रविवार, 15 मार्च 2020

आइए वैज्ञानिक/हिंदू_मास/months को समझते हैं...

हिन्दू मास को समझना थोड़ा कठिन है- मूलत: चंद्र मास को देखकर ही तीज-त्योहार मनाए जाते हैं। सबसे ज्यादा यही प्रचलित है। इसके अलाव नक्षत्र मास, सौर मास और अधिमास भी होते हैं।

चंद्रमास : चंद्रमा की कला की घट-बढ़ वाले दो पक्षों (कृष्‍ण और शुक्ल) का जो एक मास होता है, वही चंद्रमास कहलाता है। यह दो प्रकार का शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अमावस्या को पूर्ण होने वाला 'अमांत' मास मुख्‍य चंद्रमास है। कृष्‍ण प्रतिपदा से 'पूर्णिमात' पूरा होने वाला गौण चंद्रमास है। यह तिथि की घट-बढ़ के अनुसार 29, 30 व 28 एवं 27 दिनों का भी होता है।

पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। सौर-वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा हैं। चंद्र-वर्ष इसीलिए हर 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है।

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बड़े हुए दिनों को 'मलमास' या 'अधिमास' कहते हैं।

चंद्रमास के नाम : चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन

महीनों के नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में रहता है...

1. चैत्र : चित्रा, स्वाति

2. वैशाख : विशाखा, अनुराधा

3. ज्येष्ठ : ज्येष्ठा, मूल

4. आषाढ़ : पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, सतभिषा

5. श्रावण : श्रवण, धनिष्ठा

6. भाद्रपद : पूर्वभाद्र, उत्तरभाद्र

7. आश्विन : अश्विन, रेवती, भरणी

8. कार्तिक : कृतिका, रोहणी

9. मार्गशीर्ष : मृगशिरा, उत्तरा

10. पौष : पुनर्वसु, पुष्य

11. माघ : मघा, अश्लेशा

12. फाल्गुन : पूर्वाफाल्गुन, उत्तराफाल्गुन, हस्त

शनिवार, 14 मार्च 2020

शीतला माता

शीतला माता एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी हैं। इनका प्राचीनकाल से ही बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गर्दभ(गधा) बताया गया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन(झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन्हें चेचक आदि कई रोगों की देवी बताया गया है। इन बातों का प्रतीकात्मक महत्व होता है। चेचक का रोगी व्यग्रता में वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत: कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। शीतला-मंदिरों में प्राय: माता शीतला को गर्दभ पर ही आसीन दिखाया गया है। शीतला माता के संग ज्वरासुर- ज्वर का दैत्य, ओलै चंडी बीबी - हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण- त्वचा-रोग के देवता एवं रक्तवती - रक्त संक्रमण की देवी होते हैं। इनके कलश में दाल के दानों के रूप में विषाणु या शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है।

शीतला माता

Kalighat Shitala.jpg
शीतला माता
संबंधशक्ति अवतार
अस्त्रकलशसूप
झाड़ूनीम के पत्ते
जीवनसाथीशिव
सवारीगर्दभ

स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है:

वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।

मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

अर्थात

गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाडू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी झाडू होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से हमारा तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है।

मान्यता अनुसार इस व्रत को करने से देवी शीतला प्रसन्‍न होती हैं और व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोड़े, नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुंसियों के चिन्ह तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं।

श्री शीतला चालीसा


दोहा
जय जय माता शीतला तुमही धरे जो ध्यान। 
होय बिमल शीतल हृदय विकसे बुद्धी बल ज्ञान ॥
घट घट वासी शीतला शीतल प्रभा तुम्हार। 
शीतल छैंय्या शीतल मैंय्या पल ना दार ॥

