शनिवार, 29 अक्टूबर 2022

Bed vs खाट

क्या आपको पता हैं :
सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वजों को क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे..? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट सायंस नहीं हैं..! लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई सायंस नहीं है, लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सकें... चारपाई बनाना एक कला है, उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता हैं।
जब हम सोते हैं, तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं, पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की जोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है।

दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें, सभी में चारपाई की तरह जोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपड़ की जोली का था, लकड़ का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया हैं। चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द का दर्द कभी नहीं होता..! दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती हैं।

डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है, उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं। वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती..! चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक हैं। खटिये को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं।

अगर किसी को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो-तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed-Soar शुरू हो जाता है। भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योंकि इसमें से हवा आर-पार होती रहती हैं।

गर्मियों में इंग्लिश Bed गर्म हो जाता हैं इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती हैं, जबकि चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है। बान की चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शारीर का Acupressure होता रहता हैं।

गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनंद ही और हैं। ताज़ी हवा, बदलता मौसम, तारों की छाव, चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती हैं। हर घर में एक स्वदेशी बाण की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी ही चाहिए।

बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

दुष्कर्मी रावण

आज कल आप जहाँ देखिये रावण को ब्राह्मण बताकर, उसका महिमामंडन करना एक आम बात हो चुकी है। यहां तक की दशहरे पर रावण के प्रतीक को जलाने पर भी विरोध के स्वर जगह-जगह से सुनाई देने लगे हैं। कुछ ब्राह्मण अनजाने में ही हिन्दू धर्म के धुर विरोधी वामपंथियों और धर्म विरोधयों की कुत्सित चालों का अनजाने में ही शिकार बनकर, पूरे हिन्दू समाज में आपसी विद्वेष फ़ैलाने की प्रायोजित चाल का मोहरा बन चुके हैं। वामपंथियों और हिन्दू विरोधियों का ये वही गैंग है, जो कभी होली तो कभी श्राद्ध और कभी भगवान शिव के जलाभिषेक पर सवाल खड़े करता है।

यहाँ आप रावण के उन चौदह प्रकार के दुष्कर्मों का प्रामाणिक वर्णन पढेंगे जिससे आप स्वयं ही रावण की मानसिक प्रवृत्ति और दुर्गुणों का अनुमान लगा सकते हैं और आपको यह ज्ञात हो जायेगा कि रावण का महिमामंडन करने वाले किस प्रकार मानवता एवं हिन्दू धर्म के विरोधी हैं।

१- ब्रह्महत्यारा रावण - जो ब्राह्मण, रावण को ब्राह्मण बताकर अपनी छाती फुलाते हैं, वे जान लें कि उनके पूर्वजों की हत्या रावण ने की थी। वह ब्राह्मण द्रोही था, रावण ने हजारों ब्राह्मण साधुओं की हत्या सिर्फ इसलिए करवा दी क्योंकि वो भगवान का हवन-पूजन इत्यादि धार्मिक कर्म करते थे -

" प्राप्तयज्ञहरं दुष्टं ब्रह्मघ्नं क्रूरकारिणम्। " - (वा०रा० ०३-३२-२०)

२- महाकामी रावण - रावण वासना का आदी था, इसमें कदापि संदेह नहीं है। रम्भा, पुजिकस्थला नामक अप्सराएँ और यहाँ तक की अपने भाई कुबेर के पुत्र नल कुबेर की पत्नी के साथ भी रावण ने व्याभिचार किया था। साथ ही अनेक अप्सराओं एवं देवकन्याओं का हरण एवं शीलभंग उसने किया था, यह वाल्मीकीय रामायण से ज्ञात हो जाता है।

३-. शराबी रावण - रावण शराब का सेवन करता था, अर्थात् वह शराबी भी था। स्वयं उसकी बहन शूर्पणखा उसे कोसती हुई कहती है -

"करसि पान सोवसि दिन राती।

सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।" - मानस ०३-२१-०७

अर्थात् तेरे सिर पर संकट आ खड़ा है और तू(रावण) है कि शराब पीकर दिन-रात सोता रहता है।

४-. यज्ञ नष्ट करने वाला रावण - "प्राप्तयज्ञहरं" अर्थात् रावण यज्ञ को नष्ट कर देने वाला था। विश्वामित्रादि मुनियों को सताने के लिए एवं उनके यज्ञों को नष्ट करने के लिए ही उसने ताड़का, मारीच, सुबाहु इत्यादि को नियुक्त कर रखा था।

५-. महाक्रोधी रावण- भगवतगीता में कहा गया है कि काम में बाधा उत्पन्न होने पर वह क्रोध में परिवर्तित हो जाता है -

"काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।" - ( गीता ०३-३७ )

रावण को इतना क्रोध था कि वह अशोक वाटिका में "वार्यमाणः सुसंक्रुद्ध: "- ( वा०रा० युद्धकाण्ड९२/४५) सीताजी को मारने दौड़ा।

इसके ठीक पहले अर्थात् चौवालीसवें श्लोक में रावण के लिए "रावणः क्रोधमूर्छित:" शब्द का प्रयोग किया गया अर्थात् रावण क्रोध से अचेत-सा होकर सीताजी की ओर दौड़ा...

६- शिवद्रोही रावण - भुजाओं पर कैलाश को उठाना, साक्षात् शिव हनुमान् जी का अपमान करना और शिव के बारम्बार समझाने पर भी उनकी बात न मानना, उनकी अवहेलना करना, ये सभी तथ्य रावण को शिवभक्त से अधिक शिवद्रोही के रूप में प्रदर्शित करते हैं। भक्त का स्वरूप तो भगवान के प्रति समर्पण होता है, न कि स्वयं को भगवान से उच्च सिद्ध करने का प्रयास...

७--. अतिलोभी रावण - शिवजी ने पार्वतीजी के लिए स्वर्णमयी लंका की रचना कराई परन्तु लोभी रावण ने ब्राह्मण रूप धारण कर, उसे भी शंकर जी से ले लिया। इसके अलावा अपने भाई कुबेर से उसने बलपूर्वक पुष्पक विमान भी छीन लिया।

८. गाली देने वाला रावण - रावण गाली-गलौज भी करता था। मारीच को रावण ने कैसे गाली दी, इसे गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में पढ़िए -
"जाहु भवन कुल कुसल बिचारी।
सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।" - (मानस ०३-२६-०१)


९. बहनोई का हत्यारा रावण - जिस शूर्पणखा के अपमान का बदला रावण द्वारा लिए जाने की बात लोग कहते हैं, उस शूर्पणखा को विधवा भी रावण ने ही बनाया था। उसके पति विद्युतमाली की हत्या रावण ने की थी। वस्तुतः रावण ने शूर्पणखा के अपमान का कोई बदला नहीं लिया बल्कि सीताजी के सौंदर्य का स्मरण कर उसके मन मे काम उदित हो आया तथा श्रीराम के प्रति द्वेष बुद्धि का भी उदय हो गया।


१०. नारी द्रोही रावण - रावण नारी का अपमान करने के लिए कुख्यात था। महिलाओं का शील भंग करना तो उसके बाएँ हाथ का खेल था। पुत्र वधू रम्भा का बलात्कार करने में भी उसे तनिक लज्जा की अनुभूति नहीं हुई।
इधर-उधर से उसने अनेक स्त्रियों का अपहरण भी किया था -
"बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्ततः।
सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव।।" (वा०रा० ०३.४७.२८)

११. गौ हत्यारा रावण - रावण और उसकी सेना गौ और ब्राह्मण की हत्या करते थे। प्रमाण देखिए...
"जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं।
नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।" -(मानस०१-१८३-०६,)

