बुधवार, 12 अप्रैल 2023

क्या है रक्षासूत्र(मौली) जानिए पूरी जानकारी...

मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा हैं। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।
मौली बांधने का मंत्र :
‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’
मौली का अर्थ : 'मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर' मौली का तात्पर्य सिर से भी है। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।  मौली के भी प्रकार हैं। 

कैसी होती है मौली..? :
मौली कच्चे धागे या सूत से बनाई जाती है जिसमें मूलतः 3 रंग के धागे होते हैं लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी -कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव तो कभी पंचदेव का प्रतीक...
 
कब बांधी जाती है मौली :
*पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। 
*उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।
*प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।

सनातन परंपरा में मौली शुभता का प्रतीक है, मौली बांधने से टल जाती है कई बाधाएं... मौली बांधना जिसे रक्षा सूत्र भी कहते है, हर धार्मिक कार्य या पूजा के आरम्भ में तिलक के साथ यह अनिवार्य माना जाता है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है।


मोली बांधने के नियम :

- शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए और विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है। 
- जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।
- मौली 3, 5 या 7 बार ही लपेटना चाहिए। एक बात का विशेष ध्यान रखें, कभी भी अपनी लंबाई से लंबी मौली ना बांधे।
- नई मौली को बांधने से पहले पुरानी मौली खोल देनी चाहिए।
- पूजा करते समय नवीन वस्त्रों के न धारण किए होने पर मोली हाथ में धारण अवश्य करना चाहिए। 

शुभता का प्रतीक है मौली 

व्यापार और घर में भी वस्तुओं पर मौली का प्रयोग नए वाहन, नए सामान, व्यापार में कलम, बही-खाते, तिजोर, पूजन साम्रग्री आदि पर मौली बांधना शुभता और लाभ का प्रतीक माना जाता है।

संकटों से रक्षा करती है मौली 

मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवन रेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।

इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है।

मौली(कलावा) बांधने के सिर्फ धार्मिक हीं नहीं बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी हैं।

- मोली बांधने से शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है और शरीर स्वस्थ रहता है।
- डायबीटिज, ब्लड प्रेशर, लकवा और हार्ट अटैक जैसे रोगों में मौली बांधना लाभकारी होता है।
- इसके साथ ही यदि किसी यजमान के मौली बंधी हुई है और वो किसी अनुष्ठान में पूजन कर रहा हो तो सूतक का दोष लगने पर भी यह रक्षा सूत्र उस अनुष्ठान से बाधा टल जाती है।

मनोवैज्ञानिक लाभ : मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है।

बुधवार, 23 नवंबर 2022

नशा छोड़ने का सबसे आसान तरीका

नशा नाश का घर होता है।

नशा कोई भी हो हो शराब, गुटखा, तम्बाकू या कोई भी...
अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े काट लें, अब इन पर सेंधा नमक बुरक लें और इन टुकड़ों पर निम्बू निचोड़ लें, अंत में इन टुकड़ों को धुप में सूखने के लिए रख दें... जब सूख जाएं तो बस हो गई आपकी दवा तैयार...

अब जब भी किसी भी नशे की लत लगे तो ये टुकड़ा निकाला और चूसते रहो... ये अदरक मुंह में घुलती नहीं, इसको आप सुबह से शाम क मुंह में रख सकते हैं।

अब आप सोचोगे कि ऐसा इस अदरक में क्या हैं..! तो सुनिए, जब किसी आदमी को नशे की लत लगती हैं तो उसकी बॉडी सल्फर की डिमांड करती हैं और अगर हम सल्फर की कमी शरीर में पूरी कर दें तो फिर बॉडी को ये नशे की उठने वाली तलब नहीं लगेगी।
ये प्रयोग आप 15 से 20 दिन करोगे, उससे ही आप नशा मुक्त हो जाओगे। अगर कोई बहुत बड़ा नशेबाज हैं या रेगुलर ड्रिंक करता हैं तो उनको ये 30 से 35 दिन लग सकते हैं।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

कभी भगवान की पीठ को न देखें और न ही प्रणाम या प्रार्थना करें...