चालीसा
जय जय श्री शीतला भवानी। 
जय जग जननि सकल गुणधानी ॥
गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजती। 
पूरन शरन चंद्रसा साजती ॥
विस्फोटक सी जलत शरीरा। 
शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥
मात शीतला तव शुभनामा। 
सबके काहे आवही कामा ॥
शोक हरी शंकरी भवानी। 
बाल प्राण रक्षी सुखदानी ॥
सूचि बार्जनी कलश कर राजै। 
मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥
चौसट योगिन संग दे दावै। 
पीड़ा ताल मृदंग बजावै ॥
नंदिनाथ भय रो चिकरावै। 
सहस शेष शिर पार ना पावै ॥
धन्य धन्य भात्री महारानी। 
सुर नर मुनी सब सुयश बधानी ॥
ज्वाला रूप महाबल कारी। 
दैत्य एक विश्फोटक भारी ॥
हर हर प्रविशत कोई दान क्षत। 
रोग रूप धरी बालक भक्षक ॥
हाहाकार मचो जग भारी। 
सत्यो ना जब कोई संकट कारी ॥
तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा। 
कर गई रिपुसही आंधीनी सूपा ॥
विस्फोटक हि पकड़ी करी लीन्हो। 
मुसल प्रमाण बहु बिधि कीन्हो ॥
बहु प्रकार बल बीनती कीन्हा। 
मैय्या नहीं फल कछु मैं कीन्हा ॥
अब नही मातु काहू गृह जै हो। 
जह अपवित्र वही घर रहि हो ॥
पूजन पाठ मातु जब करी है। 
भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥
अब भगतन शीतल भय जै हे। 
विस्फोटक भय घोर न सै हे ॥
श्री शीतल ही बचे कल्याना। 
बचन सत्य भाषे भगवाना ॥
कलश शीतलाका करवावै। 
वृजसे विधीवत पाठ करावै ॥
विस्फोटक भय गृह गृह भाई। 
भजे तेरी सह यही उपाई ॥
तुमही शीतला जगकी माता। 
तुमही पिता जग के सुखदाता ॥
तुमही जगका अतिसुख सेवी। 
नमो नमामी शीतले देवी ॥
नमो सूर्य करवी दुख हरणी। 
नमो नमो जग तारिणी धरणी ॥
नमो नमो ग्रहोंके बंदिनी। 
दुख दारिद्रा निस निखंदिनी ॥
श्री शीतला शेखला बहला। 
गुणकी गुणकी मातृ मंगला ॥
मात शीतला तुम धनुधारी। 
शोभित पंचनाम असवारी ॥
राघव खर बैसाख सुनंदन। 
कर भग दुरवा कंत निकंदन ॥
सुनी रत संग शीतला माई। 
चाही सकल सुख दूर धुराई ॥
कलका गन गंगा किछु होई। 
जाकर मंत्र ना औषधी कोई ॥
हेत मातजी का आराधन। 
और नही है कोई साधन ॥
निश्चय मातु शरण जो आवै। 
निर्भय ईप्सित सो फल पावै ॥
कोढी निर्मल काया धारे। अंधा कृत नित दृष्टी विहारे ॥
बंधा नारी पुत्रको पावे। जन्म दरिद्र धनी हो जावे ॥
सुंदरदास नाम गुण गावत। 
लक्ष्य मूलको छंद बनावत ॥
या दे कोई करे यदी शंका। 
जग दे मैंय्या काही डंका ॥
कहत राम सुंदर प्रभुदासा। 
तट प्रयागसे पूरब पासा ॥
ग्राम तिवारी पूर मम बासा। 
प्रगरा ग्राम निकट दुर वासा ॥
अब विलंब भय मोही पुकारत। 
मातृ कृपाकी बाट निहारत ॥
बड़ा द्वार सब आस लगाई। 
अब सुधि लेत शीतला माई ॥
यह चालीसा शीतला पाठ करे जो कोय।
सपनेउ दुःख व्यापे नही नित सब मंगल होय ॥

                बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल भाल भल किंतू।
          जग जननी का ये चरित रचित भक्ति रस बिंतू‌।।

                    ॥ इति ॥

श्री शीतला माता जी की आरती

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता

आदिज्योति महारानी सब फल की दाता | जय

रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता, 

ऋद्धिसिद्धि चंवर डोलावें, जगमग छवि छाता | जय

विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता, 

वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता | जय

इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा, 

सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता | जय

घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता, 

करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता | जय

ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता, 

भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता | जय

जो भी ध्यान लगावैं प्रेम भक्ति लाता, 

सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता | जय

रोगन से जो पीड़ित कोई शरण तेरी आता, 

कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता | जय

बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता, 

ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता | जय

शीतल करती जननी तुही है जग त्राता, 

उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता | जय

दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता, 

भक्ति आपनी दीजै और न कुछ भाता | जय 


अस्य श्रीशीतलास्तोत्रस्य महादेव ऋषि:

अनुष्टुप् छन्द:, शीतला देवता, 

लक्ष्मी बीजम्, भवानी शक्ति:

सर्व-विस्फोटकनिवृत्तय विनियोग 


अर्थ – इस श्रीशीतला स्तोत्र के ऋषि महादेव जी, छन्द अनुष्टुप, देवता शीतला माता, बीज लक्ष्मी जी तथा शक्ति भवानी देवी हैं. सभी प्रकार के विस्फोटक, चेचक आदि, के निवारण हेतु इस स्तोत्र का जप में विनियोग होता है।

ईश्वर उवाच

वन्देSहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।

मार्जनीकलशोपेतां    शूर्पालंकृतमस्तकाम्।। 1

अर्थ – ईश्वर बोले – गर्दभ(गधा) पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में मार्जनी(झाड़ू) तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली भगवती शीतला की मैं वन्दना करता हूँ।

