मंगलवार, 26 अगस्त 2025

क्या आप अपने गोत्र की असली शक्ति को जानते हैं..?

गोत्र यह कोई परंपरा, अंधविश्वास नहीं हैं..! यह आपका प्राचीन कोड हैं, मानो आपका अतीत इसी पर टिका हो...

1. गोत्र आपका उपनाम नहीं हैं..! यह आपका आध्यात्मिक डीएनए हैं।
पता है सबसे अजीब क्या हैं..?
अधिकतर लोग जानते ही नहीं कि वे किस गोत्र से हैं..!
हमें लगता है कि यह बस एक लाइन हैं, जो पंडितजी पूजा में कहते हैं। लेकिन यह सिर्फ इतना नहीं हैं..!

आपका गोत्र दर्शाता हैं कि आप किस ऋषि की मानसिक ऊर्जा से जुड़े हुए हैं।
खून से नहीं..! बल्कि विचार, ऊर्जा, तरंग और ज्ञान से...

हर हिंदू आध्यात्मिक रूप से एक ऋषि से जुड़ा होता हैं।
वो ऋषि आपके बौद्धिक पूर्वज हैं।
उनकी सोच, ऊर्जा, और चेतना आज भी आपमें बह रही हैं।

2. गोत्र का अर्थ जाति नहीं होता..!
आज लोग इसे गड़बड़ा देते हैं।
गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं दर्शाता..!
यह जातियों से पहले, उपनामों से पहले, राजाओं से भी पहले अस्तित्व में था।

यह सबसे प्राचीन पहचान का तरीका था — ज्ञान पर आधारित, शक्ति पर नहीं..!
हर किसी का गोत्र होता था।
ऋषि अपने शिष्यों को गोत्र देते थे, जब वे उनकी शिक्षाओं को ईमानदारी से अपनाते थे।

इसलिए, गोत्र कोई लेबल नहीं — यह आध्यात्मिक विरासत की मुहर हैं।

3. हर गोत्र एक ऋषि से जुड़ा होता है — एक “सुपरमाइंड” से...
मान लीजिए आप वशिष्ठ गोत्र से हैं — तो आप वशिष्ठ ऋषि से जुड़े हैं, वही जिन्होंने श्रीराम और दशरथ को मार्गदर्शन दिया था।

भृगु गोत्र..?
आप उस ऋषि से जुड़े हैं जिन्होंने वेदों का हिस्सा लिखा और योद्धाओं को प्रशिक्षण दिया।

कुल 49 मुख्य गोत्र हैं — हर एक ऋषियों से जुड़ा जो ज्योतिषी, वैद्य, योद्धा, मंत्रद्रष्टा या प्रकृति वैज्ञानिक थे।

4. क्यों बुज़ुर्ग एक ही गोत्र में विवाह मना करते थे...
यह बात स्कूल में नहीं सिखाई जाती..!

प्राचीन भारत में गोत्र एक जेनेटिक ट्रैकर था।
यह पितृवंश से चलता है — यानी पुत्र ऋषि की लाइन आगे बढ़ाते हैं।

इसलिए अगर एक ही गोत्र के दो लोग विवाह करें, तो वे आनुवंशिक रूप से भाई-बहन जैसे होंगे।
इससे संतान में मानसिक और शारीरिक विकार आ सकते हैं।

गोत्र व्यवस्था = प्राचीन भारतीय डीएनए विज्ञान
और यह हम हजारों साल पहले जानते थे — जब पश्चिमी विज्ञान को जेनेटिक्स का भी अंदाजा नहीं था।

5. गोत्र = आपका मानसिक प्रोग्रामिंग
चलो इसे व्यक्तिगत बनाते हैं...

कुछ लोग गहरे विचारक होते हैं।
कुछ में गहरी आध्यात्मिक भूख होती है।
कुछ को प्रकृति में शांति मिलती है।
कुछ नेता या सत्य के खोजी होते हैं।

क्यों...?
क्योंकि आपके गोत्र के ऋषि का मन आज भी आपके अंदर गूंजता है।

अगर आपका गोत्र किसी योद्धा ऋषि का है — आपको साहस महसूस होगा।
अगर वह किसी वैद्य ऋषि से है — तो आयुर्वेद या चिकित्सा में रुचि हो सकती है।

यह संयोग नहीं — यह गहराई से जुड़ा प्रोग्राम हैं।

6. पहले गोत्र के आधार पर शिक्षा दी जाती थी...
प्राचीन गुरुकुलों में सबको एक जैसा नहीं सिखाया जाता था..!
गुरु का पहला प्रश्न होता था:
“बेटा, तुम्हारा गोत्र क्या है..?”

क्यों..?
क्योंकि इससे गुरु समझ जाते थे कि छात्र कैसे सीखता है, कौन-सी विद्या उसके लिए उपयुक्त हैं।

अत्रि गोत्र वाला छात्र — ध्यान और मंत्रों में प्रशिक्षित होता...

कश्यप गोत्र वाला — आयुर्वेद में गहराई से जाता...

गोत्र सिर्फ पहचान नहीं..! जीवनपथ था।

7. ब्रिटिशों ने इसका मज़ाक उड़ाया, बॉलीवुड ने हंसी बनाई, और हमने इसे भुला दिया...
जब ब्रिटिश भारत आए, उन्होंने इसे अंधविश्वास कहा...

फिर फिल्मों में मज़ाक बना —
“पंडितजी फिर से गोत्र पूछ रहे हैं” — जैसे यह कोई बेमतलब रस्म हो।

धीरे-धीरे हमने अपने बुज़ुर्गों से पूछना छोड़ दिया।
अपने बच्चों को बताना छोड़ दिया।

100 साल में 10,000 साल पुरानी व्यवस्था लुप्त हो रही है।

उसे किसी ने खत्म नहीं किया..! हमने ही उसे मरने दिया।

8. अगर आप अपना गोत्र नहीं जानते — तो आपने एक नक्शा खो दिया हैं।
कल्पना कीजिए कि आप किसी प्राचीन राजघराने से हों — पर अपना उपनाम तक नहीं जानते..!

आपका गोत्र = आपकी आत्मा का GPS है।

सही मंत्र

सही साधना

सही विवाह

सही मार्गदर्शन

इसके बिना हम अपने ही धर्म में अंधे होकर चल रहे हैं।

9. गोत्र की पुकार सिर्फ रस्म नहीं होती..!
जब पंडित जी पूजा में आपका गोत्र बोलते हैं, तो वे सिर्फ औपचारिकता नहीं निभा रहें होते..!

वे आपको आपकी ऋषि ऊर्जा से दोबारा जोड़ रहे होते हैं।

यह एक पवित्र संवाद होता है:
“मैं, भारद्वाज ऋषि की संतान, अपने आत्मिक वंशजों की उपस्थिति में यह संकल्प करता हूँ।”

यह सुंदर हैं। पवित्र हैं। सच्चा हैं।

10. इसे फिर से जीवित करो... इसके लुप्त होने से पहले
अपने माता-पिता से पूछो...
दादी-दादा से पूछो...
शोध करो, पर इसे जाने मत दो..!

आप सिर्फ 1990 या 2000 में जन्मे इंसान नहीं हैं..!

आप एक ऐसी ज्योति के वाहक हैं, जो हजारों साल पहले किसी ऋषि ने जलाई थी।

11. आपका गोत्र = आत्मा का पासवर्ड
आज हम वाई-फाई पासवर्ड, नेटफ्लिक्स लॉगिन याद रखते हैं...

पर अपने गोत्र को भूल जाते हैं।

वो एक शब्द — आपके भीतर की

चेतना

आदतें

पूर्व कर्म

आध्यात्मिक शक्तियां

सब खोल सकता है।

यह लेबल नहीं..! यह चाबी हैं।

12. महिलाएं विवाह के बाद गोत्र “खोती” नहीं हैं..!
लोग सोचते हैं कि विवाह के बाद स्त्री का गोत्र बदल जाता हैं। सनातन धर्म सूक्ष्म हैं।

श्राद्ध आदि में स्त्री का गोत्र पिता से लिया जाता हैं।
क्योंकि गोत्र पुरुष रेखा से चलता है (Y-क्रोमोज़ोम से)
स्त्री ऊर्जा को वहन करती हैं, लेकिन आनुवंशिक रूप से उसे आगे नहीं बढ़ाती..!

