शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

हिन्दी : राजभाषा, राष्ट्रभाषा या विश्वभाषा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा 1917 में भरुच (गुजरात) में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता प्रदान की गई थी। तत्पश्चात 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने का निर्णय लिया तथा 1950 में संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के द्वारा हिन्दी को देवनागरी लिपि में राजभाषा का दर्जा दिया गया। 

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से 14 सितंबर को 'हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से लेकर अनुच्छेद 351 तक राजभाषा संबंधी संवैधानिक प्रावधान किए गए। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन राजभाषा विभाग का गठन किया गया। भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन राजभाषा विभाग का गठन किया गया। राष्ट्रपति के आदेश द्वारा 1960 में आयोग की स्थापना के बाद 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित हुआ, तत्पश्चात 1968 में राजभाषा संबंधी प्रस्ताव पारित किया गया।

राजभाषा अधिनियम की धारा 4 के तहत राजभाषा संसदीय समिति 1976 में गठित की गई। राजभाषा नियम 1976 में लागू किए गए तथा राजभाषा संसदीय सम‍िति की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा 'राजभाषा नीति' बनाई जाकर लागू की गई। 

राजभाषा अधिनियम 1963 द्वारा राजभाषा के शासकीय कार्यों, नियमन हेतु प्रावधान किए गए। तीन भाषायी क्षेत्र बनाए गए जिसके तहत 'क' क्षेत्र में- उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, हरियाणा, हिमाचल, उत्तरांचल, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली एवं अंडमान द्वीप समूह। 'ख' क्षेत्र में- गुजरात, महाराष्ट्र तथा 'ग' क्षेत्र में- उपरोक्त के अतिरिक्त सभी राज्य एवं संघ क्षेत्र रखे गए। 

यह सुनिश्चित किया गया कि राजभाषा में प्राप्त पत्रों के जवाब शत-प्रतिशत राजभाषा में दिए जाएं। अन्य भाषा में प्राप्त पत्रों के जवाब क्षेत्र 'क' में हिन्दी तथा अंग्रेजी में, 'ख' में 60 प्रतिशत हिन्दी-अंग्रेजी व शेष अंग्रेजी में तथा 'ग' में 40 प्रतिशत हिन्दी-अंग्रेजी तथा शेष अंग्रेजी में दिए जा सकते हैं। यह आंकड़ा धीरे-धीरे हिन्दी-अंग्रेजी की ओर बढ़ाया जाए तथा 'क' भाषी क्षेत्रों में पूर्णत: राजभाषा हिन्दी का प्रयोग सुनिश्चित किया जाए। 

राजभाषा विभाग प्रत्येक वर्ष वार्षिक कार्यक्रम जारी करता है, साथ ही राजभाषा नियम 1976 के तहत बनाए गए नियमों के अधीन मासिक, त्रैमासिक एवं अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट के माध्यम से सतत निगरानी एवं विश्लेषण का कार्य करता है तथा अपनी समेकित रिपोर्ट संसदीय राजभाषा समिति जिसमें कि 30 सदस्य (क्रमश: 10 राज्यसभा और 20 लोकसभा से) होते हैं; के समक्ष प्रस्तुत करता है, जो‍ कि समय-समय पर विभिन्न विभागों का दौरा कर वस्तुस्थिति का अध्ययन करती है तथा अपनी निरीक्षण रिपोर्ट सीधे राष्ट्रपति को प्रस्तुत करती है। 

प्रत्येक कार्यालय में राजभाषा संबंधी एक त्रैमासिक बैठक का प्रावधान पिछली तिमाही में किए गए कार्यों, पत्राचार, तिमाही में आयोजित कार्यशाला एवं राजभाषा के प्रशिक्षण संबंधी उपलब्धता एवं परिमार्जन हेतु सुझाव आमंत्रित किए जाने हेतु किया गया। राजकीय विभागों में राजभाषा के प्रयोग हेतु सर्वाधिक प्रभावी प्रक्रिया पत्राचार है, क्योंकि उसी के आधार पर मिसिल अथवा फाइलों में टीप लिखी जाती है। 

अत: जब भी त्रैमासिक बैठकों में विचार-विमर्श होता है, तब सबसे ज्यादा सूक्ष्‍म विश्लेषण त्रैमासिक पत्राचार पर होता है, आंकड़ों की निगरानी भी होती है, कठिनाइयां सामने आती हैं और सुधार हेतु उपाय भी खोजे जाते हैं ताकि राजभाषा का अधिकाधिक प्रयोग पत्राचार में बढ़ाया जा सके। 

