अब यह परंपरा समाप्त हो चुकी है, लेकिन शास्त्रीय आदेश के अनुसार यह प्रगति का प्रतीक है। यह मानव को एक परिधि से संतुष्ट न होकर सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।