इसलिए स्त्री का गोत्र समाप्त नहीं होता..! वह उसमें मौन रूप से जीवित रहता हैं।

13. भगवानों ने भी गोत्र का पालन किया...
रामायण में श्रीराम और सीता के विवाह में भी गोत्र जांचा गया...

राम: इक्ष्वाकु वंश, वशिष्ठ गोत्र

सीता: जनक की पुत्री, कश्यप गोत्र

शनिवार, 23 अगस्त 2025

तुम कैसे पहचानोगे संत को बिना संत हुए..?

एक सम्राट एक फकीर के प्रेम में था। सम्राट अक्सर फकीरों के प्रेम में पड़ जाते हैं क्योंकि फकीर बड़ी दूसरी दुनिया का अजनबी मालूम पड़ता है। अपने ही जैसा नहीं, अपने से बड़ा अजीब लगता है और अजनबी में एक आकर्षण होता है। जो अपने से बहुत भिन्न है, उसमें एक रस होता है। जो अपने से विपरीत है, उसको जानने की जिज्ञासा जगती है। वह किसी और लोक के निवासी जैसे होते है। जैसे कोई खबर कर दे कि कोई चांद का आदमी चांद से उतर कर बाजार में आ गया है, तो सारे लोग भागेंगे अजनबी को देखने, चांद से आए आदमी को देखने... ऐसे ही सम्राट अक्सर फकीरों के प्रेम में पड़ जाते हैं।

यह सम्राट प्रेम में था और प्रेम से ही इसने एक दिन निवेदन किया कि मुझे बड़ा दुख होता है कि तुम वृक्ष के नीचे पड़े हो। मैं यहां मौजूद हूं सेवा के लिए, महल मेरा मौजूद है, खाली पड़ा है। उसके सैकड़ों कक्षों में कोई रहने वाला नहीं है..! मैं अकेला हूं, तुम चलो...

लेकिन कभी उसने यह न सोचा था कि फकीर राजी हो जाएगा। फकीर अपना बोरा-बिस्तर बांध कर खड़ा हो गया, उसने यह भी न कहा कि सोचूंगा। सम्राट एकदम हताश हो गया कि यह आदमी तो अपने ही जैसा निकला। फंस गए, कहां भूल में पड़े रहे... यह तो ठीक भोगी मालूम पड़ता है। इसने एक दफा न भी ना की..! जैसे प्रतीक्षा ही कर रहा था। जैसे सब आयोजन यह फकीरी का इसीलिए था कि कब महल में निमंत्रण मिल जाए..! फंस गए, इसके जाल में उलझ गए। अब अपना शब्द वापस भी कैसे लें..? लाना पड़ा फकीर को, लेकिन बेमन से, खुशी चली गई। ठहराया, लेकिन बेमन से, लेकिन अब अपने शब्द को कैसे वापस लेना..!

छह महीने फकीर राजा के महल में रहा। धीरे-धीरे तो राजा ने आना भी बंद कर दिया कि इसकी क्या सुनना; हमारे ही जैसा आदमी है। ठीक है, रहता है। सब व्यवस्था कर दी और बिलकुल भूल गया। छह महीने बाद एक दिन सुबह फकीर को बगीचे में टहलते देखा तो आया और कहा, महाराज, अब तो मुझमें और आप में कोई फर्क ही नहीं; जैसा मैं वैसे आप, अब क्या फर्क रहा..?

फकीर ने कहा, चलो, थोड़ा गांव के बाहर चलें, वहां फर्क बताऊंगा। राजा साथ हो लिया; गांव के बाहर पहुंच गए। नदी आ गई, जो गांव की सीमा बनाती थी। फकीर ने कहा कि उस तरफ चलें। पार हो गए नदी; राजा ने कहा, अब देर हुई जाती है, सूरज भी खूब चढ़ आया, अब आप बता दें। दूर जाने की क्या जरूरत हैं..? अब यहां कोई भी नहीं है, वृक्ष के नीचे बैठ कर बता दें। उसने कहा कि थोड़ा और... दोपहर तक वह सम्राट को चलाता रहा... आखिर सम्राट खड़ा हो गया। उसने कहा, अब बहुत हो गया। व्यर्थ चलाए जा रहे हैं, जो कहना है कह दें...

फकीर ने कहा, अब मैं वापस नहीं लौटूंगा। तुम मेरे साथ चलते हो..? सम्राट ने कहा, मैं कैसे साथ चल सकता हूं..? राज्य है, महल है, व्यवस्था, काम-धाम, हजार उलझनें हैं। आपका क्या..? तो फकीर ने कहा, अब समझ सको तो समझ लेना... हम जाते हैं, तुम नहीं जा सकते हो..! यहीं भेद है। हम महल में थे, महल हममें न था..! तुम महल में हो और महल भी तुममें है। भेद बारीक है। समझ सको, समझ लेना...

सम्राट रोने लगा, पैर पकड़ लिया... कहा कि मैं पहचान ही न पाया..! और आप छह महीने वहां थे और मैं धीरे-धीरे आपको भूल ही गया। मैं तो समझा कि आप भी भोगी हैं। वापस चलिए...

फकीर ने कहा, मुझे चलने में कोई आपत्ती नहीं, लेकिन फिर वही गलती हो जाएगी। मेरी तरफ से कोई अड़चन नहीं है..! कहा और मैं चला... सम्राट फिर चौंका...
उस फकीर ने कहा कि देखो, तुम भोग को समझ सकते हो, तुम त्याग को समझ सकते हो; तुम संत को नहीं समझ सकते..! मुझे क्या अड़चन है..? इधर गए कि उधर गए, सब बराबर है। सब दिशाएं उसी की हैं। महल में रहे कि झोपड़े में, सब महल, सब झोपड़े उसी के हैं। फटे कपड़े पहने कि शाही कपड़े पहने, जमीन पर सोए कि शय्या पर, बहुमूल्य शय्या पर सोए; सभी उसका... जो दे दे, वही ले लेते हैं। जो दिखा दे, वही देख लेते हैं। अपनी कोई मर्जी नहीं..! बोलो, क्या इरादा है..? कहो तो हम लौट पड़ें, मगर तुम पर फिर बुरी गुजरेगी। इसलिए बेहतर है, तुम हमें जाने दो; कम से कम श्रद्धा तो बनी रहेगी। तुम कम से कम कभी याद तो कर लिया करोगे कि किसी त्यागी से मिलना हुआ था। शायद वह याद तुम्हारे लिए उपयोगी हो जाएं।

तुम्हारे कारण बहुत से संत त्याग में जीए हैं, झोपड़ों में पड़े रहे हैं, वृक्षों के नीचे बैठे रहे हैं, तुम्हारे कारण... क्योंकि तुम समझ ही न पाओगे..! तुम समझ ही व्यर्थ बातें सकते हो। सार्थक की तुम्हें कोई पहचान नहीं है। सार्थक की पहचान हो भी नहीं सकती, जब तक तुम उस सार्थकता को स्वयं उपलब्ध न हो जाओ। तुम कैसे पहचानोगे संत को बिना संत हुए..? वही गुणधर्म तुम्हारी चेतना का भी हो जाए, वही सुगंध तुम्हें भी आ जाए, तभी तुम पहचानोगे। कृष्ण हुए बिना, कृष्ण को पहचानना मुश्किल है। लाओत्से हुए बिना लाओत्से को पहचानना मुश्किल है।
तुम यहां मेरे पास हो; निरंतर मुझे सुनते हो; हर भांति मेरे रंग में रंगे हो; फिर भी तुम मुझे पहचान नहीं सकते..! जब तक तुम ठीक मेरे जैसे ही न हो जाओ। तब तक तुम्हारी सब पहचान बाहर-बाहर की, तब तक तुम्हारी सब पहचान अधूरी..! तब तक तुम्हारी सब पहचान, तुम्हारी ही व्याख्या... उससे मेरा कुछ लेना-देना नहीं है। अगर तुम इतना भी समझ लो तो काफी समझना है। क्योंकि यह समझ तुम्हें और आगे की समझ की तरफ सीढ़ी बन जाएंगी।

शनिवार, 16 अगस्त 2025

शक्ति जिम्मेदारी का भाव लेकर आये तो वो श्री हरि कृष्ण कहलाती हैं...