🙏🏻

वन्देSहं  शीतलां  देवीं  सर्वरोगभयापहाम्।

यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटकभयं महत्।। 2


अर्थ – मैं सभी प्रकार के भय तथा रोगों का नाश करने वाली उन भगवती शीतला की वन्दना करता हूँ, जिनकी शरण में जाने से विस्फोटक अर्थात चेचक का बड़े से बड़ा भय दूर हो जाता है।

🙏

शीतले शीतले चेति यो ब्रूयाद्याहपीडित:।

विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति।। 3


अर्थ – चेचक की जलन से पीड़ित जो व्यक्ति “शीतले-शीतले” – ऎसा उच्चारण करता है, उसका भयंकर विस्फोटक रोग जनित भय शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

🙏

यस्त्वामुदकमध्ये तु  धृत्वा पूजयते नर:।

विस्फोटकभयं  घोरं गृहे तस्य  न जायते।। 4


अर्थ – जो मनुष्य आपकी प्रतिमा को हाथ में लेकर जल के मध्य स्थित हो आपकी पूजा करता है, उसके घर में विस्फोटक, चेचक, रोग का भीषण भय नहीं उत्पन्न होता है।

🙏

शीतले  ज्वरदग्धस्य पूतिगन्धयुतस्य च।

प्रणष्टचक्षुष:   पुंसस्त्वामाहुर्जीवनौषधम्।। 5


अर्थ – हे शीतले! ज्वर से संतप्त, मवाद की दुर्गन्ध से युक्त तथा विनष्ट नेत्र ज्योति वाले मनुष्य के लिए आपको ही जीवनरूपी औषधि कहा गया है।

🙏

शीतले तनुजान् रोगान्नृणां हसरि दुस्त्यजान्।

विस्फोटककविदीर्णानां   त्वमेकामृतवर्षिणी।। 6


अर्थ – हे शीतले! मनुष्यों के शरीर में होने वाले तथा अत्यन्त कठिनाई से दूर किये जाने वाले रोगों को आप हर लेती हैं, एकमात्र आप ही विस्फोटक – रोग से विदीर्ण मनुष्यों के लिये अमृत की वर्षा करने वाली हैं।

🙏

गलगण्डग्रहा रोगा ये चान्ये दारुणा नृणाम्।

त्वदनुध्यानमात्रेण शीतले यान्ति संक्षयम्।।7


अर्थ – हे शीतले! मनुष्यों के गलगण्ड ग्रह आदि तथा और भी अन्य प्रकार के जो भीषण रोग हैं, वे आपके ध्यान मात्र से नष्ट हो जाते हैं।

🙏

न मन्त्रो नौषधं तस्य पापरोगस्य विद्यते। 

त्वामेकां शीतले धात्रीं नान्यां पश्यामि देवताम्।।8


अर्थ – उस उपद्रवकारी पाप रोग की न कोई औषधि है और ना मन्त्र ही है. हे शीतले! एकमात्र आप जननी को छोड़कर (उस रोग से मुक्ति पाने के लिए) मुझे कोई दूसरा देवता नहीं दिखाई देता।

🙏

मृणालतन्तुसदृशीं   नाभिहृन्मध्यसंस्थिताम्।

यस्त्वां संचिन्तयेद्देवि तस्य मृत्युर्न जायते।। 9


अर्थ – हे देवि! जो प्राणी मृणाल – तन्तु के समान कोमल स्वभाव वाली और नाभि तथा हृदय के मध्य विराजमान रहने वाली आप भगवती का ध्यान करता है, उसकी मृत्यु नहीं होती। 

🙏

अष्टकं शीतलादेव्या यो नर: प्रपठेत्सदा।

विस्फोटकभयं  घोरं गृहे तस्य  न जायते।। 10


अर्थ – जो मनुष्य भगवती शीतला के इस अष्टक का नित्य पाठ करता है, उसके घर में विस्फोटक का घोर भय नहीं रहता।

🙏

श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धाभक्तिसमन्वितै:।

उपसर्गविनाशाय  परं  स्वस्त्ययनं  महत्।।11


अर्थ – मनुष्यों को विघ्न-बाधाओं के विनाश के लिये श्रद्धा तथा भक्ति से युक्त होकर इस परम कल्याणकारी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए अथवा श्रवण (सुनना) करना चाहिए।

🙏

शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता।

शीतले  त्वं  जगद्धात्री  शीतलायै  नमो नम:।।12


अर्थ – हे शीतले! आप जगत की माता हैं, हे शीतले! आप जगत के पिता हैं, हे शीतले! आप जगत का पालन करने वाली हैं, आप शीतला को बार-बार नमस्कार हैं।