१२. वेदों का विरोधी रावण – कहा जाता है कि रावण चारों वेदों का ज्ञाता था किन्तु रावण के सारे काम वेद विरोधी थे। वेद-पुराण का अध्ययन एवं श्रवण करने वालों को वह प्रताड़ित करता था -
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।। - (मानस ०१-१८३-०५)
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।। - (मानस ०१- १८३- ०८)
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।। - ( मानस ०१- १८३- छंद )

१३. बूढ़ों का अपमान करने वाला रावण - रावण वृद्धजनों का अपमान करता था। वयोवृद्ध माल्यवंत को फटकारते हुए रावण ने कहा था कि " याद रख! तू बूढ़ा हो गया है इसलिए तुझे पीट नहीं रहा हूँ।"
"ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे।।
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही।।" - ( मानस ०६-४९-०३)

१४. बहुरूपिया छली रावण - सन्यासी का रूप धारण कर अकेली महिला का अपहरण करने वाले को आप छली नहीं तो क्या योद्धा कहेंगे..? यदि रावण इतना ही बड़ा योद्धा था, तो फिर रामजी की उपस्थिति में सीताजी का हरण क्यों नहीं किया..! विचार करें...

इस लेख में संक्षिप्त रूप से रावण के चौदह दुर्गुणों की चर्चा की गयी है। यहाँ एक और बात स्मरण में रखें कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ही हमारे आदर्श हो सकते हैं, रावण जैसा दुष्कर्मी कदापि नहीं..!


✍🏻पं. अनुराग मिश्र “अनु”
आध्यात्मिक लेखक व कवि

गुरुवार, 29 सितंबर 2022

मैं आपका चेहरा याद रखना चाहता हूं...

 एक टेलीफोन साक्षात्कार में भारतीय अरबपति रतनजी टाटा से रेडियो प्रस्तोता ने पूछा : सर आपको क्या याद है कि आपको जीवन में सबसे अधिक खुशी कब मिली..?

रतनजी टाटा ने कहा : मैं जीवन में खुशी के चार चरणों से गुजरा हूं और आखिरकार मुझे सच्चे सुख का अर्थ समझ में आया।
पहला चरण धन और साधन संचय करना था लेकिन इस स्तर पर मुझे वह सुख नहीं मिला, जो मैं चाहता था।
फिर क़ीमती सामान और वस्तुओं को इकट्ठा करने का दूसरा चरण आया, लेकिन मैंने महसूस किया कि इस चीज का असर भी अस्थायी होता है और कीमती चीजों की चमक ज्यादा देर तक नहीं रहती..!
फिर आया बड़ा प्रोजेक्ट मिलने का तीसरा चरण... वह तब था जब भारत और अफ्रीका में डीजल की आपूर्ति का 95% मेरे पास था, मैं भारत और एशिया में सबसे बड़ा इस्पात कारखाने मालिक भी था, लेकिन यहां भी मुझे वो खुशी नहीं मिली जिसकी मैंने कल्पना की थी।
चौथा चरण वह समय था, जब मेरे एक मित्र ने मुझे कुछ विकलांग बच्चों के लिए व्हील चेयर खरीदने के लिए कहा... लगभग 200 बच्चे थे, दोस्त के कहने पर मैंने तुरन्त व्हील चेयर खरीद ली... लेकिन दोस्त ने ज़िद की कि मैं उसके साथ जाऊं और बच्चों को व्हील चेयर भेंट करूँ... मैं तैयार होकर उनके साथ चल दिया, वहाँ मैंने सारे पात्र बच्चों को अपने हाथों से व्हील चेयर दीं... मैंने इन बच्चों के चेहरों पर खुशी की अजीब सी चमक देखी... मैंने उन सभी को व्हील चेयर पर बैठे, घूमते और मस्ती करते देखा... यह ऐसा था जैसे वे किसी पिकनिक स्पॉट पर पहुंच गए हों, जहां वे बड़ा उपहार जीतकर शेयर कर रहे हो... मुझे उस दिन अपने अन्दर असली खुशी महसूस हुई।
जब मैं वहाँ से वापस जाने को हुआ तो उन बच्चों में से एक ने मेरी टांग पकड़ ली, मैंने धीरे से अपने पैर को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन बच्चे ने मुझे नहीं छोड़ा और उसने मेरे चेहरे को देखा और मेरे पैरों को और कसकर पकड़ लिया।
मैं झुक गया और बच्चे से पूछा : क्या तुम्हें कुछ और चाहिए..?
तब उस बच्चे ने मुझे जो जवाब दिया, उसने न केवल मुझे झकझोर दिया बल्कि जीवन के प्रति मेरे दृष्टिकोण को भी पूरी तरह से बदल दिया।
उस बच्चे ने कहा था- मैं आपका चेहरा याद रखना चाहता हूं ताकि जब मैं आपसे स्वर्ग में मिलूं, तो मैं आपको पहचान सकूं और एक बार फिर आपका धन्यवाद कर सकूं...

उपरोक्त शानदार कहानी का मर्म यह है कि हम सभी को अपने अंतर्मन में झांकना चाहिए और यह मनन अवश्य करना चाहिए कि इस जीवन और संसार और सारी सांसारिक गतिविधियों
को छोड़ने के बाद आपको किसलिए याद किया जाएगा..?

क्या कोई आपका चेहरा फिर से देखना चाहेगा..! यह बहुत मायने रखता हैं।

         रतन टाटा जी 25 वर्ष         रतन टाटा जी 84 वर्ष
साभार

चार युग और उनकी विशेषताएं...

युग शब्द का अर्थ होता है "एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि" जैसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग आदि... आज हम चारों युगों का वर्णन करेंगें... 
युग वर्णन से तात्पर्य है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में विस्तार से परिचय देना... 
प्रत्येक युग के वर्ष प्रमाण और उनकी विस्तृत जानकारी कुछ इस तरह है...

1. सत्ययुग: यह प्रथम युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है...

सत्ययुग का तीर्थ: पुष्कर है।

इस युग में पाप की मात्र: 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है।
इस युग में पुण्य की मात्रा: 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती हैं।

इस युग के अवतार: मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) है। अवतार होने का कारण, शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए...

इस युग की मुद्रा: रत्नमय है।
इस युग के पात्र: स्वर्ण के है।
काल: 17,28000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई: 32 फ़ीट
आयु: 1 लाख वर्ष

2. त्रेतायुग: यह द्वितीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है...

त्रेतायुग का तीर्थ: नैमिषारण्य है।

इस युग में पाप की मात्रा: 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है।
इस युग में पुण्य की मात्रा: 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है।
इस युग के अवतार: वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर)

अवतार होने के कारण: बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए...

इस युग की मुद्रा: स्वर्ण है।
इस युग के पात्र: चाँदी के है।
काल: 12,96,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई: 21 फ़ीट
आयु: 10,000 वर्ष

3. द्वापरयुग: यह तृतीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है...

द्वापरयुग का तीर्थ: कुरुक्षेत्र है।

इस युग में पाप की मात्रा: 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है।
इस युग में पुण्य की मात्रा: 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है।
इस युग के अवतार: कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण)

अवतार होने के कारण: कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए...

इस युग की मुद्रा: चाँदी है।
इस युग के पात्र: ताम्र के हैं।
काल: 8,64,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई: 11 फ़ीट
आयु: 1,000 वर्ष

4. कलियुग: यह चतुर्थ युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है...

कलियुग का तीर्थ: गंगा है।

इस युग में पाप की मात्रा: 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है।
इस युग में पुण्य की मात्रा: 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है।
इस युग के अवतार: कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर)

अवतार होने के कारण: मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए...