जब बलराम कान्हा से बोले कि कान्हा दुनिया हमें कायर कहेगी... जब हमारे आगे कोई टिक ही नहीं सकता तो युद्ध से इन्कार क्यों..? 

जब तुम्हारा चक्र चलेगा तो कौन-सी सेना हैं, जो उसका सामना कर पायेगी..? 

तब कान्हा बोले कि दाऊ, हर गर्दन चक्र सुदर्शन चलाने के लिए नहीं होती..!

शक्ति है तो इसका अर्थ यह नहीं कि हर किसी से लड़ते फिरें...

मैं रणछोड़ कहलाना पसंद करूँगा अगर ऐसा कहलाने पर कई लोगों की जान बचती हो... 

इसी तरह जब महर्षि उत्ँग ने जब क्रोधित होकर कृष्ण को श्राप देने का प्रयास किया... तब भी श्री क्रष्ण क्रोधित नहीं हुए, उन्होंने बस इतना कहा कि ऋषिवर मुझे श्राप देकर आपको संतुष्टि मिलती है तो जरूर दे दो पर आपको यह बता दूँ कि उससे आपके ही तपोबल का नाश होगा क्योंकि आपके श्राप का मान तो मैं रख लूँगा पर उससे आपको कोई दीर्घकालिक लाभ नहीं होने वाला..!

क्षमा बड़न को चाहिये छोटन को उत्पात...
का प्रभु हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात...

जब महर्षि भृगु ने सोते हुए हरि की छाती पर लात से प्रहार किया तो श्री हरि बोले कि महर्षि मेरी छाती वज्र की तरह कठोर है तो कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं आयी..?

तो श्री हरि कृष्ण जो कि विष्णु रूप हैं, जो कभी जीत का भाव न हार का भाव मन में लाते हैं..!

तो अगर उनका जन्मदिन मना ही रहे हैं तो सीखें
कि दुनिया उन्हें क्या कहेगी, इसका उन्होंने कभी ख्याल नहीं किया..! जिस-जिस ने उनका मजाक उड़ाया, उनका अपमान किया या उनको अपशब्द कहे... उसको उन्होंने उसके ही हाल पर छोड़कर आगे की राह पकड़ ली...

शक्ति जिम्मेदारी का भाव लेकर आये तो वो श्री हरि कृष्ण कहलाती हैं...

चाहते तो कौन-सा योद्धा था, जो महाभारत में उनके सामने टिकता पर उनसे अटकने में कभी समय खर्च नहीं किया..! जब लड़े तो अपने कद के योद्धाओं से लड़े, अन्यथा हँस कर आगे बढ़ गये...

#मनकीबात

शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

समयसूचक AM और PM का उद्गगम भारत...

समयसूचक AM और PM का उद्गगम भारत ही था, लेकिन हमें बचपन से यह रटवाया गया, विश्वास दिलवाया गया कि इन दो शब्दों AM और PM का मतलब होता है :
 AM : Ante Meridian PM : Post Meridian
 एंटे यानि पहले, लेकिन किसके? पोस्ट यानि बाद में, लेकिन किसके?
 यह कभी साफ नहीं किया गया, क्योंकि यह चुराये गये शब्द का लघुतम रूप था।काफ़ी अध्ययन करने के पश्चात ज्ञात हुआ और हमारी प्राचीन संस्कृत भाषा ने इस संशय को साफ-साफ दृष्टिगत किया है। कैसे? देखिये...
 AM = आरोहनम् मार्तण्डस्य Aarohanam Martandasya
 PM = पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasya
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 सूर्य, जो कि हर आकाशीय गणना का मूल है, उसी को गौण कर दिया। अंग्रेजी के ये शब्द संस्कृत के उस वास्तविक ‘मतलब' को इंगित नहीं करते।
 आरोहणम् मार्तण्डस्य यानि सूर्य का आरोहण (चढ़ाव)।
 पतनम् मार्तण्डस्य यानि सूर्य का ढलाव।
 बारह बजे के पहले सूर्य चढ़ता रहता है - 'आरोहनम मार्तण्डस्य' (AM)।
 बारह के बाद सूर्य का अवसान/ ढलाव होता है - 'पतनम मार्तण्डस्य' (PM)।
 पश्चिम के प्रभाव में रमे हुए और पश्चिमी शिक्षा पाए कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि समस्त वैज्ञानिकता पश्चिम जगत की देन है।

 हम अपनी हजारों साल की समृद्ध विरासत, परंपराओं और संस्कृति का पालन करते हुए भी आधुनिक और उन्नत हो सकते हैं।इस से शर्मिंदा न हों बल्कि इस पर गौरव की अनुभूति करें और केवल नकली सुधारवादी बनने के लिए इसे नीचा न दिखाएं।समय निकालें और इसके बारे में पढ़ें / समझें / बात करें / जानने की कोशिश करें।
 अपने “सनातनी" होने पर गौरवान्वित महसूस करें।
#सनातनी #सनातनभारत #सनातन #सनातनहमारीपहचान

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

गुरु और शिक्षक में अंतर...

आमतौर पर लोग गुरु और शिक्षक को एक ही मानते हैं लेकिन ऐसा नहीं है..! गुरु और शिक्षक के बीच एक गहरा और महत्वपूर्ण दार्शनिक अंतर हैं। यह अंतर केवल शब्दों का नहीं, बल्कि भूमिका, उद्देश्य और प्रभाव का भी हैं। आईए जानते हैं गुरु और शिक्षक पर क्या भेद हैं...

गुरु आपके अन्त:करण पर दृष्टि रखता है, शिक्षक पाठ्यक्रम पर...

शिक्षक बदलते रहते हैं, गुरु एक ही रहते हैं।

गुरुपूर्णिमा गुरु के लिए है, शिक्षक दिवस शिक्षकों के लिए...

शिक्षक रिजल्ट बनाते हैं, गुरु जीवन...

शिक्षक संसार प्रवृत्त होते हैं, सेवा निवृत्ति के बाद वे अपने औपचारिक शैक्षिक दायित्वों से मुक्त हो जाते हैं।
इसके विपरीत, गुरू संसार से शिथिल या निवृत्त होते हुए भी, जीवनभर समष्टि-सेवा-प्रवृत्त रहते हैं। 

शिक्षक बताते हैं, पूर्वज बन्दर थे...
गुरु बताते हैं नारायण /शिव/शक्ति सूर्य-चंद्र वंश के हो, अमुक ऋषि के गोत्र से हो...


शनिवार, 28 जून 2025

एक ऊर्जा कन्वर्टर बनो...

यानि ऐसा इंसान बनो जो अपने आस-पास की हर चीज़ — चाहे वो नकारात्मक सोच हो, मुश्किल हालात हों या असफलताएं... उन्हें अपने लक्ष्य की ऊर्जा में बदल दें। विज्ञान के स्तर पर बात करें तो थर्मोडायनामिक्स का पहला नियम कहता है : ऊर्जा न तो पैदा की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है..! बस एक रूप से दूसरे रूप में बदली जा सकती है। हमारे विचार, हमारी भावनाएँ — ये सब ऊर्जा के ही रूप हैं। जब कोई बाधा सामने आती है तो वो भी एक तरह की ऊर्जा है। अब आपके पास दो विकल्प होते हैं : या तो आप उस ऊर्जा को डर, गुस्से या थकावट में बदल दें या फिर उसे प्रेरणा, उद्देश्य और रचनात्मकता में बदल दें। क्वांटम फिजिक्स कहती है कि ब्रह्मांड की हर चीज़ संभावनाओं में तैर रही है —जो तुम्हारी "ऑब्जर्वेशन" यानी दृष्टि पर निर्भर करती है। यानी दुनिया जैसी है, वो उतनी महत्वपूर्ण नहीं..! जितनी महत्वपूर्ण ये बात है कि तुम उसे कैसे देख रहे हो। हर परिस्थिति एक रॉ एनर्जी है — तुम चाहो तो उसे निराशा बना सकते हो, और चाहो तो उसे आगे बढ़ने का ईंधन...
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रविवार, 25 मई 2025

परवरिश/Parenting के 15 बेहतरीन नियम...