विभाग प्रमुख की अध्यक्षता में होने वाली इन बैठकों में विभाग के विभिन्न अनुभागों के जिम्मेदार अधिकारियों के बीच एक स्वस्थ प्रतियोगिता भी पनपती है कि वह और अधिक बेहतर परिणाम दैनंदिनी पत्रों में राजभाषा के प्रयोग द्वारा दे तथा उसके प्रयास सभी के बीच सराहे जा सकें। 

यह हमारी विडंबना रही है कि देश में राजभाषा के रूप में हिन्दी को संविधान लागू होने के पूर्व कभी भी आधिकारिक मान्यता नहीं मिली थी। मुगलों के समय राजभाषा के रूप में अरबी-फारसी का बोलबाला था, तो अंग्रेजों ने अंग्रेजी और उर्दू को राजकाज चलाने में इस्तेमाल किया। दरअसल, हिन्दुस्तान में खड़ी बोली और हिन्दी जनभाषा के रूप में मान्य रही और पुष्ट होती चली गई। 

आज भी सरकार ने राष्ट्रभाषा के रूप में राजभाषा को स्वीकार नहीं किया है, मगर जनता ने इसे राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकार ‍कर लिया है। इसकी व्यापक स्वीकृति शीघ्र इसे विश्वभाषा का दर्जा प्रदान करवा देगी। इसके पीछे देवनागरी का सांस्कृतिक होना भी है। 

संस्कृत संगणक (कम्प्यूटर) पर सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा के रूप में मान्य की गई है, मगर संस्कृत का प्रचार-प्रसार अत्यल्प होने के कारण उसकी निकटतम भाषा के रूप में तथा व्यापकता की दृष्टि से हमारी राजभाषा हिन्दी को फायदा मिलना सुनिश्चित है। 

साहित्य समाज का दर्पण होता है। समाज भौतिकतावादी हुआ है, उसकी सोच अर्थवादी हो गई है, विश्व बाजारवाद पर चल पड़ा है, तब हमारा देश ‍वैश्विक संस्कृति से अलग नहीं रह पा रहा है। हमने राजभाषा को पूर्णता होते हुए भी बाजारीय अर्थवादी सोच नहीं दी। यही कारण है कि हमारा लेखक याचक है और प्रकाशक दाता। 

हिन्दी की किताब छापना और बेचना घाटे का सौदा है, जबकि अंग्रेजी में किताब छापना मुनाफे का धंधा है। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद हिन्दी की किताबों से ज्यादा प्रसद्धि और पैसा बटोर रहा है। 

मौजूदा समय में विश्‍व स्तर पर अंग्रेजी के सबसे अच्‍छे लेखक मूलत: भारतीय हैं। गीता जैसी सूक्ष्म प्रबंधकीय किताब होने के बावजूद हम राष्ट्रभाषा के प्रबंधन में कहीं न कहीं चूक गए हैं और यही चूक राजकीय स्तर पर भी हुई। 

हमारे नीति-निर्माताओं ने व्यापक सोच के स्थान पर भाषायी संकीर्णता और क्षेत्रीयता को तरजीह दी, फलत: 22 भाषाओं को राज्यों की राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गई। हम एक भाषा को राष्ट्रभाषा नहीं बना सके और यही कारण है कि हमें आज राजकीय त्रैमासिक पत्रों के विश्लेषण के माध्यम से अधिकारी-कर्मचारियों के राजभाषा हिन्दी के विकास में योगदान पर चर्चा करनी पड़ती है। 

यह हिन्दी की जीत है कि जिन क्षेत्रों से हिन्दी का विरोध हुआ उन्हीं क्षेत्रों के नाम पर 'चेन्नई एक्सप्रेस' जैसी हिन्दी फिल्में 3 दिन में 100 करोड़ और 300 करोड़ का आंकड़ा पार कर वैश्विक फिल्म का दर्जा पा रही है। 

शासकीय कर्मचारी-अधिकारी देश के एक भाग से दूसरे भाग में आ-जा रहे हैं। स्थानांतरण के कारण तो वे राजभाषा के ध्वजवाहक बने हुए हैं। वैश्वीकरण का लाभ निश्चित रूप से हिन्दी को देश में पुष्टता प्राप्त करने में हुआ है। 

इंटरनेट ने देशों की दूरियां कम की हैं तब ‍‍‍अधि‍कारियों-कर्मचारियों को भाषा की महत्ता समझ में आ रही है। वे यह जान गए हैं कि ‍वैश्चिक स्तर की तरक्की के लिए अंग्रेजी जरूरी नहीं है। 