इस युग की मुद्रा: लोहा है।
इस युग के पात्र: मिट्टी के है।
काल: 4,32,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई: 5.5 फ़ीट
आयु: 60-100 वर्ष

गुरुवार, 30 जून 2022

भगवान जगन्नाथ जी रथ यात्रा विस्तृत जानकारी...

हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथजी की पुरी में रथ यात्रा निकाली जाती है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ भी निकाला जाता है। इस रथ यात्रा को लेकर मान्यता है कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी। तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन की इच्छा पूर्ति के लिए उन्हें रथ में बिठाकर पूरे नगर का भ्रमण करवाया था और इसके बाद से इस रथयात्रा की शुरुआत हुई थी। जगन्नाथजी की रथ यात्रा के बारे में स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी बताया गया है। इसलिए हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक  मान्यताओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति इस रथयात्रा में शामिल होकर इस रथ को खींचता है उसे सौ यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
800 साल पुराने इस मंदिर में भगवान कृष्ण को जगत के नाथ जगन्नाथजी के रूप में पूजा जाता है और इनके साथ उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी विराजमान हैं। रथयात्रा में तीनों ही देवों के रथ निकलते हैं। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के साथ भाई बलराम और बहन सुभद्रा के लिए अलग-अलग रथ होते हैं और इन रथों को बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया से होती है। रथयात्रा में सबसे आगे बलराम और बीच में बहन सुभद्रा का रथ रहता है। सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। सभी के रथ अलग-अलग रंग और ऊंचाई के होते हैं। 

भगवान बलरामजी के रथ को 'तालध्वज' कहा जाता है और इसकी पहचान लाल और हरे रंग से होती है। वहीं सुभद्रा के रथ का नाम 'दर्पदलन' अथवा ‘पद्म रथ’ है,उनके रथ का रंग काला या नीले रंग को होता है, जिसमें लाल रंग भी होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष अथवा गरुड़ध्वज कहा जाता है, इनका रथ लाल और पीले रंग का होता है।

रथ हमेशा नीम की लकड़ी से बनाया जाता है, क्योंकि ये औषधीय लकड़ी होने के साथ पवित्र भी मानी जाती है। हर साल बनने वाले ये रथ एक समान ऊंचाई के ही बनाए जाते हैं। इसमें भगवान जगन्नाथ का रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलराम का रथ 45 फीट और देवी सुभद्रा का रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है। 
 
भगवान के रथ में एक भी कील या कांटे आदि का प्रयोग नहीं होता, यहां तक की कोई धातु भी रथ में नहीं लगाई जाती है। रथ की लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के दिन और रथ बनाने की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन से होती है। तीनों रथ के तैयार होने के बाद इसकी पूजा के लिए पुरी के गजपति राजा की पालकी आती है। इस पूजा अनुष्ठान को 'छर पहनरा' नाम से जाना जाता है। इन तीनों रथों की वे विधिवत पूजा करते हैं और ‘सोने की झाड़ू’ से रथ मण्डप और यात्रा वाले रास्ते को साफ किया जाता है।

रथयात्रा ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के साथ रथ को लोग खींचते हैं। जिसे रथ खींचने का सौभाग्य मिल जाता है, वह महाभाग्यशाली माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर से रथ यात्रा शुरू होकर 3 कि.मी. दूर गुंडीचा मंदिर पहुँचती है। इस स्थान को भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यहीं पर विश्वकर्मा जी ने इन तीनों प्रतिमाओं का निर्माण किया था, अतः यह स्थान जगन्नाथ जी की जन्म स्थली भी है। यहां तीनों देव सात दिनों के लिए विश्राम करते हैं। आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुनः मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। वापसी की यह यात्रा "बहुड़ा यात्रा" कहलाती है। जगन्नाथ मंदिर पहुँचने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच देव-विग्रहों को पुनः प्रतिष्ठित किया जाता हैं।

स्कंद पुराण में वर्णित है कि जो व्यक्ति रथ यात्रा में शामिल होकर जगत के स्वामी जगन्नाथजी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा नगर तक जाता है, वह सारे कष्टों से मुक्त हो जाता है जबकि जो व्यक्ति जगन्नाथ को प्रणाम करते हुए मार्ग के धूल-कीचड़ आदि में लोट-लोट कर जाता है, वो सीधे भगवान विष्णु के उत्तम धाम को प्राप्त होता है और जो व्यक्ति गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा को आते हुए करता है, उसे मोक्ष मिलता है।

✍🏻श्री हरि चरणों का दास - सुनील मिश्रा ⛳

शनिवार, 21 मई 2022

पित्तदोष


जाने पित्तदोष एवं पित्त के प्रकार

पित्त की वृद्धि ~72~ से ज्यादा रोगों का कारण हैं।

जरूर जानिए पित्त के ~5~ भेद, ~64~ लक्षण, ~13~ प्रकृति और दस उपाय...

•चिड़चिड़ाने वाला क्रोधित स्वभाव, •बात-बात पर गुस्सा,
•निगेटिव सोच, •धैर्य की कमी, 
•जल्दबाज़ी और •देह में दुर्गंध, 
ये सारी परेशानियां पित्त प्रकृति वाले पुरूष-स्त्री की बहुत हद तक मेल खाती हैं।
पित्त bile या gall गहरे हरे-पीले रंग का द्रव है, जो पाचन में मदद करता हैं।
इस लेख/ब्लॉग में हम आपको पित्त प्रकृति के गुण, लक्षण और इसे संतुलित करने के उपायों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं-
【१】पित्त दोष क्या है?
【२】पित्त का स्वभाव
【३】पित्त के लक्षण,
【४】पित्त के प्रकार, भेद-गुण।
【५】पित्त का स्वभाव,
【६】पित्त प्रकृति की विशेषता,
【७】पित्त के पित्त बढ़ने के कारण,
【८】पित्त की कमी के लक्षण-उपचार,
【९】पित्त संतुलन के उपाय,
【१०】पित्तदोष की दवा/चिकित्सा

पित्त क्या होता हैं...
कभी-कभी पाचनतंत्र की कमजोरी के कारण भोजन न पचने से सुबह के समय अथवा किसी रोग की अवस्था में वमन या उल्टी करते समय जो हरे व पीले रंग का तरल पदार्थ मुँह के रास्ते बाहर आता है, उसे हम पित्त कहते हैं।
पित्त शब्द संस्कृत के ‘तप‘ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है-शरीर में जो तत्व गर्मी उत्पन्न करता है, वही पित्त है।
यह शरीर में उत्पन्न होने वाले प्रकिण्व (★एंजाइम) और कार्बनिक रस (★हार्मोन) को नियंत्रित करता है।

★ एंजाइम के कार्य :-
भोजन को पचाने, मांसपेशियों के बनने और शरीर में विषाक्त पदार्थ खत्म करने के साथ शरीर के हजारों कामों को करने के लिए आवश्यक होते हैं।

★ हार्मोन्स के कार्य :-
हार्मोन शरीर के लिए महत्वपूर्ण रस हैं। शरीर के बढ़ने, उपापचय (मेटाबोलिज्म), यौन या सम्भोग गतिविधियों, प्रजनन और सेक्स मूड (mood) आदि क्रियाओं में हार्मोन विशेष भूमिका अदा करते हैं।

अंग्रेजी भाषा में पित्त को फायर बताया हैं।

पित्त का पॉवर बताने वाले ~9~ सन्दर्भ ग्रन्थ-के नाम…
{१} धन्वन्तरि कृत आयुर्वेदिक निधण्टु
{२} आयुर्विज्ञान ग्रंथमाला
{३} आयुर्वेद द्रव्यगुण विज्ञान
{४} आयुर्वेदिक काय चिकित्सा
{५} आयुर्वेद सारः संग्रह
{६} भावप्रकाश निघण्टु
{७} सुश्रुत सहिंता
{८} चरक सहिंता एवं
{९} वाग्भट्ट आदि ये सब ग्रन्थ