मंदिर में परिक्रमा लेते समय भगवान या देवी की पीठ को प्रणाम करने का चलन बहुत हो गया हैं।
किसी भी भगवान या देवी देवताओं की पीठ को प्रणाम करने से समस्त पुण्यों का नाश हो जाता है।

इसका प्रमाण भागवत कथा में एक प्रसंग में इस प्रकार बताया गया है कि जरासंध के साथ युद्ध के समय एक काल यवन नाम का राक्षस जरासंध की तरफ से युद्ध करने के लिए युद्ध स्थल में श्री कृष्ण भगवान जी से युद्ध करने आ गया।

काल यवन भयानक राक्षस के अलावा सत्कर्म करने वाला भी था।

श्री कृष्ण भगवान जी इस राक्षस के वध के पहले इसके समस्त सत्कर्मों को नष्ट करना चाहते थे। सत्कर्म नष्ट होने से सिर्फ इस दुष्ट को दुष्टता के कर्मफल मिलें व उसका वध किया जा सकें।

इसलिये श्री कृष्ण भगवान जी मैदान छोड़ कर भागने लग गये... भगवान आगे आगे राक्षस काल यवन पीछे पीछे भाग रहे थे...

जिससे राक्षस काल यवन को भगवान की पीठ दीखती रही और उसके सभी सत्कर्मों का नाश होता रहा...

भगवान श्रीकृष्ण की इस युक्ति के पीछे यह राज था कि राक्षस काल यवन के अर्जित सत्कर्मों का नाश हो जाये ताकि दुष्ट को दुष्टता का फल मिले व उसे मारा जा सकें।

जब काल यवन के समस्त सत्कर्म भगवान श्री कृष्ण के पीछे-पीछे दौड़कर पीठ देखने के कारण नष्ट हो गए, उसके बाद ही उसका वध संभव हो सका‌।

इसलिए किसी भी मंदिर की फेरी परिक्रमा लेते समय देवी-देवताओं की पीठ को प्रणाम न करें और न ही पीठ को देखें। बल्कि उनके सम्मुख हाथों को जोड़कर प्रार्थना, अर्चना एवं आराधना करें।

इस अज्ञानता को खत्म करने को ज्यादा से ज्यादा सज्जनों तक यह कथा पहुचाने में सहयोगी बने, ताकि सबके सत्कर्मों को क्षीण होने से बचाया जा सकें।

🙏🏻 सत्य सनातन धर्म की जय ⛳

शनिवार, 29 अक्टूबर 2022

Bed vs खाट

क्या आपको पता हैं :
सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वजों को क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे..? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट सायंस नहीं हैं..! लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई सायंस नहीं है, लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सकें... चारपाई बनाना एक कला है, उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता हैं।
जब हम सोते हैं, तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं, पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की जोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है।

दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें, सभी में चारपाई की तरह जोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपड़ की जोली का था, लकड़ का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया हैं। चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द का दर्द कभी नहीं होता..! दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती हैं।

डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है, उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं। वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती..! चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक हैं। खटिये को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं।

अगर किसी को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो-तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed-Soar शुरू हो जाता है। भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योंकि इसमें से हवा आर-पार होती रहती हैं।

गर्मियों में इंग्लिश Bed गर्म हो जाता हैं इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती हैं, जबकि चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है। बान की चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शारीर का Acupressure होता रहता हैं।

गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनंद ही और हैं। ताज़ी हवा, बदलता मौसम, तारों की छाव, चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती हैं। हर घर में एक स्वदेशी बाण की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी ही चाहिए।

बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

दुष्कर्मी रावण

आज कल आप जहाँ देखिये रावण को ब्राह्मण बताकर, उसका महिमामंडन करना एक आम बात हो चुकी है। यहां तक की दशहरे पर रावण के प्रतीक को जलाने पर भी विरोध के स्वर जगह-जगह से सुनाई देने लगे हैं। कुछ ब्राह्मण अनजाने में ही हिन्दू धर्म के धुर विरोधी वामपंथियों और धर्म विरोधयों की कुत्सित चालों का अनजाने में ही शिकार बनकर, पूरे हिन्दू समाज में आपसी विद्वेष फ़ैलाने की प्रायोजित चाल का मोहरा बन चुके हैं। वामपंथियों और हिन्दू विरोधियों का ये वही गैंग है, जो कभी होली तो कभी श्राद्ध और कभी भगवान शिव के जलाभिषेक पर सवाल खड़े करता है।

यहाँ आप रावण के उन चौदह प्रकार के दुष्कर्मों का प्रामाणिक वर्णन पढेंगे जिससे आप स्वयं ही रावण की मानसिक प्रवृत्ति और दुर्गुणों का अनुमान लगा सकते हैं और आपको यह ज्ञात हो जायेगा कि रावण का महिमामंडन करने वाले किस प्रकार मानवता एवं हिन्दू धर्म के विरोधी हैं।