🙏

रासभो   गर्दभश्चैव   खरो    वैशाखनन्दन:।

शीतलावाहनश्चैव       दूर्वाकन्दनिकृन्तन:।।13


एतानि खरनामानि शीतलाग्रे तु य: पठेत्।

तस्य गेहे शिशुनां च शीतलारुड़् न जायते।।14

🙏

13 व 14 का अर्थ – जो व्यक्ति रासभ, गर्दभ, खर, वैशाखनन्दन, शीतला वाहन, दूर्वाकन्द – निकृन्तन – भगवती शीतला के वाहन के इन नामों का उनके समक्ष पाठ करता है, उसके घर में शीतला रोग नहीं होता है।

🙏

शीतलाष्टकमेवेदं न देयं यस्य कस्यचित्।

दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धाभक्तियुताय वै।।15


अर्थ – इस शीतलाष्टक स्तोत्र को जिस किसी अनधिकारी को नहीं देना चाहिए अपितु भक्ति तथा श्रद्धा से सम्पन्न व्यक्ति को ही सदा यह स्तोत्र प्रदान करना चाहिए।


।।इति श्रीस्कन्दमहापुराणे शीतलाष्टकं सम्पूर्णम्।।

'जो जीता वही सिकंदर' तो आपने सुना ही होगा लेकिन "जिसने सिकंदर को जीता" आइए... उसके बारे में जानते हैं...

💪 #जो_जीता_वही_पोरस ⛳

#महान_क्षत्रिय_योद्धा_पोरस,  एक प्राचीन राज्य के शासक थे, जो झेलम नदी और आधुनिक पंजाब, पाकिस्तान में चिनाब नदी के बीच स्थित है। ये #चंद्रवंशी_पांडवों_के_वंशज_थे।
अजीब लगता है जब भारत में सिकंदर को महान कहा जाता है और उस पर गीत लिखे जाते हैं। उस पर तो फिल्में भी बनी हैं जिसमें उसे महान बताया गया और एक कहावत भी निर्मित हो गई है - जो जीता वही सिकंदर

यह इतिहास है 2000 वर्ष पुराना...
तब भारत में सबसे शक्तिशाली साम्राज्य मगध था। 

क्या सिकंदर एक महान विजेता था? 

#ग्रीस_के_प्रभाव से लिखी गई पश्चिम के इतिहास की किताबों में यह बताया जाता है और पश्चिम जो कहता है... दुनिया उसे आंख मूंदकर मान लेती है। मगर #ईरानी_और_चीनी_इतिहास के नजरिए से देखा जाएं तो यह छवि कुछ अलग ही दिखती है। इतिहास में यह लिखा गया कि सिकंदर ने पोरस को हरा दिया था। यदि सचमुच ऐसा होता तो सिकंदर मगध तक पहुंच जाता और तब भारत का इतिहास कुछ और होता... लेकिन इतिहास लिखने वाले यूनानियों ने सिकंदर की हार को
पोरस की हार में बदल दिया। यूनानी इतिहासकारों के झूठ को पकड़ने के लिए ईरानी और चीनी विवरण और भारतीय इतिहास के विवरणों को भी पढ़ा जाना चाहिए। यूनानी
इतिहासकारों ने सिकंदर के बारे में झूठ लिखा था, ऐसा करके उन्होंने अपने महान योद्धा और देश के सम्मान को बचा लिया और दुनियाभर में सिकंदर को महान बना दिया। हालांकि आप
जानना चाहेंगे कि आखिरी युद्ध कैसे, कब, कहां और क्यों हुआ था। यह भी कि आखिरी युद्ध में कौन, कैसे जीता था..? 

#सिकंदर_का_आक्रमण : सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने सौतेले व चचेरे भाइयों का कत्ल करने के बाद यूनान के मेसेडोनिया के सिन्हासन पर बैठा था। अपनी महत्वाकांक्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला... उसकी
खास दुश्मनी ईरानियों से थी। सिकंदर ने ईरान के पारसी राजा दारा को पराजित कर दिया और विश्व विजेता कहलाने लगा... यहीं से उसकी भूख बढ़ गई। 

सिकंदर को ईरानी कृति 'शाहनामा' ने महज एक विदेशी क्रूर राजकुमार माना है महान नहीं..!

भारत पर पहला आक्रमण : जब सिकंदर ईरान से आगे बड़ा तो उसका सामना भारतीय सीमा पर बसे छोटे-छोटे राज्यों से हुआ। भारत की सीमा में पहुंचते तो पहाड़ी सीमाओं पर भारत के अपेक्षाकृत छोटे राज्यों अश्विन एवं अश्वकायन की वीर सेनाओं ने कुनात, स्वात, बुनेर, पेशावर (आजका) में सिकंदर की सेनाओं को भयानक टक्कर दी। मस्सागा (मत्स्यराज) राज्य में तो महिलाएं तक उसके सामने खड़ी हो गईं, पर धूर्त और धोखे से वार करने वाले यवनी (यूनानियों) ने मत्स्यराज के सामने संधि का नाटक करके उन पर रात में हमला किया और उस राज्य की राजनीति, बच्चों सहित पूरे राज्य को उसने तलवार से काट डाला। यही हाल उसने अन्य छोटे राज्यों में किया। मित्रता संधि की आड़ में अचानक आक्रमण कर कई राजाओं को बंधक बनाया। भोले-भाले भारतीय राजा उसकी चाल का शिकार होते रहे। अंत में उसने गांधार तक्षशिला पर हमला किया। 