5000 वर्षों से भी प्राचीन हैं और आयुर्वेद की अमूल्य धरोहर है।
आयुर्वेद के आचार्य चरक के अनुसार-
~”दोष धातु मल मूलं हि शरीरम्“~
भावार्थ- वात, पित्‍त, कफ अंसतुलित (unbalanced) होने पर त्रिदोष कहलाते हैं। वात-पित्त-कफ, तीनों में से
कोई भी एक विषम होने पर देह की धातु और मल को दूषित कर देते हैं।
त्रिदोष रहित मनुष्य सदैव सुखी-स्वस्थ्य तनावमुक्त और प्रसन्नपूर्वक रहता है।

पित्त का स्वरूप…
तस्मात् तेजोमयं पित्तं पित्तोष्मा य: स पक्तिमान। (भोज)
अर्थात- पित्त देह में अग्निभाव का घोतक है। पित्त अग्नि के सामान गुण कर्म वाला होता है। तन को जीवित बनाये रखने में पित्त ही सहायक है।
अतः बाह्रलोक में जो अग्नि का महत्व है, वही शरीर में पित्त का है।
संस्कृत के मन्त्र मुताबिक-
सस्नेह मुष्णम् तीक्षणं च द्रव्यमग्लं सरं कटु!! (चरक)
पित्त भी पंचमहाभूतों में से एक अग्नि का प्रतिनिधि द्रव्य है।

■ शरीर में पित्त रहने का स्थान...
अग्नाशय यानि पेनक्रियाज (pancreas),
यकृत/लिवर (liver)
प्लीहा/तिल्ली (spleen)
हृदय, दोनों नेत्र, सम्पूर्ण देह और त्वचा/स्किन में पित्त निवास करता है।

■ 5 प्रकार के पित्त…
अमाशय (stomach) में पाचक पित्त,
यकृत तथा तिल्ली में रंजक पित्त,
ह्रदय में साधक पित्त,
सारे शरीर में भ्राजक पित्त और
दोनों आंखों में आलोचक पित्त रहता है।

यदि दृष्टि आलोचक अधिक है, तो ऐसे लोग पित्त प्रकोप से पीड़ित रहते हैं, यह भी एक पहचान है। इसलिए किसी ने पित्त दोष का एक बेहतरीन इलाज कविता द्वारा बताया है-
नजरों को बदले, तो नजारे बदल जाते हैं।
सोच को बदलते ही सितारे बदल जाते हैं।
 
■ शरीर में पित्त के कार्य....
!!”सत्वरजोबहुलोऽग्न“!!
पित्त के दो कार्य या कर्म हैं-
पहला प्राकृत कर्म यानि नेचुरल और
दूसरा है-वैकृत (deformed)कर्म
जब पित्त प्रकृतावस्था अर्थात नेचुरल स्थिति में रहता है, तब पित्त के द्वारा सम्पन्न होने वाला प्रत्येक कार्य शरीर के लिए उपयोगी और स्वस्थ्य रखने वाला होता है।
लेकिन वही नेचुरल/प्राकृत पित्त, जब विकृत यानि असन्तुलित होकर दूषित हो जाता है, तो वह पित्त शरीर को विकारग्रस्त बनाकर बीमारियों का अंबार लगा देता है तथा देह में पित्त जनित रोग उत्पन्न होने लगते हैं।

पित्तदोष असंतुलन के लक्षण...
पित्त पीड़ित स्त्री-पुरुषों को ये अवरोध उत्पन्न होने लगते हैं। जैसे-
1~मल-मूत्र साफ और खुलकर नहीं आता..!
2~शुक्र यानि वीर्य पतला होने लगता है।
3~अग्निस्तम्भन, यानि फुर्तीलापन का नाश...
4~बार-बार खट्टी डकारें आती हैं।
5~भूख-प्यास, निद्रा समय पर नहीं लगती..!
6~गले में खराश बनी रहना...
7~खाना न खाने पर जी मितली...
8~स्‍तनों या लिंग को छूने पर दर्द होना...
9~हार्मोनल असंतुलन..
10~माहवारी के दौरान दर्द होना...
11~माहवारी के समय ज्‍यादा खून आना...
12~धैर्य की कमी, चिड़चिड़ापन, नाराज़गी,
13~ईर्ष्या, जलन-कुढ़न, द्वेष-दुर्भावना और
अस्थिरता की भावना रहती है।
14~युवावस्था में बाल सफेद होना...
15~नेत्र लाल या पीेले होना।
16~गर्म पेशाब आना, जलन होना।
17~पेशाब का रंग लाल या पीला होना।
18~अचानक कब्ज या दस्त लगना...
19~नकसीर फूटना, नाक से रक्त बहना।
20~नाखून  और देह पीली पड़ना।
21~ठण्डी चीजें अच्छी लगना।
22~कभी भी शरीर में फोड़े-फुंसी,
23~त्वचारोग, स्किन डिसीज होना।
24~बेचैनी, घबराहट, चिन्ता, डर, भय।
25~अवसाद (डिप्रेशन) होना इत्यादि

पित्त क्षय के लक्षण- असंतुलन
26~ जिस तरह वायु घटती-बढ़ती रहती है, उसी प्रकार पित्त जब कम होता है, तब देह की अग्नि मंद, गर्मी कम तथा शरीर
की रौनक समाप्त होने लगती है।
27~ काया का उचित विकास नहीं हो पाता..! 
~ जवानी के दिनों में बुढापे के लक्षण प्रतीत होते हैं।

पित्त-वृद्धि के लक्षण…
28~ तन में पित्त की अधिकता होने से शरीर पीला पड़ने लगता है।
29~ बार-बार पीलिया की समस्या होने लगती है।
30~ नया खून बनना कम हो जाता है।
31~ सदैव सन्ताप, दुःख, आत्मग्लानि का भाव उत्पन्न बना रहता है।
32~ किसी काम में मन नहीं लगता..!
33~ जीवन के प्रति उत्साह, उमंग क्षीण होने लगता है।
34~ जीने की चाह नहीं रहती।
35~ नींद कम आती है,
36~ सुस्ती, बेहोशी छाई रहती है।
37~ देह बलहीन तथा कामेन्द्रियाँ शिथिल होकर, नपुंसकता आने लगती है।
38~ सहवास या सेक्स की इच्छा नहीं रहती..!
39~ पेशाब पीला उतरता है तथा आंखे पीली हो जाती हैं।