1. जितना आप सोचते हैं आपके बच्चे उससे अधिक चतुर हैं, उससे अधिक जानकारी रखते हैं। आपकी बातों की नहीं, आपके व्यवहार की नकल करते हैं। अपने व्यवहार का ध्यान रखें।
2. सोते समय बच्चों को गले लगाएं, शुभ रात्रि बोलें और उन्हें बताएं कि आप उन्हें प्यार करते हैं।
3. उनकी शिक्षा को सिर्फ स्कूल तक सीमित न रखें, उन्हें दैनिक जीवन के छोटे-छोटे व्यवहारिक काम सीखाएं। 
4. उन्हें पूर्व सैनिकों का सम्मान करना और उनके बलिदान को कभी न भूलना सीखाएं।
5. उनके सुरक्षा कवच न बनें। वे खुद को चोट पहुँचाएँगे, वे कहीं झगड़ा कर लेंगे, बाइक से गिर जाएँगे आदि, लेकिन यह सब सीखने की, उनके बड़े होने की प्रिक्रिया का हिस्सा हैं। 
6. उन्हें किसी समस्या को पहले खुद हल करने दें। उन्हें रास्ते या समाधान तुरंत न बताएं।
7. उन्हें बताएं कि- जब वे कुछ चाहते हैं तो ‘कृपया’ का प्रयोग, जब वे कुछ प्राप्त करते हैं तो ‘धन्यवाद’ का प्रयोग करें। इस तरह के बुनियादी शिष्टाचार उन्हें बहुत आगे ले जायेंगे।
8. उन्हें अपने दादा-दादी के साथ समय बिताने दें। 
9. अपने शेड्यूल को इस तरह से व्यवस्थित कि आपके बच्चे आपकी प्राथमिकताएं हों। उनके साथ समय बिताने का प्रयास करें।
10. जिस चीज़ में उनकी रूचि हो, आप भी उसमें रूचि बनाएं, उसके प्रति उत्साह दिखाएं। उनकी दुनिया को समझें और उसका हिस्सा बनें। 
11. महीने में कम से कम एक दिन पूरी तरह से बच्चों को समर्पित करें। फोन घर पर छोड़कर कहीं घूमने जाएँ, उनके साथ किसी गतिविधि में भाग लें। 
12. वे जितनी उम्र के हैं, उन्हें उसी अनुसार ही समझें। 3 साल के बच्चे से 6 साल के बच्चे की तरह अनुशासित होने की उम्मीद न करें। धैर्य रखें।
13. अनुशासन तभी काम करता है जब आप इसका निरंतर पालन करते हैं। बच्चे कोई सबक तभी सीखते हैं जब आप उन्हें बिठाकर शांति से समझाते हैं। 
14. बच्चों को अपनी भावनाएं दिखाएं। अपनी जीत का जश्न मनाएं, अपनी हार, दुख, या डर के बारे में उन्हें बताएं, चर्चा करें। 
15. आप कल जो थे, आज उससे बेहतर पेरैंट्स बनें। पति-पत्नी एक साथ, एक दिशा में काम करें, एक दूसरे के खिलाफ प्रतिस्पर्धा न करें। कभी भी, बच्चों को अपने मुद्दों के बीच न लाएं। वे हमेशा आपकी पहली प्राथमिकता होने चाहियें।
जानकारी सोर्स: सत्येंद्र यदुवंशी
भावानुवाद: अमित डागर
#amitdagar #parentingcoach #careercoach #PositiveParenting

गुरुवार, 27 मार्च 2025

कमज़ोर आदमी के सामान्य लक्षण...

कमज़ोर आदमी कौन हैं..?

कमज़ोर आदमी वे व्यक्ति होते हैं जिनका आत्म-सम्मान कम होता है, उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है और वो आमतौर पर दूसरों से प्रभावित होते हैं।

कमज़ोर होना आपके चरित्र और रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

कमज़ोर आदमी के ये सामान्य लक्षण हैं: उनकी आवाज़ में आत्मविश्वास की कमी, आसानी से हेरफेर किए जाने और अपने कार्यों के साथ अनिर्णायक होना...

एक मज़बूत आदमी को उच्च-मूल्यवान आदमी के रूप में भी जाना जाता है; वह जिस तरह से खुद को पेश करता है, उसके कारण लोग उसका आसानी से सम्मान करते हैं और उसे पसंद करते हैं।

कमज़ोर आदमी के कुछ सामान्य लक्षण हैं...

1. वह हाँ में हाँ मिलाने वाला आदमी होता हैं...

कमज़ोर आदमी अक्सर अपने जीवन के तरीके में आश्वस्त नहीं होते हैं, इसलिए वे दूसरों के तरीकों को सुनने और उनका अनुसरण करने का इरादा रखते हैं और वे जो भी कहते हैं, वे वही करते हैं।

एक आदमी के रूप में, आपको खुद पर भरोसा करना चाहिए; आपको उदाहरण के द्वारा नेतृत्व करना चाहिए, न कि अनुयायी बनना चाहिए क्योंकि आप अपनी असुरक्षाओं के बारे में चिंतित हैं।

2. वह चुनौतियों से बचता हैं...

यही कारण है कि महिलाएं ऐसे पुरुषों को पसंद करती हैं जो सफलता के लिए प्रयास करते हैं क्योंकि वे चुनौतियों का सामना करते हैं और चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े, जीतते हैं। लेकिन कमज़ोर पुरुष लड़ाई से डरते हैं; वे अपनी छाया में छिप जाते हैं और चुनौती समाप्त होने तक प्रतीक्षा करते हैं।

3. वह दूसरों को खुश करता है लेकिन खुद को नहीं..!

कमज़ोर पुरुष हमेशा दूसरों पर निर्भर रहते हैं। इसका मतलब है कि वे खुद को खुश करने के बजाय दूसरों को खुश करने में अच्छे होते हैं।

जो पुरुष मज़बूत होते हैं और कोई डर नहीं दिखाते हैं, वो हमेशा खुद को बेहतर बनाने और अपने जीवन को जितना संभव हो उतना आसान और स्वतंत्र बनाने के तरीके खोजते रहते हैं।

महिलाएँ आमतौर पर स्वतंत्र पुरुषों की प्रशंसा करती हैं और एक पुरुष के रूप में आपका लक्ष्य यही होना चाहिए।

4. वह दूसरों को ऊँचा स्थान देता हैं...

कमज़ोर पुरुष अपनी स्थिति और पसंद के कारण दूसरों की पूजा करने के लिए जाने जाते हैं; यह उनके व्यक्तित्व और रिश्तों को खतरे में डाल सकता हैं।

वे खुद को लेकर बहुत असुरक्षित होते हैं और हमेशा उन लोगों पर निर्भर रहते हैं जिन्हें वे पूर्णता मानते हैं, जैसे कि वे मशहूर हस्तियाँ जिनकी वे प्रशंसा करते हैं।

एक पुरुष के रूप में आपको मज़बूत और निडर महसूस करना चाहिए, अपने डर का सामना करना चाहिए और आत्मविश्वास का निर्माण करना चाहिए; फिर सब कुछ योजना के अनुसार होगा।

5. वह अपना फ़ैसला खुद नहीं ले सकता..!

महिलाएँ ऐसे पुरुषों को पसंद करती हैं जो ज़िम्मेदारी ले सकें; इससे मेरा मतलब है कि ऐसा पुरुष जो अपने नियम और कानून खुद बना सकता है, न कि ऐसा कमज़ोर पुरुष जो उनकी देखभाल करने के लिए पर्याप्त मज़बूत न हो लेकिन उन पर या दूसरे लोगों के फ़ैसलों पर निर्भर हो।

अपने रिश्ते में एक मानक बनना सीखें; आपकी महिला को इसकी ज़रूरत होगी। उसे आपकी सलाह की ज़रूरत है; उन्हें आपकी ताकत की ज़रूरत है, और उन्हें आपके दिल की ज़रूरत है।

6. उसे आसानी से बरगलाया जा सकता हैं...

कमज़ोर पुरुषों को बरगलाने वालों द्वारा आसानी से बरगलाया जा सकता है, ऐसा इसलिए है क्योंकि उनमें आत्म-जागरूकता की कमी होती है और वे खुद पर विश्वास नहीं करते..! कमज़ोर पुरुषों का इस्तेमाल हमेशा दूसरों को खुश करने के लिए किया जाता है, खासकर अल्फा पुरुषों जैसे उच्च अधिकारियों को...