हमारे देश में विदेशी प्रतिनिधिमंडल आते हैं तो सरकारी दु‍भाष‍िए से काम चलाते हैं, क्योंकि इंग्लैंड-अमेरिका के लोगों को छोड़ दें तो ज्यादातर लोग अंग्रेजी नहीं जानते। 

शासकीय स्तर पर खासकर तकनीकी, न्यायालयीन, कर राजस्व आदि क्षेत्रों में मान्य मानक शब्दावली की हिन्दी में अनुपलब्धता ने राजभाषा के प्रयोग में बड़ी बाधा खड़ी की हुई है जिसका निराकरण भा‍षाविदों से अपेक्षित था। विभिन्न राजकीय अधिकारियों-कर्मचारियों ने इसका निदान व्यावहारिक तौर पर पत्राचार के माध्यम से अपने-अपने क्षेत्रों में नए प्रयोग से तकनीकी हिन्दी शब्दों का विकास किया है। तकनीकी शब्दावली आयोग भी प्रयासरत है यद्यपि एकरूपता का अभाव बना हुआ है। 

यह एक शुभ शकुन है कि शासकीय अधिकारियों और कर्मचारियों में राष्ट्रीयता की भावना, एक राष्ट्र-एक भाषा की आवश्यकता और राष्ट्रीय एकता की सोच स्पष्ट है। वह सूचना प्रौद्योगिकी के प्रति भी सचेत है और अपनी सी‍माओं में रहकर राजनेताओं के मंसूबे अच्छी तरह पहचानता है अत: राजभाषा के उन्नयन में समर्थ और सार्थक योगदान दे रहा है। 

अभाव से उत्साह कम नहीं होता 
हो भाव तो नियम में दम नहीं होता 
हैं समर्थ हम और सार्थक भी हम 
नियम भी हम हैं और नियामक भी हम 
एक नहीं थे, कमजोर नहीं, कभी रण से भागे न हम 
उन्नति के उन्नायक भी हम, रहे विश्व के नायक भी हम 
हिन्दी विश्वभाषा बने, हैं इस लायक भी हम।


गुरुवार, 2 जनवरी 2020

गुरु गोविंद सिंह जी के जन्म दिवस के अवसर पर नागरिक संशोधक एक्ट #CAA को समर्थन देती कविता

डर-डर कर जीते हैं हिंदू , जब इस  हिंदुस्तान में...
जाने कैसे जीते होंगे, हिन्दू पाकिस्तान में...
धर्म जुलूसों पर विवाद है, धर्म उसूलों पर विवाद हैं।
होली रखने पर विवाद हैं, होली में रंग पर विवाद हैं।
दीवाली पर चले पटाखे-फुलझडियों पर भी विवाद हैं।
आशंकित त्योहार मनाते हिन्दू ही हिन्दुस्तान में...
क्या त्योहार मनाते होंगे, हिन्दू पाकिस्तान में..?
गाय का पालन, गाय का पोषण हिन्दू की पहचान हैं।
गाय की सेवा, गाय की रक्षा हिन्दू का अरमान हैं...
गाय की हत्या प्रतिबंधित हैं, भारत के कानून से...
फिर क्यों सडकें रंग जाती हैं, गौ माता के खून से..?
सरेआम गौ हत्या होती हैं, जब हिन्दुस्तान में...
जाने क्या-क्या होता होगा... सोचो पाकिस्तान में...
छेड़-छाड़ का दंश झेलती, रोज-रोज हिन्दू नारी...
अपमानों का घूंट पी रही, रोज-रोज हिन्दू नारी...
चौराहे पर खडी हुई... सोच रही हिन्दू नारी...
या तो धर्म छोड़ दे अपना, या हो जाये हरि प्यारी।
दुष्कर्मी वे खोप घूमते हों, जब हिन्दुस्तान में...
सोचो क्या-क्या होता होगा फिर तो पाकिस्तान में...
छापे, तिलक, हवन करने से धर्म नहीं बचने वाला...
हलुवा-पूरी भंडारे से धर्म नहीं बचने वाला...
गुरु गोविंद सिंह का आव्हान कोने-कोने फैलाओ...
एक पुत्र दो... धर्म की खातिर, वीर प्रसूता माताओं🙏🏻
वरना दुभर हो जायेगा... रहना हिन्दुस्तान में...
सारा मुल्क बदल जायेगा, हिंसक पाकिस्तान में...