पित्त-प्रकोप के लक्षण…
40~ देह में जब लम्बे समय तक गर्माहट, जलन का अनुभव करें,
41~ ऐसा महसूस हो जैसे धकधक आग जल रही हो, धुंआ सा निकलता मालूम होवे...
42~ बहुत ज्यादा खट्टी डकारें आयें।
43~ अन्तर्दाह हो, त्वचा या चमड़ा जलने लगे से अनुभव हो।
44~ लाल-लाल चकत्ते, फोड़े-फुंसी, मुहांसे होने लगे।
45~ कांख यानि बगल में कखलाई हो।
46~ मस्तिष्क में गर्मी, बेचैनी बहुत लगे।
47~ अत्यन्त स्वेद यानि पसीना आता हो।
48~ शरीर से बेकार सी बदबू आती हो।
49~ शरीर का कभी भी कोई अंग और अवयव फटने लगे।
50~ मुहँ में सदा कड़वाहट रहती हो।
51~ आंखों के सामने अंधेरा छाया रहे।
52~ स्किन हल्दी के रंग की होने लगे।
53~ मूत्र बहुत कम एव लाल-पीला एवं जलन के साथ होता हो।
54~ मल-मूत्र और नेत्र हरे या पीले हो।
55~ दस्त हमेशा पतला आता हो।
56~ पखाना नियमित न होना, बंधकर नहीं आना एक बार में पेट साफ न होना आदि।
57~ काला-पीला, ज्यादा गिला और चिकनाई  लिए मल का आना कफ, पित्त के कोप को इंगित करता है।
58~ पित्त दोष के रोगी का शरीर अक्सर गर्म सा रहता है।
 59~ पित्त रोगी चमकीले पदार्थ या वस्तु देखने में असहज महसूस करता है।
60~ पित्त दोष वाले व्यक्ति की जीभ अधिक लाल, काली, कड़वी और काँटों जैसी खुरखुरी हो जाती है।
61~ पित्त के असंतुलन से हिक्का रोग यानि बार-बार हिचकी भी आती हैं।
62~ आन-तान, बड़बड़ बकना इत्यादि पित्त के कुपित होने के लक्षण हैं।
63~ पित्त प्रकृति वालों को अक्सर पित्त ज्वर एवं रक्त-पित्त ज्वर हमेशा बीमार बनाये रखते हैं।
64~ कई बार ऐसा देखा गया है कि पित्त प्रधान व्यक्ति के बाल कम आयु में ही झड़कर गिरने तथा सफेद होने
लगते हैं।
पित्त से पीड़ित स्त्री-पुरुष की प्रकृति उपरोक्तानुसार हो, तो जान लें कि ये सारे लक्षण पित्त प्रकृति स्त्री-पुरुषों के हैं।
आयुर्वेद या अन्य चिकित्‍सा पद्धतियों में त्रिदोष अर्थात वात-पित्त और कफ प्रकृति के आधार पर व्‍यक्‍ति के रोगों को निर्धारित किया जाता है।

पित्त का स्वरूप…
पित्त एक तरह का पतला द्रव्य यह गर्म होता है। आमदोष से मिले पित्त का रंग नीला और आम दोष से भिन्न पीले रंग का होता है।

जब पित्त, आम दोष से मिल जाता है, तो उसे साम पित्त कहते हैं। सामपित्त दुर्गन्धयुक्त खट्टा, स्थिर, भारी और हरे या काले रंग का होता है। साम पित्त होने पर खट्टी डकारें आती हैं और इससे छाती व गले में जलन होती है।

■ कैसे पहचाने ‘13‘ पित्त प्रकृति को…
√ शरीर में से बहुत तेज दुर्गंध आती है?
√ बहुत जल्दी क्रोधित या गुस्सा हो जाते हैं।
√ स्वभाव अत्यन्त चिड़चिड़ा हो रहा है।
√ नकारात्मक विचार अधिक आते हों।
√ बार-बार बहुत भूख लगती हो।
√ ज्यादा समय तक भूखे नहीं रह पाते हो।
√ बाल ज्यादा झड़ते-टूटते हों।
√ युवावस्था में गंजेपन का शिकार होना।
√ हमेशा सिरदर्द या माइग्रेन बना रहता हो।
√ मुँह का स्वाद कड़वा, कसैला, खट्टा होना।
√ जीभ व आंखों का रंग लाल रहना।
√ शरीर गर्म, पेशाब का रंग पीला होता है।
√ अत्याधिक बार-बार पसीना आता है।

■ पित्त 2 तत्वों से निर्मित है...
शरीर में पित्त का निर्माण पंचतत्व में से ~2~ अग्नि तथा जल तत्व से हुआ है।
जल इस अग्नि के साथ मिलकर इसकी तीव्रता को शरीर की जरूरत के अनुसार पित्त सन्तुलित करता है।

■ नर-नारी निर्माता नारायण द्वारा मानव शरीर में इसे जल में धारण करवाया है, जिस का अर्थ है कि पित्त की अतिरिक्त गर्मी को जल द्वारा नियन्त्रित करके उसे शरीर की ऊर्जा के रूप में प्रयोग में लाना।

■ पित्त, अग्नि का दूसरा नाम है। अग्नि के दो गुण विशेष होते है। पहला-वस्तु को जलाकर नष्ट करना, दूसरा कार्य है-ऊर्जा देना।
पित्त से हमारा अभिप्राय हमारे शरीर की गर्मी से है। शरीर को गर्मी देकर, ऊर्जा दायक तत्व ही पित्त कहलाता है।

■ पित्त परमात्मा स्वरूप है–
पित्त शरीर का पोषण करता हैं। पित्त शरीर को बल देने वाला है। भोजन को पचाने में लारग्रंथि, अमाशय, अग्नाशय, लीवर व
छोटी आँत से निकलने वाला रस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

■ क्यों जरूरी है सन्तुलित पित्त रहना…
# पित्त जीवन-मृत्यु विधाता है।
# पित्त के विषम या अशांत होने से...
# विकार पैदा होने लगते हैं।
# पित्त की सन्तुलित गर्मी से प्राणी जीवित रहता है।

पित्त का शरीर में कितना महत्व है, इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि # जब तक यह शरीर गर्म है, तब तक
यह जीवन है। जब शरीर ठण्डा हो जाता है, तो उस व्यक्ति को मरा हुआ या मृत घोषित कर दिया जाता है।

■ पित्त का स्वाद, रंग और वजन...
पेट में बनने वाला पित्त स्वाद में खट्टा, कड़वा व कसैला होता है। इसका रंग नीला, हरा व पीला हो सकता है।
पित्त शरीर में तरल पदार्थ के रूप में पाया जाता है। यह वज़न में वात की अपेक्षा भारी तथा कफ की तुलना में हल्का होता है।
पित्त सम्पूर्ण शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में रहता है लेकिन इसका मुख्य स्थान हृदय से नाभि तक है।

■ ऋतु अनुसार पित्त की स्थिति….
मौसम की दृष्टि से बरसात के दौरान यह मई महीने से सितम्बर तक तथा दिन में दोपहर के समय तथा भोजन पचने के दौरान पित्त अधिक मात्रा में बनता है। युवावस्था में शरीर में पित्त
का निर्माण अधिक होता है।

■ पित्त के सम होने से लाभ…
पित्त हमारे पाचन को नियंत्रित करता है। शरीर के तापमान को बनाए रखता है, त्‍वचा की रंगत, बुद्धि और भावनाओं पर भी पित्त का प्रभाव होता है। पित्त में असंतुलन आने के कारण व्‍यक्‍ति शारीरिक और भावनात्‍मक रूप से अस्‍वस्‍थ होने
लगता है। अकेला पित्त शक्तिशाली आदमी को पल में चित्त करने की क्षमता रखता है।