बरगलाना एक ऐसी चाल है जिसका इस्तेमाल कई लोग रिश्तों में भी करते हैं। वे एक धोखेबाज़ कार्य हैं, जो एक व्यक्ति के रूप में आपकी क्षमता को कम करता है।

7. उसे अपनी आवाज़ पर भरोसा नहीं होता..!

अधिकांश समय, एक आदमी की आवाज़ यह बता सकती है कि वह कमज़ोर आदमी है या मज़बूत..! 
कमज़ोर आदमी को उसकी आवाज़ के लहज़े से पहचानना आसान है; वे खुद पर भरोसा नहीं दिखाते हैं और आमतौर पर इस संकेत द्वारा अनदेखा और अपमानित होते हैं।

जब आप लोगों से बात करते हैं तो आत्मविश्वास दिखाना यह दर्शाता है कि आपको खुद पर दृढ़ विश्वास है और लोगों को अधिकार देता है...

8. वह सीखने से इनकार करता हैं।

यह एक महान दर्शन है कि जो कोई भी ज्ञान चाहता है, वह आत्म-सुधार को महत्व देता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह कोई कमजोरी नहीं दिखाता है। सीखना आपके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण आदत है और यह एक रोज़मर्रा का कौशल होना चाहिए।

सीखने से आपके जीवन के लिए एक स्पष्ट उद्देश्य विकसित होता है और आपके आस-पास की हर चीज़ को अर्थ मिलता है। केवल कमज़ोर लोग ही नए कौशल और ज्ञान को अपनाने से इनकार करते हैं, और यही कारण है कि उनकी तुलना उच्च-मूल्यवान व्यक्ति से नहीं की जा सकती।

12. वह बहुत दिखावा करता हैं।

कमज़ोर पुरुष अपनी असुरक्षा और कम आत्मसम्मान के कारण बहुत दिखावा करते हैं।
@ रुबी गुप्ता रत्ना

ईश्वर ने स्तन क्यों दिये..?

समझिये...

बिना स्तन कोई स्त्री की कल्पना व्यर्थ है..!

इसे फैशन या दिखावा ना बनायें..!
और अगर दिखाना ही है तो आपका पति है, दूसरे को क्यों दिखाना..?

स्त्री के स्तनों से जुड़ा होता है, स्त्री का सारा व्यक्तित्व... 
जब तक स्त्री माँ नहीं बन जाती, तब तक उसकी ऊर्जा पूर्णतः स्तनों तक नहीं पहुँचती..!

शरीर शास्त्री ये प्रश्न उठाते रहते हैं कि पुरूष के शरीर में स्तन क्यों होते हैं..? जबकि उनकी कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती है, क्योंकि पुरूष को बच्चे को दूध तो पिलाना नहीं है..! फिर उनकी क्या आवश्यकता है। 
वे ऋणात्‍मक ध्रुव है, इसलिए तो पुरूष के मन में स्त्री के स्तनों की और इतना आकर्षण है। वे धनात्‍मक ध्रुव है।

इतने काव्य, साहित्य, चित्र, मूर्तियां सब कुछ स्त्री के स्तनों से जुड़े है। ऐसा लगता है जैस पुरूष को स्त्री के पूरे शरीर की अपेक्षा उसके स्तनों में अधिक रस है और यह कोई नई बात नहीं है, गुफाओं में मिले प्राचीनतम चित्र भी स्तनों के ही है। स्तन उनमें महत्‍वपूर्ण है, बाकी का सारा शरीर ऐसा मालूम पड़ता है कि जैसे स्तनों के चारों और बनाया गया हो। 
स्तन आधार भूत है, क्‍योंकि स्तन उनके धनात्मक ध्रुव है। और जहां तक योनि का प्रश्न है, वह करीब-करीब संवेदन रहित है। स्तन उसके सबसे संवेदनशील अंग है और स्त्री देह की सारी सृजन क्षमता स्तनों के आस-पास है।

यही कारण है कि हिंदू कहते है कि जबतक स्त्री मां नहीं बन जाती, वह तृप्त नहीं होती..! पुरूष के लिए यह बात सत्य नहीं है, कोई नहीं कहेगा कि पुरूष जब तक पिता न बन जाए तृप्त नहीं होगा..! पिता होना तो मात्र एक संयोग है। कोई पिता हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है। यह कोई बहुत आधारभूत सवाल नहीं है। एक पुरूष बिना पिता बने रह सकता है और उसका कुछ न खोये..!

लेकिन बिना मां बने स्त्री कुछ खो देती है। क्योंकि उसकी पूरी सृजनात्मकता, उसकी पूरी प्रक्रिया तभी जागती है; जब वह मां बन जाती है। जब उसके स्तन उसके अस्तित्व के केंद्र बन जाते है, तब वह पूर्ण होती है। वह स्तनों तक नहीं पहुंच सकती..! यदि उसे पुकारने वाला कोई बच्चा न हो।

तो पुरूष स्त्रियों से विवाह करते है ताकि उन्हें पत्नियाँ मिल सके, और स्त्रियां पुरूषों से विवाह करती है ताकि वे मां बन सकें, इसलिए नहीं कि उन्हें पति मिल सकें। उनका पूरा का पूरा मौलिक रुझान ही एक बच्चा पाने में है, जो उनके स्त्रीत्‍व को पुकारें।

पश्चिम में बच्चों को सीधे स्तन से दूध न पिलाने का फैशन हो गया है, यह बहुत खतरनाक है। क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि स्त्री कभी अपनी सृजनात्‍मकता के केंद्र पर नहीं पहुंच सकेगी। जब एक पुरूष किसी स्त्री से प्रेम करता है तो वह उसके स्तनों को प्रेम कर सकता है, लेकिन उन्हें मां नहीं कह सकता..!

केवल एक छोटा बच्चा ही उन्हें मां कह सकता हैं।

सोमवार, 10 मार्च 2025

हे पुरुष, महान मैं नहीं..! तुम हो...

हे पुरुष, महान मैं नहीं..! तुम हो...
तुम न हो तो मेरा श्रृंगार अधूरा रहता हैं..!
तुम न हो तो मुझे माँ का दर्जा भी न मिले..!
तुम्हारी वजह से मुझे भाभी, माँ, मौसी, मामी, चाची ये तमाम रिश्ते मिलते हैं...
सहजता और समर्पण तो कोई तुमसे सीखें, सब कुछ करते तुम हो और नाम हमारा देते हो... कमाते तुम हो और जेब मेरी भरी होती है। सब्ज़ी तुम लाते हो, पेट मेरा भरता है। बैंक बैलेंस तुम्हारा होता हैं, मालकिन मैं होती हूँ। 
मैं तो तुम्हें दिखाकर रो लेती हूँ, पर तुम कभी मेरे सामने नहीं रोते..! 
तुम अंधेरे में भी परछाई बनकर खड़े होते हो। दुनिया को सिर्फ मैं दिखाई देती हूँ लेकिन मेरे अंदर मज़बूती भरने वाले तुम दुनिया को नहीं दिखते..!
मुझे तो श्रृंगार की ज़रूरत पड़ती हैं,तुम तो कुदरती खूबसूरत हो...
तुम इतने महान हो कि अपनी महानता का बखान भी नहीं करते..! 
अगर मैं अपना परिवार छोड़कर तुम्हारे घर आती हूँ तो तुम भी तो छोड़ते हो अपनी बुरी आदतें... तुम भी तो छोड़ते हो अपना अस्तित्व और समाहित हो जाते हो मुझमें, जैसे एक नदी सागर में विलीन होती है। 
मुझे ममता की मूर्त कहा जाता है लेकिन मुझसे ज़्यादा तो ममत्व तुम्हारे अंदर हैं, बस तुम्हें अनुमति नहीं दी गयी कि तुम इसे प्रदर्शित करो। लेकिन मैं स्त्री हूँ ना, मैं समझती हूँ तुम्हारा दर्द, तुम्हारा अवसाद... 
तुमने हमें और महान बताने के लिए हमारा दिवस भी बना दिया... लेकिन सच पूछो तो इस दुनिया में तुमसे अधिक महान कोई नहीं हैं..! 
मेरा कंधा तुम्हारे आसुंओं के लिए हमेशा हैं... मेरी बाहें तुम्हारे दर्द को समेटने के लिए, मेरे होंठ तुम्हारी सफलता को चूमने के लिए, मेरा सर तुम्हें सजदा करने के लिए...
हे ईश्वर! मुझे हर जन्म में एक स्त्री ही बनाना ताकि मैं एक पुरुष को अपनी कोख से पैदा कर सकूँ।
- Jyoti Tripathi

रंगभरी एकादशी...

फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आमलकी एकादशी होती है। इसका दूसरा नाम रंगभरी एकादशी भी है।
इस दिन लक्ष्मी-नारायण के साथ शिव-पार्वती का पूजन
होता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने महाशिवरात्रि के दिन माता पार्वती से विवाह किया था और रंगभरी एकादशी के दिन गौना किया था। कहा जाता है कि भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में बिताए थे। इस दिन भक्त भगवान शिव की मूर्तियों पर अबीर, गुलाल, फूल, मिठाई और बेलपत्र अर्पित किया जाता है। साथ ही इस दिन मथुरा में लट्ठमार होली भी खेली जाती हैं।

🍁आमलकी एकादशी व्रत पूजा विधि🍁

इस दिन व्रत रखा जाता  है और जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु के साथ आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि आंवले का पेड़ भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस दिन पूजा के दौरान आमलकी एकादशी की व्रत कथा पढ़ने का विधान है।
सबसे पहले एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करें। इसके बाद मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद एक चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद विष्णु जी के समक्ष दीपक जलाएं और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
भगवान विष्णु की पूजा करके आंवले का भोग लगाएं। पूजा के बाद आंवले के पेड़ के नीचे कलश स्थापित करें। इसके बाद वृक्ष के पूजन के दौरान धूप, दीप, चंदन, रोली, फूल और अक्षत आदि अर्पित करें और किसी गरीब या ब्राह्मण को भोजन कराएं। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर इस कलश, वस्त्र और आंवला का दान कर दें। तुलसी पौधे का भी पूजन करें।
इस दिन विष्णु मंत्र का यथासंभव जाप करें।
आमलकी एकादशी के दिन विष्णु जी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए पूजा के दौरान आसन पर बैठकर ओम दामोदराय नमः, ॐ पद्मनाभाय नमः, या ॐ वैकुण्ठाय नमः इनमें से किसी एक मंत्र की कम से कम एक माला का जप करें। इससे आपके और आपके परिवार के ऊपर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहेगी।

एकादशी के मंत्र
*ॐ दामोदराय नमः।
*ॐ पदमनाभाय नमः।
"ॐ बैकुन्ठाय नमः।
*ॐ नमोः नारायणाय॥
*ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय॥
*ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
*मंगलम भगवान विष्णुः, मंगलम गरुणध्वजः।
मंगलम पुण्डरी काक्षः, मंगलाय तनो हरिः॥

🍁एकादशी भोग प्रसाद 🍁

रंगभरी एकादशी के दिन पूजा में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी के संग भगवान शिव और मां पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करें। पूजा के अंत में ईश्वर को प्रिय चीजों का भोग लगाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु को पंचामृत का भोग अवश्य लगाएं। भोग में तुलसी दल को जरूर शामिल करना चाहिए। माना जाता है कि तुलसी दल के बिना भगवान भोग स्वीकार नहीं करते हैं। इसके अलावा भगवान शिव और मां पार्वती को आप फल, मिठाई और साबूदाने की खीर का भोग लगा सकते हैं।

भगवान को भोग लगाते समय निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए।
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ।।

इस मंत्र का अर्थ है कि हे भगवान जो भी मेरे पास है। वो आपका ही दिया हुआ है। जो आपको ही समर्पित कर रहे हैं। कृपा करके मेरे इस भोग को आप स्वीकार करें।

🍁आमलकी एकादशी व्रत कथा🍁

पौराणिक मान्यता के अनुसार वैदिश नाम का एक नगर था, उस नगर में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र रहते थे। वहां रहने वाले सभी नगरवासी विष्णु भक्त थे और वहां कोई भी नास्तिक नहीं था। उसके राजा का नाम था चैतरथ 
राजा चैतरथ विद्वान थे और वह बहुत धार्मिक थे। उनके नगर में कोई भी व्यक्ति दरिद्र नहीं था। नगर में रहने वाला हर शख्स एकादशी का व्रत करता था। एक बार फाल्गुन महीने में आमलकी एकादशी आई। सभी नगरवासी और राजा ने यह व्रत किया और मंदिर जाकर आंवले की पूजा की और वहीं पर रात्रि जागरण किया। तभी रात के समय वहां एक बहेलिया आया जो कि घोर पापी था, लेकिन उसे भूख और प्यास लगी थी। इसलिए मंदिर के कोने में बैठकर जागरण को देखने लगा और विष्णु भगवान व एकादशी महात्म्य की कथा सुनने लगा। इस तरह पूरी रात बीत गई। नगर वासियों के साथ बहेलिया भी पूरी रात जागा रहा। सुबह होने पर सभी नगरवासी अपने घर चले गए। बहेलिया भी घर जाकर भोजन किया। लेकिन कुछ समय के बाद बहेलिया की मौत हो गई।
हालांकि उसने आमलकी एकादशी व्रत कथा सुनी थी और जागरण भी किया था, इसलिए वह राजा विदूरथ के घर जन्म लिया। राजा ने उसका नाम वसुरथ रखा। बड़ा होकर वह नगर का राजा बना। एक दिन वह शिकार पर निकला, लेकिन बीच में ही मार्ग भूल गया। रास्ता भूल जाने के कारण वह एक पेड़ के नीचे सो गया। थोड़ी देर बाद वहीं म्लेच्छ आ गए और राजा को अकेला देखकर उसे मारने की योजना बनाने लगे। उन्होंने कहा कि इसी राजा के कारण उन्हें देश निकाला दिया गया। इसलिए इसे हमें मार देना चाहिए। इस बात से अनजान राजा सोता रहा। म्लेच्छों ने राजा पर हथियार फेंकना शुरू कर दिया। लेकिन उनके शस्त्र राजा पर फूल बनकर गिरने लगे।

कुछ देर के बाद सभी म्लेच्छ जमीन पर मृत पड़े थे। वही जब राजा की नींद खुली तो उन्होंने देखा कि कुछ लोग जमीन पर मृत पड़े हैं। राजा समझ गया कि वह सभी उसे मारने के लिए आए थे, लेकिन किसी ने उन्हें ही मौत की नींद सुला दी। यह देखकर राजा ने कहा कि जंगल में ऐसा कौन है, जिसने उसकी जान बचाई है। तभी आकाशवाणी हुई कि हे राजन भगवान विष्णु ने तुम्हारी जान बचाई है। तुमने पिछले जन्म में आमलकी एकादशी व्रत कथा सुना था और उसी का फल है कि आज तुम शत्रुओं से घिरे होने के बावजूद जीवित हो। राजा अपने नगर लौटा और सुखीपूर्वक राज करने लगा और धर्म के कार्य करने लगा।
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🌷🌷 भगवान विष्णु चालीसा 🌷🌷
 
भगवान विष्णु को दया और प्रेम का सागर माना जाता है।  विष्णु जी अपनी पत्नी देवी माता लक्ष्मी के साथ क्षीरसागर में वास करते हैं। सच्चे मन से आराधना करने पर वह व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं  पूरी  करते हैं।  

               ।।दोहा।।

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥
 
।।चौपाई।।
 
नमो विष्णु भगवान खरारी,
कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी,
त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत,
सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।

तन पर पीताम्बर अति सोहत,
बैजन्ती माला मन मोहत ॥

शंख चक्र कर गदा विराजे,
देखत दैत्य असुर दल भाजे ।

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे,
काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन,
दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन,
दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥

पाप काट भव सिन्धु उतारण,
कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।

करत अनेक रूप प्रभु धारण,
केवल आप भक्ति के कारण ॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा,
तब तुम रूप राम का धारा ।

भार उतार असुर दल मारा,
रावण आदिक को संहारा ॥

आप वाराह रूप बनाया,
हिरण्याक्ष को मार गिराया ।

धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया,
चौदह रतनन को निकलाया ॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया,
रूप मोहनी आप दिखाया ।

देवन को अमृत पान कराया,
असुरन को छवि से बहलाया ॥

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया,
मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया,
भस्मासुर को रूप दिखाया ॥