१- ब्रह्महत्यारा रावण - जो ब्राह्मण, रावण को ब्राह्मण बताकर अपनी छाती फुलाते हैं, वे जान लें कि उनके पूर्वजों की हत्या रावण ने की थी। वह ब्राह्मण द्रोही था, रावण ने हजारों ब्राह्मण साधुओं की हत्या सिर्फ इसलिए करवा दी क्योंकि वो भगवान का हवन-पूजन इत्यादि धार्मिक कर्म करते थे -

" प्राप्तयज्ञहरं दुष्टं ब्रह्मघ्नं क्रूरकारिणम्। " - (वा०रा० ०३-३२-२०)

२- महाकामी रावण - रावण वासना का आदी था, इसमें कदापि संदेह नहीं है। रम्भा, पुजिकस्थला नामक अप्सराएँ और यहाँ तक की अपने भाई कुबेर के पुत्र नल कुबेर की पत्नी के साथ भी रावण ने व्याभिचार किया था। साथ ही अनेक अप्सराओं एवं देवकन्याओं का हरण एवं शीलभंग उसने किया था, यह वाल्मीकीय रामायण से ज्ञात हो जाता है।

३-. शराबी रावण - रावण शराब का सेवन करता था, अर्थात् वह शराबी भी था। स्वयं उसकी बहन शूर्पणखा उसे कोसती हुई कहती है -

"करसि पान सोवसि दिन राती।

सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।" - मानस ०३-२१-०७

अर्थात् तेरे सिर पर संकट आ खड़ा है और तू(रावण) है कि शराब पीकर दिन-रात सोता रहता है।

४-. यज्ञ नष्ट करने वाला रावण - "प्राप्तयज्ञहरं" अर्थात् रावण यज्ञ को नष्ट कर देने वाला था। विश्वामित्रादि मुनियों को सताने के लिए एवं उनके यज्ञों को नष्ट करने के लिए ही उसने ताड़का, मारीच, सुबाहु इत्यादि को नियुक्त कर रखा था।

५-. महाक्रोधी रावण- भगवतगीता में कहा गया है कि काम में बाधा उत्पन्न होने पर वह क्रोध में परिवर्तित हो जाता है -

"काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।" - ( गीता ०३-३७ )

रावण को इतना क्रोध था कि वह अशोक वाटिका में "वार्यमाणः सुसंक्रुद्ध: "- ( वा०रा० युद्धकाण्ड९२/४५) सीताजी को मारने दौड़ा।

इसके ठीक पहले अर्थात् चौवालीसवें श्लोक में रावण के लिए "रावणः क्रोधमूर्छित:" शब्द का प्रयोग किया गया अर्थात् रावण क्रोध से अचेत-सा होकर सीताजी की ओर दौड़ा...

६- शिवद्रोही रावण - भुजाओं पर कैलाश को उठाना, साक्षात् शिव हनुमान् जी का अपमान करना और शिव के बारम्बार समझाने पर भी उनकी बात न मानना, उनकी अवहेलना करना, ये सभी तथ्य रावण को शिवभक्त से अधिक शिवद्रोही के रूप में प्रदर्शित करते हैं। भक्त का स्वरूप तो भगवान के प्रति समर्पण होता है, न कि स्वयं को भगवान से उच्च सिद्ध करने का प्रयास...

७--. अतिलोभी रावण - शिवजी ने पार्वतीजी के लिए स्वर्णमयी लंका की रचना कराई परन्तु लोभी रावण ने ब्राह्मण रूप धारण कर, उसे भी शंकर जी से ले लिया। इसके अलावा अपने भाई कुबेर से उसने बलपूर्वक पुष्पक विमान भी छीन लिया।

८. गाली देने वाला रावण - रावण गाली-गलौज भी करता था। मारीच को रावण ने कैसे गाली दी, इसे गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में पढ़िए -
"जाहु भवन कुल कुसल बिचारी।
सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।" - (मानस ०३-२६-०१)


९. बहनोई का हत्यारा रावण - जिस शूर्पणखा के अपमान का बदला रावण द्वारा लिए जाने की बात लोग कहते हैं, उस शूर्पणखा को विधवा भी रावण ने ही बनाया था। उसके पति विद्युतमाली की हत्या रावण ने की थी। वस्तुतः रावण ने शूर्पणखा के अपमान का कोई बदला नहीं लिया बल्कि सीताजी के सौंदर्य का स्मरण कर उसके मन मे काम उदित हो आया तथा श्रीराम के प्रति द्वेष बुद्धि का भी उदय हो गया।