वायु की तरह पित्त भी नाम, स्थान एवं क्रियाओं के भेद से पित्त पाँच प्रकार का होता है- 
पित्त को हमारे शरीर में क्षेत्र व कार्य के आधार पर पाँच भागों में बाँटा गया है।
ये इस प्रकार हैः-
(एक) पाचक पित्त- यह अमाशय और पक्वाशय (duodenum) के बीच में रहकर छह तरह के आहारों को
पचाने में मददगार है और शेषाग्नि बल की वृद्धि कर- रस, मूत्र, मल आदि को अलग-अलग करता है।
पाचक पित्त का कार्य…
इसका मुख्य कार्य भोजन में मिलकर, उसका शोषण करना है। यह भोजन को पचा कर पाचक रस व मल को अलग-अलग करता है।
पाचक पित्तः-पाचक पित्त पंचअग्नियों (पाचक ग्रन्थियों) से निकलने वाले रसों का सम्मिश्रित रूप है। इसमें अग्नि तत्व की प्रधानता पायी जाती है।
ये पाँच रस इस प्रकार हैः-
1- लार ग्रन्थियों से बनने वाला लाररस
2- आमाशय में बनने वाला आमाशीय रस
3– अग्नाशय का स्त्राव।
4- पित्ताशय से बनने वाला पित्त रस।
5- आन्त्र रस।
यह पक्कवाशय में रहते हुए दूसरे पाचक रसों को शक्ति देता है। शरीर को गर्म रखना भी इसका मुख्य कार्य है।
पाचक पित्त मुख्यतः उदर में स्थित अमाशय और पक्वाशय में रहकर ही, अपनी पाचक शक्ति से शरीर के शेष अवयव यकृत, त्वचा, नेत्र आदि स्थानों सहित पूरे देह का पोषण (nutrition) न्यूट्रिशन करता है।
इसी पित्त को जठराग्नि अथवा पाचक अग्नि भी कहते हैं।
यह अग्नि कांच के पात्र में दीपक के समान है। यही अग्नि अनेक प्रकार के व्यंजनों तथा भोजन को पचाती है।
 
■ पित्त की अग्नि किसमें-कितनी…
बड़े विशाल देहधारियों में यह अग्नि जौ के बराबर, 
छोटे शरीर वालों यानि मानव शरीर में यह तिल के बराबर और अतिसूक्ष्म किट-पतंगों में बाल की नोंक के समान प्रज्वलित
रहती है।
पाचक पित्त अन्न रस का पाचन कर शरीर के संक्रमण, रोगाणु, विषाणु और बैक्टीरिया का नाश करता है।
यदि शरीर में पाचक पित्त सम अवस्था में बनता है, तो हमारा पाचनतन्त्र सुदृढ़ रहता है। जब शरीर में पाचन और निष्कासन क्रियाएं ठीक रहती हैं।

पित्त प्रकोप के दुष्प्रभाव…
जब देह में पाचक पित्त कुपित होता है,
तो शरीर में नीचे लिखे रोग हो सकते है-
¶ जठराग्नि का मन्द होना...
¶ दस्त लगना...
¶ खूनी पेचिश...
¶ कब्ज बनना...
¶ अम्लपित्त (एसिडिटी)
¶ अल्सर (पेेेट का फोड़ा, घाव)
¶ मधुमेह (डाइबिटीज)
¶ मोटापा...
¶ हृदय रोग तथा
¶ कैलस्ट्रोल का अधिक बनना...
पाचक पित्त को नियंत्रित यानि कन्ट्रोल करने के लिए नीचे लिखी दवाओं का उपयोग एवं क्रिया-साधनाओं का अभ्यास करना होगा।
पाचक पित्त दूषित होने पर…
a– व्यायाम, ध्यान अवश्य करें।
b– गुलकन्द युक्त पान खाएं।
c– नाश्ते में मीठा दही लेवें
d– सुपाच्य हल्का भोजन,
e– केवल सुबह या दुपहर में सलाद, हरी सब्जियाँ,
f– ताजे फलों का सेवन भी पाचक पित्त को सम अवस्था में
रखने में सहायक है।
g– कीलिव माल्ट 5 माह तक लेवें।
h– दूषित पित्त से उत्पन्न अम्लपित्त को सन्तुलित करने के लिए अमृतम जिओ गोल्ड माल्ट 7 से 8 महीने नियमित खाली पेट लेना हितकारी होगा।

(दो) भ्राजक पित्त–
यह पित्त सम्पूर्ण शरीर की त्वचा में रहकर विभिन्न कार्य करता है जैसे-
$– त्वचा को मुलायम बनाना...
$– शरीर को सौन्दर्य प्रदान करना...
$- विटामिन डी को ग्रहण करना तथा
$– वायुमण्डल में पाए जाने वाले रोगाणुओं से शरीर की रक्षा करना...
भ्राजक पित्त-
शरीर की कांति, चिकनाई आदि का उत्पादक तथा रक्षक है। यह पित्त देह की त्वचा में रहकर कान्ति, चमक, रौनक उत्पन्न कर देह को सुंदरता प्रदान करता है।
भ्राजक पित्त के कारण ही शरीर में किया गया लेप, चन्दन, उबटन, मालिश किया हुआ तेल आदि तन में समाहित होकर सूख पाते हैं।
क्यों आवश्यक है-अभ्यंग-
अनेक स्त्री-पुरुष महीनों तक मालिश, उबटन आदि नहीं करते, उनकी स्किन रूखी, कटी-फटी रंगहीन होने लगती है। काया की कान्ति नष्टप्रायः हो जाया करती है। स्किन डिसीज, सोरायसिस आदि रक्तविकारों का कारक भ्राजक पित्त माना जाता है।
भ्राजक पित्त के कुपित होने पर शरीर में नीचे लिखे रोग आने की सम्भावना बनी रहती है-
(अ) त्वचा पर सफेद दाग
(ब) लाल चकत्तों का दोष होना।
(स) चर्म रोग (स्किन डिसीज़) का होना।
(द) शरीर में फोड़ा, फुन्सी होना।
(ई) एग्जिमा, त्वचा का फटना आदि।
भ्राजक पित्त को विकार रहित बनाने के लिए करें ये उपाय-
£– कोई ऐसा श्रम करें, जिससे शरीर से पसीना निकलने लगे।
£– सुबह सूर्य की रोशनी लेवें।
£– स्नान के बाद तेल लगाएं।
विशेष कारगर हर्बल ऑयल...
यदि गुंजाइश हो, तो महीने में एक बार पूरी देह में बहुत ही बहुमूल्य
~अमृतम कुमकुमादि तेलम~
अच्छी तरह लगाकर अभ्यंग करें।
यह ऑयल 30 ml 2999/- का है।
£– मीठा दूध अवश्य पियें।

अघोरी की तिजोरी से उपाय…
£– कालीमिर्च,  सेंधानमक, नागकेशर 1-1 ग्राम, 
मीठा नीम, तुलसी, एलोवेरा, अमलताश गूदा 3-3 ग्राम
और दो नग अंजीर मिलाकर 20 बड़ी गोली बनाएं,
इसे दिन में 3 बार सादे जल से पाँच महीने तक लेने से अंसतुलित, दूषित भ्राजक पित्त सम हो जाता है।

£ भ्राजक पित्त को शरीर में सम अवस्था में रखने के लिए प्रतिदिन सूर्य समक्ष अमृतम
~काया की बॉडी मसाज ऑयल~
(चन्दन, गुलाब इत्र युक्त) से सप्ताह में 2 बार पूरे शरीर में सिर से तलबों तक मालिश कर स्नान करना लाभप्रद है।
भ्राजक पित्त को धन्वन्तरि सहिंता में वात-पित्त बताया है। इसलिए ऑर्थोकी गोल्ड केप्सूल रोज एक दूध के साथ 30 दिन तक सेवन करें।
£– अमृतम टेबलेट 1 से 2 गोली सुबह खाली पेट और रात को खाने से पहले या बाद में सादे जल से 5 से 6 माह लेवें।
€– कीलिव माल्ट दिन में 2 से 3 बार दूध या पानी के साथ 3 माह तक सेवन करें।