बुधवार, 1 जनवरी 2020

गुरु गोविन्द सिंह और जफरनामा का सच

गुरु गोविन्द सिंह जी एक महान योद्धा होने के साथ साथ महान विद्वान् भी थे। वह ब्रज भाषा, पंजाबी, संस्कृत और फारसी भी जानते थे और इन सभी भाषाओं में कविता भी लिख सकते थे। जब औरंगजेब के अत्याचार सीमा से बढ़ गए तो गुरूजी ने मार्च 1705 को एक पत्र भाई दयाल सिंह के हाथों औरंगजेब को भेजा। इसमे उसे सुधरने की नसीहत दी गयी थी। यह पत्र फारसी भाषा के छंद शेरों के रूप में लिखा गया है। इसमे कुल 134 शेर हैं। इस पत्र को ज़फरनामा कहा जाता है।

यद्यपि यह पत्र औरंगजेब के लिए था लेकिन इसमे जो उपदेश दिए गए हैं, वह आज हमारे लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इसमें औरंगजेब के आलावा मु सल मानों के बारे में जो लिखा गया है, वह हमारी आँखें खोलने के लिए काफी हैं। इसीलिए ज़फरनामा को धार्मिक ग्रंथ गुरु गोविन्द सिंह और जफरनामा का सच के रूप में स्वीकार करते हुए दशम ग्रन्थ में शामिल किया गया है।

जफरनामासे विषयानुसार कुछ अंश प्रस्तुत किये जा रहे हैं. ताकि लोगों को इस्लाम की हकीकत पता चल सकें -

1 - शस्त्रधारी ईश्वर की वंदना -

बनामे खुदावंद तेगो तबर, खुदावंद तीरों सिनानो सिपर।
खुदावंद मर्दाने जंग आजमा, ख़ुदावंदे अस्पाने पा दर हवा।

उस ईश्वर की वंदना करता हूँ, जो तलवार, छुरा, बाण, बरछा और ढाल का स्वामी है और जो युद्ध में प्रवीण वीर पुरुषों का स्वामी है। जिनके पास पवन वेग से दौड़ने वाले घोड़े हैं।

2 - औरंगजेब के कुकर्म -

तो खाके पिदर रा बकिरादारे जिश्त, खूने बिरादर बिदादी सिरिश्त
वजा खानए खाम करदी बिना, बराए दरे दौलते खेश रा

तूने अपने बाप की मिट्टी को अपने भाइयों के खून से गूँधा और उस खून से सनी मिट्ट से अपने राज्य की नींव रखी। और अपना आलीशान महल तैयार किया।

3 - अल्लाह के नाम पर छल -

न दीगर गिरायम बनामे खुदात, कि दीदम खुदाओ व् कलामे खुदात
ब सौगंदे तो एतबारे न मांद, मिरा जुज ब शमशीर कारे न मांद

तेरे खुदा के नाम पर मैं धोखा नहीं खाऊंगा क्योंकि तेरा खु-दा और उसका कलाम झूठे हैं। मुझे उनपर यकीन नहीं है इसलिए सिवा तलवार के प्रयोग से कोई उपाय नहीं रहा।

4 - छोटे बच्चों की हत्या -

चि शुद शिगाले ब मकरो रिया, हमीं कुश्त दो बच्चये शेर रा
चिहा शुद कि चूँ बच्च गां कुश्त चार, कि बाकी बिमादंद पेचीदा मार

यदि सियार शेर के बच्चों को अकेला पाकर धोखे से मार डाले तो क्या हुआ... अभी बदला लेने वाला उसका पिता कुंडली मारे विषधर की तरह बाकी है। जो तुझ से पूरा बदला चुका लेगा।

5 - मु-सलमानों पर विश्वास नहीं -

मरा एतबारे बरीं हल्फ नेस्त, कि एजद गवाहस्तो यजदां यकेस्त
न कतरा मरा एतबारे बरूस्त, कि बख्शी ओ दीवां हम कज्ब गोस्त.
कसे कोले कुरआं कुनद ऐतबार, हमा रोजे आखिर शवद खारो जार
अगर सद ब कुरआं बिखुर्दी कसम, मारा एतबारे न यक जर्रे दम

मुझे इस बात पर यकीन नहीं कि तेरा खुदा एक है। तेरी किताब (कुरान) और उसका लाने वाला सभी झूठे हैं। जो भी कु-रान पर विश्वास करेगा, वह आखिर में दुखी और अपमानित होगा। अगर कोई कुरान कि सौ बार भी कसम खाए, तो उस पर यकीन नहीं करना चाहिए।