१०. नारी द्रोही रावण - रावण नारी का अपमान करने के लिए कुख्यात था। महिलाओं का शील भंग करना तो उसके बाएँ हाथ का खेल था। पुत्र वधू रम्भा का बलात्कार करने में भी उसे तनिक लज्जा की अनुभूति नहीं हुई।
इधर-उधर से उसने अनेक स्त्रियों का अपहरण भी किया था -
"बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्ततः।
सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव।।" (वा०रा० ०३.४७.२८)

११. गौ हत्यारा रावण - रावण और उसकी सेना गौ और ब्राह्मण की हत्या करते थे। प्रमाण देखिए...
"जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं।
नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।" -(मानस०१-१८३-०६,)

१२. वेदों का विरोधी रावण – कहा जाता है कि रावण चारों वेदों का ज्ञाता था किन्तु रावण के सारे काम वेद विरोधी थे। वेद-पुराण का अध्ययन एवं श्रवण करने वालों को वह प्रताड़ित करता था -
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।। - (मानस ०१-१८३-०५)
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।। - (मानस ०१- १८३- ०८)
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।। - ( मानस ०१- १८३- छंद )

१३. बूढ़ों का अपमान करने वाला रावण - रावण वृद्धजनों का अपमान करता था। वयोवृद्ध माल्यवंत को फटकारते हुए रावण ने कहा था कि " याद रख! तू बूढ़ा हो गया है इसलिए तुझे पीट नहीं रहा हूँ।"
"ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे।।
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही।।" - ( मानस ०६-४९-०३)

१४. बहुरूपिया छली रावण - सन्यासी का रूप धारण कर अकेली महिला का अपहरण करने वाले को आप छली नहीं तो क्या योद्धा कहेंगे..? यदि रावण इतना ही बड़ा योद्धा था, तो फिर रामजी की उपस्थिति में सीताजी का हरण क्यों नहीं किया..! विचार करें...

इस लेख में संक्षिप्त रूप से रावण के चौदह दुर्गुणों की चर्चा की गयी है। यहाँ एक और बात स्मरण में रखें कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ही हमारे आदर्श हो सकते हैं, रावण जैसा दुष्कर्मी कदापि नहीं..!


✍🏻पं. अनुराग मिश्र “अनु”
आध्यात्मिक लेखक व कवि

गुरुवार, 29 सितंबर 2022

मैं आपका चेहरा याद रखना चाहता हूं...

 एक टेलीफोन साक्षात्कार में भारतीय अरबपति रतनजी टाटा से रेडियो प्रस्तोता ने पूछा : सर आपको क्या याद है कि आपको जीवन में सबसे अधिक खुशी कब मिली..?

रतनजी टाटा ने कहा : मैं जीवन में खुशी के चार चरणों से गुजरा हूं और आखिरकार मुझे सच्चे सुख का अर्थ समझ में आया।
पहला चरण धन और साधन संचय करना था लेकिन इस स्तर पर मुझे वह सुख नहीं मिला, जो मैं चाहता था।
फिर क़ीमती सामान और वस्तुओं को इकट्ठा करने का दूसरा चरण आया, लेकिन मैंने महसूस किया कि इस चीज का असर भी अस्थायी होता है और कीमती चीजों की चमक ज्यादा देर तक नहीं रहती..!
फिर आया बड़ा प्रोजेक्ट मिलने का तीसरा चरण... वह तब था जब भारत और अफ्रीका में डीजल की आपूर्ति का 95% मेरे पास था, मैं भारत और एशिया में सबसे बड़ा इस्पात कारखाने मालिक भी था, लेकिन यहां भी मुझे वो खुशी नहीं मिली जिसकी मैंने कल्पना की थी।
चौथा चरण वह समय था, जब मेरे एक मित्र ने मुझे कुछ विकलांग बच्चों के लिए व्हील चेयर खरीदने के लिए कहा... लगभग 200 बच्चे थे, दोस्त के कहने पर मैंने तुरन्त व्हील चेयर खरीद ली... लेकिन दोस्त ने ज़िद की कि मैं उसके साथ जाऊं और बच्चों को व्हील चेयर भेंट करूँ... मैं तैयार होकर उनके साथ चल दिया, वहाँ मैंने सारे पात्र बच्चों को अपने हाथों से व्हील चेयर दीं... मैंने इन बच्चों के चेहरों पर खुशी की अजीब सी चमक देखी... मैंने उन सभी को व्हील चेयर पर बैठे, घूमते और मस्ती करते देखा... यह ऐसा था जैसे वे किसी पिकनिक स्पॉट पर पहुंच गए हों, जहां वे बड़ा उपहार जीतकर शेयर कर रहे हो... मुझे उस दिन अपने अन्दर असली खुशी महसूस हुई।
जब मैं वहाँ से वापस जाने को हुआ तो उन बच्चों में से एक ने मेरी टांग पकड़ ली, मैंने धीरे से अपने पैर को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन बच्चे ने मुझे नहीं छोड़ा और उसने मेरे चेहरे को देखा और मेरे पैरों को और कसकर पकड़ लिया।
मैं झुक गया और बच्चे से पूछा : क्या तुम्हें कुछ और चाहिए..?
तब उस बच्चे ने मुझे जो जवाब दिया, उसने न केवल मुझे झकझोर दिया बल्कि जीवन के प्रति मेरे दृष्टिकोण को भी पूरी तरह से बदल दिया।
उस बच्चे ने कहा था- मैं आपका चेहरा याद रखना चाहता हूं ताकि जब मैं आपसे स्वर्ग में मिलूं, तो मैं आपको पहचान सकूं और एक बार फिर आपका धन्यवाद कर सकूं...