(तीन) रंजक पित्त-
रंजक पित्त यकृत में बनकर पित्ताशय में रहता है। रंजक पित्त का कार्य देह में बड़ा ही महत्वपूर्ण एवं रहस्यमयी है।
मानव शरीर में भोजन के पचने पर जो रस बनता है, रंजक पित्त उसे शुद्ध करके उस रस से खून बनाता है।
अस्थियों की मज्जा (bone marrow) से जो रक्त कण (corpuscle) बनते हैं, उन्हें रंजक पित्त लाल रंग में
रंगने का कार्य करता है। तत्पश्चात इसे रक्तभ्रमण प्रणाली
(blood circulatory system-मानव शरीर- रुधिर परिसंचरण तंत्र) के माध्यम से शरीर की सम्पूर्ण रक्तवाहिनियों में पहुंचा दिया जाता है।
यदि रंजक पित्त का सन्तुलन बिगड़ जाता है, तो शरीर में लीवर से सम्बन्धित रोग होने लगते हैं।
जैसे-पीलिया, अल्परक्तता अर्थात खून की कमी, (anemia) तथा शरीर में कमजोरी आना अर्थात् शरीर की कार्य क्षमता कम हो जाना इत्यादि।
रंजक पित्त- पेट के पाचक रस को परिवर्तित कर रक्त निर्माण में सहायक है, मतलब यकृत यानी लिवर और प्लीहा में रहकर खून बनाने एवं रंगने का कार्य रंजक पित्त करता है।
मानव शरीर में प्लीहा या तिल्ली (spleen) एक अंग है यह पेट में स्थित रहता है। पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करने में रंजक पित्त सहायक है। ये रक्त का संचित भंडार भी है। यह रोग निरोधक तंत्र का एक भाग है।
रंजक पित्त की पवित्रता हेतु अमृतम गोल्ड माल्ट 3 माह तक लेवें।
रंजक पित्त नीचे लिखे उपायों से नियन्त्रित होता है- 
&– कब्ज, कॉन्स्टिपेशन कतई न होने दें
&-कपालभाति योग करें।
&– पपीता, गन्ने का रस, अमरूद लेवें।
&– कीलिव माल्ट का सदैव सेेेवन करें।
&– गुलकन्द, हरड़ मुरब्बा, बेल मुरब्बा लेवें।
&– धनिया का जूस 1 चम्मच गुड़ के साथ लें
&– रात को नमकीन दही कतई न लें।

(चार) साधक पित्त-
■ साधक पित्त के चमत्कारी लाभ…
¥ यह हृदय में रहता है।
¥ बुद्धि को तेज करता है।
¥ व्यक्ति को प्रतिभाशाली बनाता है।
¥ नवीन बुद्धि का निर्माण करता है।
¥ उत्साह व आनन्द की अनुभूति कराता है। 
¥ आध्यात्मिक शक्ति देता है।
¥ सात्विक वृत्ति का निर्माण करता है।
¥ ईर्ष्या, स्वार्थ, द्वेष-दुर्भावना को मिटाता है।
साधक पित्त-शरीर में सबसे महत्वपूर्ण हृदय में इसका स्थान है।
कफ और तमोगुण नाशक और मेधा तथा बुद्धि उत्पन्न कर
ब्रेन को क्रियाशील बनाये रखता है।

आचार्य डलहण ने लिखा है- हृदय में जो पित्त या द्रव्य विशेष होता है, वह चार पुरुषार्थ जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का
साधन करने वाला होने से, उसे साधक पित्त या साधकाग्नि की संज्ञा दी गई है। इसे ही इच्छित मनोरथो का साधन एवं पूर्ण करने वाला बताया है।
अतः साधकपित्त दूषित होने से सोचे हुए कार्य अथवा की गई प्रार्थना पूर्ण नहीं हो पाती..!
पवित्र बनाने का उपाय…
साधक पित्त निर्मल बनाने के लिए 5 माह तक ब्रेन की गोल्ड टेबलेट एवं ब्रेन की गोल्ड माल्ट का सेवन दूध के साथ दिन में 2 से 3 बार तक करना चाहिए।
■ अन्य सुझाव–
नीचे लिखी क्रियाओं के अभ्यास से साधक पित्त सन्तुलित रहता है। 
♂ धार्मिक व आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना,
♂ महापुरुषों के प्रवचन सुनना,
♂ किसी शिवालय की साफ-सफाई करना।
♂ लोगों की मदद, भला करना।
♂ ॐ शम्भूतेजसे नमः मन्त्र जपना।
♂ आत्म-चिन्तन करना।
♂ लोकहित के कार्य करना।
♂ आसन, ध्यान, सूर्य नमस्कार करना।
♂ प्राणायाम, शवासन, योग निद्रा करना।
■ साधक पित्त के कुपित होने पर होती हैं ये परेशानियां…
[!] स्नायु तन्त्र गड़बड़ा जाता है।
[!!] मानसिक रोग होने लगते हैं। जैसे-
[!!!] जीवन में नीरसता आना।
[!!!!] आधाशीशी, सिरदर्द, माईग्रेन, मूर्छा,
[!!!!!]अवसाद (डिप्रेशन), अधरंग, अनिद्रा
[!!!!!!]और मन में उच्च व निम्न रक्तचाप तथा हृदय रोग का भय बने रहना।

(पांच) आलोचक पित्त के फायदे…
आलोचक पित्त-यह पित्त आंखों में रहता है। देखने की क्रिया का संचालन करता है। नेत्र ज्योति को बढ़ाना और दिव्य दृष्टि को बनाए रखना इसके मुख्य कार्य हैं। इसी के कारण प्राणी देख पाता है और रूप के प्रतिबिंब को ग्रहण करता है। यह पुतली के बीचोबीच रहता है और मात्रा में तिल के बराबर है। इसी से सबको दिखाई पड़ता है।
आलोचक पित्त की शुद्धि हेतु–
सुबह नँगे पावँ दूर्वा, हरि घास में उल्टे चले।
कालीमिर्च, मिश्री, बादाम, सौंफ समभाग लेकर चूर्ण बनाएं। सुबह-शाम 1 से 2 चम्मच जल या दूध से लें।
(()) कुन्तल केयर हर्बल माल्ट 1 से 2 चम्मच दिन में दो बार लेवें।
(()) कुन्तल केयर हर्बल हेयर स्पा (हेम्प युक्त) बालों में लगायें।
(()) अमृतम भृंगराज शेम्पू से बाल धोएं
■ आलोचक पित्त की विषमता से आंखे हो जाती हैं खराब- 
आलोचक पित्त जब कुपित होता है, तो नेत्र सम्बन्धी दोष शरीर में आने लगते हैं यथा
~ नज़र कमजोर होना,
~ आंखों में काला मोतिया व सफेद मोतिया के दोष आना।
आलोचक पित्त को नियन्त्रित करने के लिये साधक को नीचे लिखी क्रियाओं का अभ्यास करना चाहिये।
■ कैसे करें आलोचक पित्त की शुद्धि...
● सुबह खाली पेट देशी घी में बताशे गर्म करके, उस पर कालीमिर्च, सेंधा नमक भुरककर खाएं। पानी न पिएं।
● प्रतिदिन आंखें साफ करें।
● नेत्रधोति का अभ्यास करें।
● मुँह में पानी भरकर आँखों में शुद्ध जल के छींटे लगाएं।
● सादे जल में गंगाजल मिलाकर अथवा त्रिफले के पानी में
आंखों को डुबो कर आंख की पुतलियों को तीन-चार बार ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं एवं वृत्ताकार दिशा में घुमाएं।