#पोरस_को_भिजवाया_समर्पण_करने_का_संदेश : गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने सिकंदर से लड़ने के बजाय उसका भव्य स्वागत किया। आम्भी ने ऐसे इसलिए किया क्योंकि उसी पोरस से शत्रुता थी और दूसरी ओर उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं था। गांधार-तक्षशिला के
राजा आम्भी ने पोरस के खिलाफ सिकंदर की गुप्त रूप से सहायता की... सिकंदर ने पोरस के पास एक संदेश भिजवाया जिसमें उसने पोरस से सिकंदर के समक्ष समर्पण करने की बात लिखी थी लेकिन पोरस एक महान योद्धा था, उसने सिकंदर की अधीनता अस्वीकार कर दी और युद्ध की तैयारी करना शुरू कर दी।

#पोरस_का_साम्राज्य : #राजा_पोरस_का_समय

340 ईसा पूर्व से 315 ईसा पूर्व तक का माना जाता है। पुरुवंशी महान सम्राट पोरस का साम्राज्य विशालकाय था। महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के
स्वामी थे। पोरस का साम्राज्य जेहलम (झेलम) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। पोरस के संबंध में मुद्राराक्षस में उल्लेख मिलता है। पोरस अपनी बहादुरी के लिए विख्यात था। उसने उन सभी के समर्थन से अपने साम्राज्य का निर्माण
किया था उन्होंने खुखरायनों पर उसके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था। जब सिकंदर हिन्दुस्तान आया और जेहलम (झेलम) के समीप पोरस के साथ उनका संघर्ष हुआ, तब पोरस को खुखरायनों का भरपूर समर्थन मिला था। इस तरह पोरस, जो स्वयं सभरवाल उपजाति का था और खुखरायन जाति समूह का एक हिस्सा था, उनका शक्तिशाली नेता बन गया।' - 
आईपी आनंद थापर (ए क्रूसेडर्स सेंचुरी : इन परस्यूट ऑफ एथिकल वेल्यूज/केडब्ल्यू प्रकाशन से प्रकाशित) 

#सिन्धु_और_झेलम : सिन्धु और झेलम के पार किए बगैर पोरस के राज्य में पैर रखना मुश्किल था। राजा पोरस अपने क्षेत्र की प्राकृतिक स्थिति, भूगोल और झेलम नदी की प्रकृति से अच्छी तरह वाकिफ थे। पुरु ने इस बात का पता लगाने की कोशिश नहीं की कि यवन सेना की शक्ति का रहस्य क्या है? यवन सेना का मुख्य बल उसके द्रुतगामी अश्वारोही तथा घोड़ों पर सवार फुर्तीले तीरंदाज थे। जासूसों और धूर्तता के बल पर सिकंदर के सरदार युद्ध जीतने के प्रति पूर्णतः आश्वस्त थे। 

#युद्ध_का_वर्णन :
राजा पुरु के शत्रु लालची आम्भी की सेना लेकर सिकंदर ने झेलम पार की। राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी 7 फुट से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े। पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों को जिस भयंकर रूप से संहार किया था उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे थे। भारतीयों के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के आठ, शक्तिशाली गज सेना के अलावा कुछ अनोखे हथियार भी थे जैसे सात फुटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई-कई शत्रु सैनिकों और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिकों को भी मार गिरा सकता था। इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली।
सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए। यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंतः प्रतिरक्षा
टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया।
कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है। राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुक फाइल (संस्कृत-भवकाली) को अपने भाई से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया। ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी होते हुए नहीं देखा था।

सिकंदर जमीन पर गिरा तो सामने राजा पुरु तलवार लिए सामने खड़ा था। सिकंदर बस पलभर का मेहमान था कि तभी राजा पुरु ठिठक गया। यह डर नहीं था, बल्कि यह आर्य राजा का क्षात्र धर्म था, कि किसी निहत्थे राजा को यूं न मारा जाए। यह सहिष्णुता पोरस के लिए भारी पड़ गई। पोरस कुछ समझ पाता तभी सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहां से
उठाकर भगा ले गए। सिकंदर की सेना का मनोबल भी इस युद्ध के बाद टूट गया था और उसने नए अभियान के लिए आगे बढ़ने से इंकार कर दिया था। सेना में विद्रोह की स्थिति पैदा हो रही थी इसलिए सिकंदर ने वापस जाने का फैसला किया। झेलम के इस पार रसद और मदद भी कम होने लगी
थी। मिलों का सफर तय करने आई सिकंदर की सेना अब और लड़ना नहीं चाहती थी। कई सैनिक और घोड़े मारे गए थे।