वेदन को जब असुर डुबाया,
कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।

मोहित बनकर खलहि नचाया,
उसही कर से भस्म कराया ॥
 

असुर जलन्धर अति बलदाई,
शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।

हार पार शिव सकल बनाई,
कीन सती से छल खल जाई ॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी,
बतलाई सब विपत कहानी ।

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी,
वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥

देखत तीन दनुज शैतानी,
वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी,
हना असुर उर शिव शैतानी ॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे,
हिरणाकुश आदिक खल मारे ।

गणिका और अजामिल तारे,
बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥

हरहु सकल संताप हमारे,
कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे,
दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥

चाहता आपका सेवक दर्शन,
करहु दया अपनी मधुसूदन ।

जानूं नहीं योग्य जब पूजन,
होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण,
विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।

करहुं आपका किस विधि पूजन,
कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण,
कौन भांति मैं करहु समर्पण ।

सुर मुनि करत सदा सेवकाई,
हर्षित रहत परम गति पाई ॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई,
निज जन जान लेव अपनाई ।

पाप दोष संताप नशाओ,
भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ,
निज चरनन का दास बनाओ ।

निगम सदा ये विनय सुनावै,
पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥

॥ इति श्री विष्णु चालीसा ॥

 🌷🌷श्रीविष्ण्वष्टोत्तरशतनामावलिः 🌷🌷
          (भगवान विष्णु के १०८ नाम)

ॐ हृषीकेशाय नमः । केशवाय । मधुसूदनाय । सर्वदतियानां
सूदनाय । नारायणाय । अनामयाय । जयन्ताय । विजयाय । कृष्णाय ।
अनन्ताय । वामनाय । विष्णवे । विश्वेश्वराय । पुण्याय । विश्वात्मने ।
सुरार्चिताय । अनघाय । अघहर्त्रे । नारसिंहाय ।
श्रियः प्रियाय नमः ॥ २०

ॐ श्रीपतये नमः । श्रीधराय । श्रीदाय । श्रीनिवासाय । महोदयाय ।
श्रीरामाय । माधवाय । मोक्षक्षमारूपाय । जनार्दनाय । सर्वज्ञाय ।
सर्ववेत्त्रे । सर्वेशाय । सर्वदायकाय । हरये । मुरारये । गोविन्दाय ।
पद्मनाभाय । प्रजापतये । आनन्दज्ञानसम्पन्नाय । ज्ञानदाय नमः ॥ ४०

ॐ ज्ञानदायकाय नमः । अच्युताय । सबलाय । चन्द्रवक्त्राय ।
व्याप्तपरावराय । योगेश्वराय । जगद्योनये । ब्रह्मरूपाय ।
महेश्वराय । मुकुन्दाय । वैकुण्ठाय । एकरूपाय । कवये । ध्रुवाय ।
वासुदेवाय । महादेवाय । ब्रह्मण्याय । ब्राह्मणप्रियाय । गोप्रियाय ।
गोहिताय नमः ॥ ६०

ॐ यज्ञाय नमः । यज्ञाङ्गाय । यज्ञवर्धनाय । यज्ञस्य भोक्त्रे ।
वेदवेदाङ्गपारगाय । वेदज्ञाय । वेदरूपाय । विद्यावासाय ।
सुरेश्वराय । प्रत्यक्षाय । महाहंसाय । शङ्खपाणये । पुरातनाय ।
पुष्कराय । पुष्कराक्षाय । वराहाय । धरणीधराय । प्रद्युम्नाय ।
कामपालाय । व्यासध्याताय नमः ॥ ८०

ॐ महेश्वराय नमः । सर्वसौख्याय । महासौख्याय । साङ्ख्याय
पुरुषोत्तमाय । योगरूपाय । महाज्ञानाय । योगीशाय । अजितप्रियाय ।
असुरारये । लोकनाथाय । पद्महस्ताय । गदाधराय । गुहावासाय ।
सर्ववासाय । पुण्यवासाय । महाजनाय । वृन्दानाथाय । बृहत्कायाय ।
पावनाय । पपनाशनाय नमः ॥ १००

ॐ गोपीनाथाय नमः । गोपसखाय । गोपालाय । गणाश्रयाय । परात्मने ।
पराधीशाय । कपिलाय । कार्यमानुषाय नमः ॥ १०८

इति श्रीविष्ण्वष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का हिन्दी भावार्थ
 
जो जगत के मूल कारण हैं और सबके हृदय में पुरुष के रूप मैं विराजमान हैं एवं समस्त जगत के एकमात्र स्वामी हैं,
 
जिनके कारण इस संसार में चेतना का विस्तार होता है-उन भगवन को मैं नमस्कार करता हूँ, प्रेम से उनका ध्यान करता हूँ|
 
यह संसार उन्हीं में स्थित है, उन्हीं की सत्ता से प्रतीत हो रहा है, वे ही इसमें व्याप्त हो रहे हैं और स्वयं वे ही इस रूप में प्रकट हो रहे हैं.
 
यह सब होने पर भी वे संसार और इसके कारण -प्रकृति से सर्वथा परे हैं| उन स्वयंप्रकाश, स्वयंसिद्ध सत्तात्मक भगवान की मैं शरण ग्रहण करता हूँ|
 
यह विश्व प्रपंच उन्हीं की माया से उनमें अध्यस्त हैं. यह कभी प्रतीत होता है, तो कभी नहीं. परन्तु उनकी दृष्टि ज्यों-की-त्यों – एक सी रहती है. वे इसके साक्षी हैं और उन दोनों को ही देखते रहते है.
 
वे सबके मूल हैं और अपने मूल भी वही हैं कोई दूसरा उनका कारण नहीं हैं| वे ही समस्त कार्य और कारणों से अतीत प्रभु मेरी रक्षा करें|
 
प्रलय के समय लोक, लोकपाल और इन सबके कारण सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जातें हैं. उस समय केवल अत्यंत घना और गहरा अन्धकार-ही-अन्धकार रहता हैं|
 
परन्तु अन्नंत परमात्मा उससे सर्वथा परे विराजमान रहतें हैं| वे ही प्रभु मेरी रक्षा करें
 
उनकी लीलाओं का रहस्य जानना बहुत ही कठिन है| वे नट की भाँति अनेकों वेष धारण करते हैं. उनके वास्तविक स्वरूप को न तो देवता जानते हैं और न ऋषि ही;
 
फिर दूसरा ऐसा कौन सा कौन प्राणी है जो वहाँ तक जा सके और उनका वर्णन कर सके? वो प्रभु मेरी रक्षा करें|
 
जिनके परम मंगलमयस्वरूप का दर्शन करने के लिए महात्मा गण संसार की समस्त आसक्तियों का परित्याग कर देतें है और वन में जाकर अखंड भाव से ब्रह्मचर्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं
 
तथा अपने आत्मा को सबके हृदय में विराजमान देखकर स्वाभाविक ही सबकी भलाई करते हैं-वे ही मुनियों के सर्वस्व भगवान मेरे सहायक हैं; वे ही मेरी गति हैं.
 
न उनके जन्म-कर्म हैं और न नाम-रूप; फिर उनके सम्बन्ध में गुण और दोषों की तो कल्पना ही कैसे की जा सकती हैं?
 
फिर भी विश्व की सृष्टि और संहार करने के लिए समय-समय पर वे उन्हें अपनी माया से स्वीकार करते हैं
 
उन्हीं अनंत शक्तिमान सर्वेश्वर्यमय परब्रह्म परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ| वो अरूप होने पर भी बहुरूप हैं.
 