■ पित्त कोप के कारण क्या हैं-
◆ अधिक क्रोध, शोक, दुःख, परिश्रम,
◆ व्रत-उपवास, मैथुन/सेक्स करना।
◆ ज्यादा दौड़ना या चलना।
◆ बहुत खट्टे फल, केंरी, अमचूर आदि
◆ तेज मिर्ची का नमकीन, रूखे, चरपरे, गर्म, हल्के और दाह
अर्थात गर्मी पैदा करने वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन करना।
◆ नीठ शराब यानि बिना पानी के पीना।
◆ रात्रि में अरहर की दाल,
◆ नमकीन दही, छाछ एवं
◆ तेज मसाले युक्त भोजन लेना।
हरी सब्जी कच्ची खाना।
◆ गर्मी, क्रोध या पसीने में सम्भोग करना
◆ नशीले पदार्थों का सेवन करना।
◆ ज्यादा देर तक तेज धूप में रहना।
◆ अधिक नमक का सेवन करना।
ये सब पित्त प्रकोप के कारण हैं। वर्षाकाल में रात को जागने तथा अधिक श्रम से पित्त की वृद्धि होने लगती है।
पित्त के प्रकोपित होने का समय…
गर्मी के दिनों में, शरद ऋतु के समय मध्यान्ह काल में। आधी रात और भोजन पचते वक्त पित्त विशेषकर कुपित होता है।
जवानी के समय सभी को पित्त व्यापता है। इसलिए सही समय, कम उम्र में विवाह करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी होता है।
■ पित्त शान्ति के प्राकृतिक उपाय...
¢ सूर्योदय से पूर्व उठे।
¢ बिस्तर पर धीरे-धीरे गहरी-गहरी सांसे नाभि तक ले जाकर 5 बार छोड़ें।
फिर दोनो हाथों को रगड़कर आंखों पर लगाकर अत्यन्त प्रसन्नपूर्वक उठकर,
¢ ताम्बे या मिट्टी के पात्र का 3 से 4 गिलास जल पियें।
¢ कुछ देर टहलकर शौचादि से निवृत हों।
¢ देशी घी, मख्खन, मीठा दही,
¢ गुलकन्द, आँवला मुरब्बा, सेव मुरब्बा और हरड़ मुरब्बा और
जिओ गोल्ड माल्ट का खालीपेट सेवन करना लाभकारी रहता है।
¢ प्रतिदिन अमृतम काया की मसाज ऑयल से अभ्यंग अर्थात मालिश करें।
रोज 2 गोली अमृतम टेबलेट रात्रि में भोजन से पूर्व सादा जल से लेवें। यह टेबलेट अमाशय में घुसकर विकार कर्ता पित्त के मूल को पूर्णरूप से छेदन कर मल द्वारा पूरा पित्त बाहर निकाल फेंकती है।

■ पित्तदोष का देशी इलाज…
पित्त नाशक फल, मेवा-मुरब्बे आदि..
मुनक्का (द्राक्षा), केला, अनारदाना या जूस, छुहारा, ककड़ी, खीरा, करेला, पेठा, पुराने चावल, गेहूं, मिश्री, दूध, चना, मूंग की छिलके वाली दाल, धान्य की खील अपने भोजन का हिस्सा बनाये।
बिना खर्च की चिकित्सा
माथे और पेट पर चन्दन का लेप लगाएं
अमृतम चन्दन लगाने से तन-मन, अन्तर्मन और आत्मा पवित्र-शुद्ध हो जाती है। 
पित्त की शोधन चिकित्सा…
वमन, विरेचन, वस्ति, नस्य
द्वारा शरीर से दूषित, विषाक्त तत्वों (टॉक्सिन्स) को शरीर से निकाला जाता है।

पित्त की शमन चिकित्सा….

द्वारा दीपन, पाचन (पाचन तंत्र) और उपवास आदि उपाय करके शरीर के दोषों को निरोग कर शरीर को सामान्य स्थिति में वापस लाया जाता है। त्रिदोषनाशक यह दोनों चिकित्सा एवं उपाय शरीर में मानसिक व शारीरिक शांति बनाने के लिए आवश्यक हैं। आयुर्वेद रोगरहित, शांतिप्रिय जीवन जीने का तरीका सिखाता है।

मंगलवार, 17 मई 2022

हिंदू महज मूर्ति की नहीं बल्कि भगवान की पूजा करते हैं।

हिन्दू धर्म एक समुद्र की तरह है, यहाँ हर तरह की पूजा पद्धति हैं। ये कोई पंथ या संप्रदाय नहीं है, जो एक ही दिशा में बहेगा। हिन्दू धर्म में प्रतिमा स्थापन का विधान है। मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का विधान है, यज्ञ किया जाता है, शक्तियां उतरती है मन्त्रों के द्वारा...
अगर आप मिट्टी का पार्थिव शिव लिंग भी बनाते है, तब भी आवाहन होता है और पूजा करने के बाद विसर्जन होता है। जैसे कि नवरात्री में दुर्गा पूजा और गणेश उत्सव...

बहुत से लोग ये कहते हैं कि हिन्दू धर्म में बहुत से देवी-देवता हैं तो मैं इसके बारे में बोलना चाहूंगा कि हिन्दू धर्म भगवान को एक नहीं, अनंत मानता है। हिन्दू धर्म का मानना हैं, भगवान एक रूप में नहीं बंधे हुए है वो अनंत रूपों को धारण कर सकते हैं और किया हुआ भी है। हिन्दू धर्म एक भगवान कि जगह अनेक नहीं, बल्कि अनंत रूप को मानता है। हिन्दू धर्म इस बात कि पुष्टि करता है कि भगवान अनंत है। आपको जिस किसी एक कि पूजा करनी है वो करो या अनेक की करो...

यदि भगवान की मूर्ति महज मूर्ति है क्योंकि वो पत्थर या मिट्टी की बनी है, तब तो जितने भी धार्मिक ग्रन्थ कागज के बने हुए हैं तो क्या धार्मिक ग्रन्थ पढ़ना केवल कागज की पूजा करना हैं..? ऐसा नहीं है। तब तो जितनी भी पाठ, पूजा, मंत्र, प्रार्थना सब व्यर्थ ही है। अ, आ, इ, क, ख, ग इन्हीं शब्दों से ही तो मिलकर बने हैं सारे मंत्र, तो क्या इसे शब्द की पूजा बोली जाये..? पर ऐसा नहीं है।

मूर्ति, कागज या शब्द भगवान से जुड़ने के बाद भगवान को रिप्रेजेंट करती है। ठीक उसी तरह किसी देश का झंडा, उस देश को रिप्रेजेंट करता है। आप उसे महज कपड़े का टुकड़ा समझकर, उस के साथ ख़राब बर्ताव नहीं कर सकते..! करके देखिये आपके ऊपर देशद्रोह का मुकदमा हो जायेगा।

कुछ लोग ये बोलते हैं कि "एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति" तो वो एक एक्सट्रीम ह्य्पोथेटिकल कंडीशन है। जिसमें ये माना जाता हैं कि सब में ब्रह्म रूप परमात्मा हैं। उसमें ये माना जाता है कि शैतान में भी वही ब्रह्म हैं और भगवान में भी वही ब्रह्म हैं, और मैं भी ब्रह्म हूँ। तभी कुछ लोग बोलते हैं कि "अहम् ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ। ये उन लोगों के लिए हैं जो ज्ञानी हैं, जिसकी कुण्डिलिनी जागृत हो चुकी हैं, जो तुर्या अवस्था में हैं।(प्राणियों की चार अवस्थाओं में से अन्तिम अवस्था जो ब्रह्म में होने वाली लीनता या मोक्ष हैं) आम जिंदगी में कोई भगवान और शैतान को एक कैसे मान सकता हैं..!

पूजा करने के यही तीन रास्ते हैं, आप किसी भगवान की मूर्ति का अभिषेक कर रहें हैं या फिर कोई घार्मिक ग्रन्थ पढ़ रहे हैं या फिर कोई मंत्र का जप कर रहे हैं।

निराकार का प्रतीकात्मक सूचक क्या है, खाली आकाश जो चारों तरफ फैला है। तो पूर्वजों ने आसान तरीका मूर्ति पूजा के रूप में चुना, साकार और निराकार वैसे ही है जैसे बर्फ और पानी...