ऐसे में सिकंदर व उसकी सेना सिन्धु नदी के मुहाने पर पहुंची तथा घर की ओर जाने के लिए पश्चिम की ओर मुड़ी। सिकंदर ने सेना को प्रतिरोध से बचने के लिए नए रास्ते से वापस भेजा और खुद सिन्धु नदी के रास्ते गया, जो छोटा व सुरक्षित था। भारत में शत्रुओं के उत्तर पश्चिम से घुसने के दो ही रास्ते रहे हैं जिसमें सिन्धु का रास्ता कम खतरनाक माना जाता था। उस वक्त सिकंदर सनक में आगे तक घुस गया, जहां उसकी पलटन को भारी क्षति उठानी पड़ी। पहले ही भारी क्षति उठाकर यूनानी सेनापति अब समझ गए थे कि अगर युद्ध और चला तो
सारे यवनी यहीं नष्ट कर दिए जाएंगे। यह निर्णय पाकर सिकंदर वापस भागा, पर उस रास्ते से नहीं भाग पाया, जहां से आया था और उसे दूसरे खतरनाक रास्ते से गुजरना पड़ा जिस क्षेत्र में प्राचीन क्षेत्र या जाट निवास करते थे।

उस क्षेत्र को जिसका पूर्वी हिस्सा आज के हरियाणा में स्थित था और जिसे 'जाट प्रदेश कहते थे, इस प्रदेश में पहुंचते ही सिकंदर का सामना जाट वीरों से (और पंजाबी वीरों से
सागर क्षेत्र में) हो गया और उसकी अधिकतर पलटन का सफाया जाटों ने कर दिया।

#क्या_लिखते_हैं_इतिहासकार : कर्तियास लिखता है कि, 'सिकंदर झेलम के दूसरी ओर पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेलम नदी के एक द्वीप में पहुंच गया। पुरु
के सैनिक भी इस द्वीप में तैरकर पहुंच गए।
उन्होंने यूनानी सैनिकों के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। अनेक यूनानी सैनिकों को मार डाला गया। बचे-खुचे सैनिक नदी में कूद गए और उसी में डूब गए। 
#एरियन_लिखता_है कि 'भारतीय युवराज ने अकेले ही सिकंदर के घेरे में घुसकर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोड़े 'से फेलास को मार डाला।' यह भी कहा जाता है कि पुरुक के हाथी दल-दल में फंस गए थे, तो कर्तियास
लिखता है 'कि इन पशुओं ने घोर आतंक पैदा कर दिया था। उनकी भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोड़े न केवल डर रहे थे बल्कि बिगड़कर भाग भी रहे थे। घोड़ों का सामना भी पहली बार किसी हाथी से हुआ था। विशालकाय हाथियों को देखकर वे उससे दूर भागते थे। बाद में सिकंदर ने छोटे शस्त्रों से सुसज्जित सेना के हाथियों से निपटने की आज्ञा दी। इस आक्रमण से चिढ़कर हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पांवों में कुचलना शुरू कर दिया।
वह आगे लिखता है कि 'सर्वाधिक हृदय-विदारक दृश्य यह था कि यह मजबूत कद वाला पशु यूनानी सैनिकों को अपनी सूंड से पकड़ लेता व अपने महावत को सौंप देता और वह उसका सर धड़ से तुरंत अलग कर देता। इसी प्रकार सारा दिन समाप्त हो जाता और युद्ध चलता ही रहता।'

इसी प्रकार #इतिहासकार_दियोदोरस_लिखता है कि 'हाथियों में अपार बल था और वे अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुए। अपने पैरों तले उन्होंने बहुत सारे यूनानी सैनिकों को चूर-चूर कर दिया। 
👆🏻 आप राजा पोरस काल का सिक्का देख रहे हैं, जिसमें हाथी पर सवार #पोरस ने घोड़े पर सवार सिकंदर को बांध रखा है। यूनान के आक्रमणकारी सिकन्दर को राजा पोरस ने झेलम के तट पर कुत्ते की तरह धोया था और मार भगाया था। घायल सिंकंदर वापिस भागते समय बीच मे मरा था। बावजूद इसके, कुछ मूर्ख जो जीता वो पोरस कहने की बजाय जो जीता वो सिकन्दर कहते है।

सिकंदर को महान बताने वाले मूर्खों को ज्ञात होना चाहिए कि पूरी दुनिया को जीत कर अंततः सिकंदर भारत आकर हारा। 💪🏻🇮🇳

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी से संबंधित वह घटना जिससे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता हैं।