6 - दुष्टों का अंजाम -

कुजा शाह इस्कंदर ओ शेरशाह, कि यक हम न मांदस्त जिन्दा बजाह
कुजा शाह तैमूर ओ बाबर कुजास्त, हुमायूं कुजस्त शाह अकबर कुजास्त

सिकंदर कहाँ है और शेरशाह कहाँ है, सब जिन्दा नहीं रहे। कोई भी अमर नहीं हैं, तैमूर, बाबर, हुमायूँ और अकबर कहाँ गए। सब का एकसा अंजाम हुआ।

7 - गुरूजी की प्रतिज्ञा -

कि हरगिज अजां चार दीवार शूम, निशानी न मानद बरीं पाक बूम
चूं शेरे जियां जिन्दा मानद हमें, जी तो इन्ताकामे सीतानद हमें
चूँ कार अज हमां हीलते दर गुजश्त, हलालस्त बुर्दन ब शमशीर दस्त

हम तेरे शासन की दीवारों की नींव इस पवित्र देश से उखाड़ देंगे। मेरे शेर जब तक जिन्दा रहेंगे, बदला लेते रहेंगे। जब हरेक उपाय निष्फल हो जाएँ तो हाथों में तलवार उठाना ही धर्म है।

8 - ईश्वर सत्य के साथ है -

इके यार बाशद चि दुश्मन कुनद, अगर दुश्मनी रा बसद तन कुनद.श
उदू दुश्मनी गर हजार आवरद, न यक मूए ऊरा न जरा आवरद

यदि ईश्वर मित्र हो, तो दुश्मन क्या क़र सकेगा, चाहे वह सौ शरीर धारण क़र ले। यदि हजारों शत्रु हों, तो भी वह बाल बांका नहीं क़र सकते है। सदा ही धर्म की विजय होती है।

गुरु गोविन्द सिंह ने अपनी इसी प्रकार की ओजस्वी वाणियों से लोगों को इतना निर्भय और महान योद्धा बना दिया कि अब भी शांतिप्रिय सिखों से उलझाने से कतराते हैं। वह जानते हैं कि सिख अपना बदला लिए बिना नहीं रह सकते, इसलिए उनसे दूर ही रहे।

इस लेख का एकमात्र उद्देश्य है कि आप लोग गुरु गोविन्द साहिब कि वाणी को आदर पूर्वक पढ़ें और श्री गुरु तेगबहादुर और गुरु गोविन्द सिंह जी के बच्चों के महान बलिदानों को हमेशा स्मरण रखें और उनको अपना आदर्श मनाकर देश-धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध हो जाएँ, वर्ना यह सेकुलर और जिहादी एक दिन हिन्दुओं को विलुप्त प्राणी बनाकर मानेंगे।

गुरु गोविन्द सिंह का बलिदान सर्वोपरि और अद्वितीय हैं।

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, 
बढे धर्म हिन्दू सकल भंड भागे।⛳


मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

विश्व की अब तक की सबसे महंगी जमीन...

#अभूतपूर्व_अद्वितीय_पूज़्यनीय_अद्भुत 

मित्रों... क्या आप जानते हैं कि विश्व में आज तक की सबसे महंगी ज़मीन कहाँ पर बिकी हैं..?

लंदन में..? पैरिस में.. न्यू यॉर्क में..? नहीं...
विश्व में आज तक किसी एक भूमि के टुकड़े का सबसे अधिक दाम चुकाया गया हैं। हमारे भारत में ही पंजाब में स्थित में...
और विश्व की इस सबसे महंगी भूमि को ख़रीदने वाले महान व्यक्ति का नाम था... दीवान टोडर मल

गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे-छोटे साहिबज़ादों बाबा फ़तह सिंह और बाबा ज़ोरावर सिंह की शहादत की दास्तान शायद आप सबने कभी ना कभी, कहीं ना कहीं से सुनी होगी... 
यहीं सिरहिन्द के फ़तहगढ़ साहिब में मुग़लों के तत्कालीन फ़ौजदार वज़ीर खान ने दोनो साहिबज़ादों को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था।
दीवान टोडर मल जो कि इस क्षेत्र के एक धनी व्यक्ति थे और गुरु गोविंद सिंह जी एवं उनके परिवार के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान करने को तैयार थे, उन्होंने वज़ीर खान से साहिबज़ादों के पार्थिव शरीर की माँग की और वह भूमि जहाँ वह शहीद हुए थे। वहीं पर उनकी अंत्येष्टि करने की इच्छा प्रकट की...
वज़ीर खान ने धृष्टता दिखाते हुए भूमि देने के लिए एक अटपटी और अनुचित माँग रखी... वज़ीर खान ने माँग रखी कि इस भूमि पर सोने की मोहरें बिछाने पर जितनी मोहरें आएँगी, वही इस भूमि का दाम होगा... 
दीवान टोडर मल के अपने सब भंडार ख़ाली करके जब मोहरें भूमि पर बिछानी शुरू कीं तो वज़ीर खान ने धृष्टता की पराकाष्ठा पार करते हुए कहा कि मोहरें बिछा कर नहीं... बल्कि खड़ी करके रखी जाएँगी... ताकि अधिक से अधिक मोहरें वसूली जा सकें... ख़ैर... दीवान टोडर माल ने अपना सब कुछ बेच-बाच कर और मोहरें इकट्ठी कीं और 78000 सोने की मोहरें देकर चार गज़ भूमि को ख़रीदा ताकि गुरु जी के साहिबज़ादों का अंतिम संस्कार वहाँ किया जा सके...
विश्व के इतिहास में ना सिरहिन्द जैसे त्याग की कहीं कोई और मिसाल मिलती हैं, ना ही कहीं पर किसी भूमि के टुकड़े का इतना भारी मूल्य कहीं और आज तक चुकाया गया।

जब बाद में गुरु गोविन्द सिंह जी को इस बारे में पता चला तो उन्होंने दीवान टोडर मल से कृतज्ञता प्रकट की और उनसे कहा की... वे उनके त्याग से बहुत प्रभावित हैं और उनसे इस त्याग के बदले में कुछ माँगने को कहा...

ज़रा सोचिए... 
दीवान टोडर मल ने क्या माँगा होगा... गुरु जी से...
दीवान जी ने गुरु जी से जो माँगा... उसकी_कल्पना_करना_भी_असम्भव_है !

दीवान टोडर मल जी ने गुरु जी से कहा कि यदि कुछ देना ही चाहते हैं तो कुछ ऐसा वर दीजिए की 'मेरे घर पर कोई पुत्र ना जन्म लें और मेरी वंशावली यहीं मेरे साथ ही समाप्त हो जाए। इस अप्रत्याशित माँग पर गुरु जी सहित सब लोग हक्के-बक्के रह गए... गुरु जी ने दीवान जी से इस अद्भुत माँग का कारण पूछा तो दीवान जी का उत्तर ऐसा था जो रोंगटे खड़े कर दें...
दीवान टोडर मल ने उत्तर दिया कि गुरु जी... यह जो भूमि इतना महंगा दाम देकर ख़रीदी गयी और आपके चरणों में न्योछावर की गयी, मैं नहीं चाहता की कल को मेरे वंश आने वाली नस्लों में से कोई कहे कि यह भूमि मेरे पुरखों ने ख़रीदी थी।
यह थी निस्वार्थ त्याग और भक्ति की आज तक की सबसे बड़ी मिसाल...
आज किसी धार्मिक स्थल पर चार ईंटे लगवाने पर भी लोग अपने नाम_की_पट्टी पहले लगवाते हैं... एक_पंखा तक लगवाने पर उसके परों पर #अपने_नाम_छपवाते हैं...
आज देश में एक #फ़र्ज़ी_बलिदानी_परिवार अपने आप को सबसे बड़ा बलिदान का प्रतीक बताते हुए पिछले #सत्तर_वर्षों_से_देशवासियों_को मूर्ख_बना_रहा_है।

हमारे पुरखे जो-जो बलिदान देकर गए हैं, वह अभूतपूर्व है और इन्ही बलिदानों के कारण ही हम लोगों का अस्तित्व अभी तक है... हमारी इतनी औक़ात नहीं कि हम इस बलिदान के हज़ारवें भाग का भी ऋण उतार सकें।

यह सब जिन दिनों में हुआ यह वही दिसम्बर के आखरी सप्ताह के दिन थे जिन दिनों में आज कल हम #मूर्ख_भारतीय जोकर जैसे कपड़े पहन कर क्रिसमस जैसे विदेशी त्योहार मनाते हुए #बेगानी_शादी_में_दीवाने हुए जाते हैं।

रविवार, 8 दिसंबर 2019

#संघ_वाला_जमाई⛳

मेरे मात -पिता के मन में, सखी
जाने क्या थी बात समाई 
देखा उन्होंने मेरे लिए, जो
एक "संघ" वाला जमाई ।

क्या कहूँ बहन मुझे न जाने 
क्या -क्या सहन करना होता हैं!
'इनके' घर आने -जाने का 
कोई निश्चित समय न होता है।