उपरोक्त शानदार कहानी का मर्म यह है कि हम सभी को अपने अंतर्मन में झांकना चाहिए और यह मनन अवश्य करना चाहिए कि इस जीवन और संसार और सारी सांसारिक गतिविधियों
को छोड़ने के बाद आपको किसलिए याद किया जाएगा..?

क्या कोई आपका चेहरा फिर से देखना चाहेगा..! यह बहुत मायने रखता हैं।

         रतन टाटा जी 25 वर्ष         रतन टाटा जी 84 वर्ष
साभार

चार युग और उनकी विशेषताएं...

युग शब्द का अर्थ होता है "एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि" जैसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग आदि... आज हम चारों युगों का वर्णन करेंगें... 
युग वर्णन से तात्पर्य है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में विस्तार से परिचय देना... 
प्रत्येक युग के वर्ष प्रमाण और उनकी विस्तृत जानकारी कुछ इस तरह है...

1. सत्ययुग: यह प्रथम युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है...

सत्ययुग का तीर्थ: पुष्कर है।

इस युग में पाप की मात्र: 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है।
इस युग में पुण्य की मात्रा: 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती हैं।

इस युग के अवतार: मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) है। अवतार होने का कारण, शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए...

इस युग की मुद्रा: रत्नमय है।
इस युग के पात्र: स्वर्ण के है।
काल: 17,28000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई: 32 फ़ीट
आयु: 1 लाख वर्ष

2. त्रेतायुग: यह द्वितीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है...

त्रेतायुग का तीर्थ: नैमिषारण्य है।

इस युग में पाप की मात्रा: 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है।
इस युग में पुण्य की मात्रा: 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है।
इस युग के अवतार: वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर)

अवतार होने के कारण: बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए...

इस युग की मुद्रा: स्वर्ण है।
इस युग के पात्र: चाँदी के है।
काल: 12,96,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई: 21 फ़ीट
आयु: 10,000 वर्ष

3. द्वापरयुग: यह तृतीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है...

द्वापरयुग का तीर्थ: कुरुक्षेत्र है।

इस युग में पाप की मात्रा: 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है।
इस युग में पुण्य की मात्रा: 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है।
इस युग के अवतार: कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण)

अवतार होने के कारण: कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए...

इस युग की मुद्रा: चाँदी है।
इस युग के पात्र: ताम्र के हैं।
काल: 8,64,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई: 11 फ़ीट
आयु: 1,000 वर्ष

4. कलियुग: यह चतुर्थ युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है...

कलियुग का तीर्थ: गंगा है।

इस युग में पाप की मात्रा: 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है।
इस युग में पुण्य की मात्रा: 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है।
इस युग के अवतार: कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर)

अवतार होने के कारण: मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए...

इस युग की मुद्रा: लोहा है।
इस युग के पात्र: मिट्टी के है।
काल: 4,32,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई: 5.5 फ़ीट
आयु: 60-100 वर्ष