बसंत पंचमी का दिन हमें "हिन्दशिरोमणि पृथ्वीराज चौहान" की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी इस्लामिक आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ बंदी बनाकर काबुल  अफगानिस्तान ले गया और वहाँ उनकी आंखें फोड़ दीं।

पृथ्वीराज का राजकवि चन्द बरदाई पृथ्वीराज से मिलने के लिए काबुल पहुंचा। वहां पर कैद खाने में पृथ्वीराज की दयनीय हालत देखकर चंद्रवरदाई के हृदय को गहरा आघात लगा और उसने गौरी से बदला लेने की योजना बनाई। 

चंद्रवरदाई ने गौरी को बताया कि हमारे राजा एक प्रतापी सम्राट हैं और इन्हें #शब्दभेदी_बाण (आवाज की दिशा में लक्ष्य को भेदनाद्ध चलाने में पारंगत हैं, यदि आप चाहें तो इनके शब्दभेदी बाण से लोहे के सात तवे बेधने का प्रदर्शन आप स्वयं भी देख सकते हैं। 

इस पर गौरी तैयार हो गया और उसके राज्य में सभी प्रमुख ओहदेदारों को इस कार्यक्रम को देखने हेतु आमंत्रित किया।

पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने पहले ही इस पूरे कार्यक्रम की गुप्त मंत्रणा कर ली थी कि उन्हें क्या करना है। निश्चित तिथि को दरबार लगा और गौरी एक ऊंचे स्थान पर अपने मंत्रियों के साथ बैठ गया। 

चंद्रवरदाई के निर्देशानुसार लोहे के सात बड़े-बड़े तवे निश्चित दिशा और दूरी पर लगवाए गए। चूँकि पृथ्वीराज की आँखे निकाल दी गई थी और वे अंधे थे, अतः उनको कैद एवं बेड़ियों से आजाद कर बैठने के निश्चित स्थान पर लाया गया और उनके हाथों में धनुष बाण थमाया गया।

इसके बाद चंद्रवरदाई ने पृथ्वीराज के वीर गाथाओं का गुणगान करते हुए बिरूदावली गाई तथा गौरी के बैठने के स्थान को इस प्रकार चिन्हित कर पृथ्वीराज को अवगत करवाया

चार बांस, चैबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण
  ता ऊपर सुल्तान है,  चूको मत चौहान

अर्थात् चार बांस, चैबीस गज और आठ अंगुल जितनी दूरी के ऊपर सुल्तान बैठा है, इसलिए चौहान चूकना नहीं..! अपने लक्ष्य को हासिल करो।

इस संदेश से पृथ्वीराज को गौरी की वास्तविक स्थिति का
आंकलन हो गया। तब चंद्रवरदाई ने गौरी से कहा कि पृथ्वीराज आपके बंदी हैं, इसलिए आप इन्हें आदेश दें, तब ही यह आपकी आज्ञा प्राप्त कर अपने शब्द भेदी बाण का प्रदर्शन करेंगे। 

इस पर ज्यों ही गौरी ने पृथ्वीराज को प्रदर्शन की आज्ञा का आदेश दिया, पृथ्वीराज को गौरी की दिशा मालूम हो गई और उन्होंने तुरन्त बिना एक पल की भी देरी किये अपने एक ही बाण से गौरी को मार गिराया।

गौरी उपर्युक्त कथित ऊंचाई से नीचे गिरा और उसके प्राण पंखेरू उड़ गए। चारों और भगदड़ और हा-हाकार मच गया, इस बीच पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार एक-दूसरे को कटार मार कर अपने प्राण त्याग दिये।

आत्मबलिदान की यह घटना भी 1192 ई. वसंत पंचमी वाले दिन ही हुई थी।

शनिवार, 25 जनवरी 2020

15 अगस्त और 26 जनवरी के झंडे फहराने में दोनों का अलग-अलग महत्व और अंतर है। आओ जाने...

पहला अंतर🇮🇳
15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर झंडे को नीचे से रस्सी द्वारा खींच कर ऊपर ले जाया जाता है, फिर खोल कर फहराया जाता है,  जिसे ध्वजारोहण कहा जाता है क्योंकि यह 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक घटना  को सम्मान देने हेतु किया जाता है जब प्रधानमंत्री जी ने ऐसा किया था। संविधान में इसे अंग्रेजी में Flag Hoisting (ध्वजारोहण) कहा जाता है।

जबकि 

26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर झंडा ऊपर ही बंधा रहता है, जिसे खोल कर फहराया जाता है, संविधान में इसे  झंडा फहराना(Flag Unfurling) कहा जाता है।
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*🇮🇳दूसरा अंतर*