कभी कहें दो लोगों का भोजन 
कभी दस का भी बनवाते है
जब चाहे ये घर पर बहना 
अधिकारियो को ले आते है।

लाठी, नीकर, दरी-चादर बांध 
बस ये तो फरमान सुनाते है 
शिविर में जाना हर माह इन्हें
बिस्तर बांध निकल जाते है।

प्रातः शाखा, शाम को बैठक
कार्यक्रम अनेको होते हैं...
दो बोल प्रेम से जो बोल सके मुझे 
वो बोल ही इनपर न होते है।

इनकी व्यस्त दिनचर्या से बहना 
कभी -कभी तंग बहुत आ जाती हूँ।
ये तो घर पर ज्यादा न रह पाते
मैं मायके भी न जा पाती हूँ ।

#पर...

ख़ुशी मुझे इस बात की है होती
और "गर्व" बहुत ही होता हैं।
मेरे "इनके" अंदर एक चरित्रवान इंसान
"स्वयंसेवक" के रूप में रहता है।

आज के कलुषित वातावरण में भी, जो
नियमो से जीवन जी रहा
"संघ" के कारण अनुशाषित जीवन 
और सार्थक राह पर चल रहा।

उनके कारण मैं भी तो बहन 
कुछ राष्ट्र कार्य कर पाती हूँ।
प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से 
इस हवन में आहुति दे पाती हूँ।

इसीलिए नहीं कोई शिकायत 
मैं अपने मात-पिता से करती हूँ।
एक स्वयंसेवक के रूप में "संस्कारी" पाया
बस ह्रदय से धन्यवाद उनका करती हूँ।

🙏🏻भारत माता की जय⛳

शनिवार, 28 सितंबर 2019

हे जगदंबा ! जगत् की समस्त स्त्रियां तुम्हारा ही स्वरूप हैं, लेकिन रुकिए...

नवरात्र आते ही कुछ मूर्खों की टोलियां विधवा विलाप प्रारम्भ कर देती हैं। हर औरत(नारी) देवी दुर्गा की रूप हैं। मंदिर में तो देवी की पूजा करते हैं पर बाहर में स्त्रियों का अपमान करतें हैं।

एक अंश में इनका कथन उचित है क्योंकि कहा भी है कि स्त्रिया: समस्ता: सकला जगत्सु 

अर्थात

"हे जगदंबा ! जगत् की समस्त स्त्रियां तुम्हारा ही स्वरूप हैं।"

लेकिन रुकिए... यहाँ समस्ता का अर्थ सभी नहीं हैं अपितु वे सभी हैं जिस स्त्री में लज्जा है, जो शास्त्रानुरूप आचरण करतीं हैं, जो समग्र शास्त्रों में वर्णित विधिनिषेध का पालन करतीं हैं। इसीलिए सर्वप्रथम देवी के इस रूप के अनुसार आचरण कीजिये। 

या_देवी_सर्वभूतेषु_लज्जा_रूपेण_संस्थिता 

तब ही यह सोचियेगा कि आप देवी की स्वरूप हैं। यदि आपने ऐसा कर लिया तो कोई भी हो, आपका सम्मान अवश्य करेगा।  एक बार अपने वस्त्रों और देवी के वस्त्रों को जरूर देख लीजियेगा... अर्धकटीं न्याय नहीं चलेगा। कुछ इधर का मान लिया, कुछ उधर का और लगे चिल्लाने।


पाश्चात्य संस्कृति का पालन करते हुए समाज में अपना अंग प्रदर्शन कीजियेगा और अपने को भोग की वस्तु के रूप में स्थापित कीजियेगा तो असम्भव ही है कि कोई आपका सम्मान करे। अपनी मर्यादा में रहिए, सम्मान और आपकी पूजा आवश्य होगी। अपनी मर्यादा का अतिक्रमण कर के आप स्वछंद आचरण करके सम्मान चाहियेगा तो फिर वही होगा जो शूर्पणखा के साथ हुआ था।

#लछिमन_अति_लाघवँ_सो_नाक_कान_बिनु_कीन्हि
लक्ष्मण जी ने बड़ी फुर्ती से उसको बिना नाक-कान की कर दिया।

अतः अपने अंदर सीता, पद्मावती के समान व्यवहार आचार विचार लाने का प्रयत्न कीजिये... नहीं तो शूर्पणखा के जैसा हालत होगा तो फिर इधर-उधर सर पीटते रहिये। कोई रावण ही होगा जो आपकी सुनेगा। सनातन में लिंग विषेश का नहीं, चरित्र की पूजा करने का आदेश हैं।

#आचारहीनं_न_पुनन्ति_वेदा

   ।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।

बुधवार, 25 सितंबर 2019

भीष्म पितामह को जल दिए बगैर श्राद्ध का विधान नहीं होता पूरा, जानिए क्यों है ऐसी रीत...