उनके कर्म अत्यंत आश्चर्यमय हैं| मैं उनके चरणों में नमस्कार करता हूँ|
 
स्वयं प्रकाश, सबके साक्षी परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ|
 
जो मन, वाणी और चित्त से अत्यंत दूर हैं-उन परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ|
 
विवेकी पुरुष कर्म-सन्यास अथवा कर्म-समर्पण के द्वारा अपना अन्तःकरण शुद्ध करके जिन्हें प्राप्त करते हैं तथा जो स्वयं तो नित्यमुक्त, परमानन्द एवं ज्ञानस्वरूप हैं ही,
 
दूसरों को कैवल्य-मुक्ति देने की सामर्थ्य भी केवल उन्हीं में हैं-उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ|
 
जो सत्व, रज, तम-इन तीन गुणों का धर्म स्वीकार करके क्रमशः शांत, घोर और मूढ़ अवस्था भी धारण करते हैं, उन भेद रहित समभाव से स्थित एवं ज्ञानघन प्रभु को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ|
 
आप सबके स्वामी, समस्त क्षेत्रों के एकमात्र ज्ञाता एवं सर्वसाक्षी हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ. आप स्वयं ही अपने कारण हैं| पुरुष और मूल प्रकृति के रूप में भी आप ही हैं| आपको मेरा बार-बार नमस्कार|
 
आप समस्त इन्द्रिय और उनके विषयों के द्रष्टा हैं| समस्त प्रतीतियों के आधार हैं| अहंकार आदि छायारूप असत वस्तुओं के द्वारा आपका ही अस्तित्व प्रकट होता है|
 
समस्त वस्तुओं को सत्ता के रूप मैं भी केवल आप ही भास् रहे हैं| मैं आपको नमस्कार करता हूँ|
 
आप सबके मूल कारण है, आपका कोई कारण नहीं है, तथा कारण होने पर भी आप में विकार या परिणाम नहीं होता, इसलिए आप अनोखे कारण हैं| आपको मेरा बार-बार नमस्कार!
 
जैसे समस्त नदी-झरने आदि का परम आश्रय समुद्र है, वैसे ही आप समस्त वेद और शास्त्रों के परम तात्पर्य है| 
 
आप मोक्षस्वरूप हैं और समस्त संत आपकी ही शरण ग्रहण करते हैं; अतः आपको मैं नमस्कार करता हूँ|
 
जैसे यज्ञ के काष्ठ अरणि में अग्नि गुप्त रहती हैं, वैसे ही आपने अपने ज्ञान को गुणों को माया ढक रखा हैं
 
गुणों में क्षोभ होने पर उनके द्वारा विविध प्रकार की सृष्टि रचना का आप संकल्प करते हैं|
 
जो लोग कर्म-संन्यास अथवा कर्म-समर्पण के द्वारा आत्म तत्त्व की भावना करके वेद-शास्त्रों के ऊपर उठ जाते हैं, उनके आत्मा के रूप में आप स्वयं ही प्रकाशित हो जाते है| 
 
आपको मैं नमस्कार करता हूँ|
 
जैसे कोई दयालु पुरुष फंदे में पड़े हुए पशु का बंधन काट दे, वैसे ही आप मेरे-जैसे शरणागतों की फाँसी काट देते हैं| 
 
आप नित्यमुक्त हैं, परम करुणामय हैं और भक्तों का कल्याण करने में आप कभी आलस्य नहीं करते|
 
आपके चरणों में मेरे नमस्कार है| समस्त प्राणियों के हृदय में अपने अंश के द्वारा अंतरात्मा के रूप  में आप उपलब्ध होते रहते हैं| आप सर्वेश्वर्यपूर्ण एवं अनंत हैं| आपको मैं नमस्कार करता हूँ|
 
जैसे कोई दयालु पुरुष फंदे में पड़े हुए पशु का बंधन काट दे, वैसे ही आप मेरे-जैसे शरणागतों की फाँसी काट देते हैं. आप नित्यमुक्त हैं, परम करुणामय हैं और भक्तों का कल्याण करने में आप कभी आलस्य नहीं करते|
 
आपके चरणों में मेरे नमस्कार है| समस्त प्राणियों के हृदय में अपने अंश के द्वारा अंतरात्मा के रूप  में आप उपलब्ध होते रहते हैं| आप सर्वेश्वर्यपूर्ण एवं अनंत हैं| आपको मैं नमस्कार करता हूँ|
 
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कामना से मनुष्य उन्हीं का भजन करके अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेते हैं| इतना ही नहीं, वे उनको सभी प्रकार का सुख देते हैं
 
और अपने ही जैसा अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं| वे ही परम दयालु प्रभु मेरा उद्धार करें|
 
जिनके अनन्यप्रेमी भक्तजन उन्हीं की शरण में रहते हुए उनसे किसी भी वस्तु की-यहाँ तक की मोक्ष की भी अभिलाषा नहीं करते,
 
केवल उनकी परम दिव्य मंगलमयी लीलाओं का गान करते हुए आनंद के समुद्र में निमग्न रहते हैं,
 
जो अविनाशी, सर्वशक्तिमान, अव्यक्त, इन्द्रियातीत और अत्यंत सूक्ष्म हैं;जो अत्यंत निकट रहने पर भी बहुत दूर जान पड़ते हैं;
 
जो आध्यात्मिक योग अर्थात ज्ञान योग या भक्तियोग के द्वारा प्राप्त होते हैं-उन्हीं आदिपुरुष, अनंत एवं परिपूर्ण परब्रह्म परमात्मा की मैं स्तुति करता हूँ|
 
जिनकी अत्यंत छोटी कला से अनेकों नाम-रूप के भेद-भाव से युक्त ब्रह्मा आदि देवता, वेद और चराचर लोकों की सृष्टि हुई है |
 
जैसे धधकती हुई आग से लपटें और प्रकाशमान सूर्य से उनकी किरणें बार-बार निकलती और लीन होती रहती हैं|
 
वैसे ही जिन स्वयंप्रकाश परमात्मा से बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीर-जो गुणों के प्रवाहरूप हैं-बार-बार प्रकट होते तथा लीन हो जाते हैं,
 
वे भगवान न देवता हैं और न असुर. वे मनुष्य और पशु-पक्षी भी नहीं है| न वे स्त्री हैं, न पुरुष और न नपुंसक| वे कोई साधारण या असाधारण प्राणी भी नहीं हैं| न वे गुण हैं और न कर्म, न कार्य हैं और न तो कारण ही|
 
सबका निषेध हो जाने पर जो कुछ बचा रहता है, वही उनका स्वरूप है तथा वे ही सब कुछ हैं| वे ही परमात्मा मेरे उद्धार के लिए प्रकट हों|
 
मैं जीना नहीं चाहता. यह हाथी की योनि बाहर और भीतर-सब ओर से अज्ञानरूप आवरण के द्वारा ढकी हुई है, इसको रखकर करना ही क्या है?
 
मैं तो आत्मप्रकाश को ढकने वाले उस अज्ञानरूप आवरण से छूटना चाहता हूँ, जो काल क्रम से अपने-आप नहीं छूट सकता, जो केवल भगवत्कृपा अथवा तत्त्वज्ञान के द्वारा ही नष्ट होता है|
 
इसलिए मैं उन परब्रह्म परमात्मा की शरण में हूँ| जो विश्वरहित होने पर भी विश्व के रचयिता और विश्वरूप हैं-
 
साथ ही जो विश्व की अंतरात्मा के रूप में विश्वरूप सामग्री से क्रीड़ा भी करते हैं, उन अजन्मा परमपदस्वरूप ब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूँ|
 
योगी लोग योग के द्वारा कर्म, कर्मवासना और कर्मफल को भस्म करके अपने योगशुद्ध हृदय में जिन योगेश्वर भगवान का साक्षात्कार करते हैं-उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ|
 
प्रभो! आपकी तीन शक्तियों-सत्त्व, रज और तम के रागादि वेग असह्य हैं. समस्त इन्द्रियों और मन के विषयों के रूप में भी आप ही प्रतीत हो रहें हैं| इसलिए जिनकी इन्द्रियां वश में नहीं हैं,
 
वे तो आपकी प्राप्ति का मार्ग भी नहीं पा सकते. आपकी शक्ति अनंत हैं |
 
आप शरणागतवत्सल हैं| आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ|
 
आपकी माया अहंबुद्धि से आत्मा का स्वरूप ढक गया है, इसी से यह जीव अपने स्वरूप नहीं जान पाता| आपकी महिमा अपार है| उन सर्वशक्तिमान एवं माधुर्यनिधि भगवान् की मैं शरण में हूँ| 

🌷भगवान जगदीश्वर महाविष्णु जी की आरती 🌷
 
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
 
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
 
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥

 
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
 
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥

 
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
 
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥

 
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
 
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥

 जगदीश्वर महाविष्णु जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल

आचार्य श्री गिरधारी मिश्रा शास्त्री 
9968004668