अपनी संस्कृति व परंपराओं का अभिमान, सनातन कुल के परंपरा पुरुषों का मान व सभी को अपने में समा लेने का वरदान, यही वे तीन प्राण तत्व हैं जो भारतीय धर्म-दर्शन को सनातन व अविनाशी बनाते हैं। समय काल- परिस्थिति के अनुसार खुद को ढाल लेने वाले इस जीवन दर्शन को उदात्तता के शिखर तक ले जाते हैं। इसी औदार्य व इसी श्रद्धा से जुड़ती है एक कहानी पितृपक्ष की, जो पाठकों को महाभारत काल तक ले जाती है। कितने गहरे तक जुड़ी है अपने महानायकों के प्रति भारतीय सनातन समाज की श्रद्धा व संवेदनाएं इसकी थाह बताती हैं।


महाभारत के कथानक तथा पौराणिक आख्यानों के अनुसार कुरुकुल के पितृ पुरुष और उस दौर के महानायकों में से एक पितामह भीष्म (देवव्रत) अपनों के बाणों से बिंध कर रण क्षेत्र में शर-शैय्या धारी हुए। स्वयं की इच्छा के अनुसार पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने के बाद अर्जुन के तीर से फूटे सोते का जल ग्रहण कर शरशैय्या पर ही मृत्यु का वरण किया। देवव्रत भीष्म चूंकि नि:संतान मरे, अतएव श्राद्ध तिथियों में उनके नाम का तर्पण कौन करेगा यह प्रश्न तत्कालीन समाज व्यवस्था के सामने था। सभी ने उनकी इस व्यथा से अपने को जोड़ा। कर्मकांड के महारथियों ने अपने इस महानायक की खातिर सारी लीकों को तोड़ा और शास्त्रीय व्यवस्था दी कि न सिर्फ पितामह के वंशज बल्कि समस्त भारतीय समाज और उनकी आने वाली पीढिय़ों, जाति-समुदाय, पंथ-गोत्र के दायरों से अलग युगों तक पितामह को स्मरण करेंगी।

एक परंपरा का अनुगमन करते हुए प्रत्येक श्राद्ध वार्षिकी में अपने कुल-गोत्र के पूर्वजों के साथ ही वैयाघ्र गोत्र के महारथी भीष्म के नाम का तर्पण कर यश-कीर्ति के पुण्यफल का वरण करेंगी। युग बीत गए। परिवर्तन की आंधियों के चलते न जाने कितने संस्कारों के घट रीत गए। फिर भी सनातन समाज आज भी हर श्राद्ध पक्ष में अपने पुरखों का जब भी तर्पण करता है तब 'वैयाघ्र पद गोत्राय सांग्कृत्य प्रवराय च-अपुत्राय ददाम्येतद् जलं भीष्माय वर्मणे' के मंत्र से जौ-अक्षत के साथ इस युग पुरुष को उनके अंश स्वरूप उनकी तर्पण की अंजलि हमेशा अर्पण करता है। उल्लेखनीय यह भी कि तर्पण की भीष्माजंलि के बगैर श्राद्ध संस्कारों की पूर्णता नहीं मानी जाती। यह सिर्फ एक रस्म नहीं, है हमारी थाती।

*यह संवेदना ही है सनातन की प्राण शक्ति*

कहते हैं दर्शन शास्त्र के विद्वान प्रो. देवव्रत चौबे 'मन की संवेदनाओं के साथ धार्मिक तत्वों का यह योग ही प्राण शक्ति है सनातन धर्म-दर्शन की। भीष्म तर्पण के विधान के साथ जुड़े भाव का ही दृष्टांत लें तो वे पद की दृष्टि से स्मरण शृंखला में पितृ पद से भी ऊपर देव पद पर प्रतिष्ठित हैं। इसीलिए जहां कुल के दिवंगतों को अपशव्य होकर दक्षिणाभिमुख तिलोदक देते हैं, वहीं पुत्र लाभ से वंचित पितामह को और ऊंचा पीढ़ा देते हुए शव्य (यज्ञोपवीत बाएं कंधे पर) मुद्रा में जल- अक्षत देकर उन्हें देव कोटि की पूर्वाभिमुख श्रद्धा-अंजलि समर्पित करते हैं।