15 अगस्त के दिन *प्रधानमंत्री जो कि केंद्र सरकार के प्रमुख होते हैं वो ध्वजारोहण करते हैं,* क्योंकि स्वतंत्रता के दिन भारत का संविधान लागू नहीं हुआ था और राष्ट्रपति जो कि राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख होते है, उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया था। इस दिन शाम को राष्ट्रपति अपना सन्देश राष्ट्र के नाम देते हैं।

जबकि

26 जनवरी जो कि देश में संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, *इस दिन संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं*
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*🇮🇳तीसरा अंतर*

स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से ध्वजारोहण किया जाता है।

जबकि

गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर झंडा फहराया जाता है।

शनिवार, 18 जनवरी 2020

गाय vs cow

वैज्ञानिकों ने अब शिद्ध कर दिया है कि यूरोपीयन सूअर का दूध पिने लायक नहीं हैं। इसके दूध से केवल बीमारियाँ पैदा होती हैं। आज लोग जर्सी या हॉलस्टन नस्ल की cow का दूध पी रहे है, जबकि डेनमार्क और स्विटजरलैंड के वैज्ञानिक यह प्रमाणित कर चुके हैं कि जर्सी और हॉलस्टन cow का दूध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। यह कैंसर की रोकथाम नहीं करता बल्कि कैंसर की बीमारी पैदा करता हैं। जर्सी या अमेरिकन cow भारतीय गाय का स्थान नहीं ले सकती। 
🐄यह गाय नहीं होती बल्कि गाय जैसा ही एक प्राणी है जिसे लोगों ने गाय का नाम दे दिया है। फ्रांस के जंगलों में 🐷जुरास नाम के पशु के डीएनए के साथ छेड़छाड़ करके ज्यादा दूध प्राप्त करने के उद्देश्य से जर्सी गाय नामक प्राणी की उत्पत्ति की गई। अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति में गाय माता के महत्व को देखकर ईष्र्यावश जर्सी का प्रचार-प्रसार कर डाला और आज तक लोग जर्सी को प्राथमिकता दे रहे है।
  • विदशों में विदेशी गाय उसके मांस (बीफ) के लिए पाली जाती है और दूध उसका गौढ़ उत्पाद है। अतः विदेशों में विदेशी गऊ वंश की उपयोगिता दूध पर से समाप्त या कम होते ही उसका मांस प्राप्त एवं उपयोग कर लिया जाता है। अध्ययन से पता चलता है कि विदेशों में गौ पालन फार्म्स की 90 प्रतिशत से अधिक आमदनी बीफ के द्वारा होती है जबकि देशी गाय को बीफ के लिए पाला जाना भारतवर्ष में असंभव है। अतः यह विचारणीय प्रश्न है कि गौ हत्या बंदी में विदेशी गाय को शामिल न किया जाये केवल देशी गौ हत्या बंदी हो। यह विदेश की स्थिति व देश की स्थिति की विडम्बना है कि देश के सिकुड़ते हुए संसाधनों में विदेशी गाय देशी गाय का हिस्सा ले इससे उलट विदेशी गाय का स्वभाविक प्रयोग जो विदेशों में होता है, बीफ के लिए किया जाये।

सोमवार, 13 जनवरी 2020

मकर संक्रांति के 10 रोचक तथ्य

उन त्योहार, पर्व या उत्सवों को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा, व्यक्ति विशेष या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथ, धर्मसूत्र और आचार संहिता में मिलता है। ऐसे कुछ पर्व हैं और इनके मनाने के अपने नियम भी हैं। इन पर्वों में सूर्य-चंद्र की संक्रांतियों और कुम्भ का अधिक महत्व है। सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है। माघ माह में कृष्ण पंचमी को मकर सक्रांति देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में मनाई जाती है। आओ जानते हैं कि मकर संक्रांति के दिन कौन-कौन से खास कार्य होते हैं...
 
 
1. क्यों कहते हैं मकर संक्रांति?
मकर संक्रांति में 'मकर' शब्द मकर राशि को इंगित करता है जबकि 'संक्रांति' का अर्थ संक्रमण अर्थात प्रवेश करना है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। एक राशि को छोड़कर दूसरे में प्रवेश करने की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते हैं। चूंकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को 'मकर संक्रांति' कहा जाता है। हिन्दू महीने के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है।
 
 
2. इस दिन से सूर्य होता है उत्तरायन 
चन्द्र के आधार पर माह के 2 भाग हैं- कृष्ण और शुक्ल पक्ष। इसी तरह सूर्य के आधार पर वर्ष के 2 भाग हैं- उत्तरायन और दक्षिणायन। इस दिन से सूर्य उत्तरायन हो जाता है। उत्तरायन अर्थात उस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। इसे सोम्यायन भी कहते हैं। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। अत: यह पर्व 'उत्तरायन' के नाम से भी जाना जाता है। मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के 6 मास के समयांतराल को उत्तरायन कहते हैं।

3. इस पर्व का भौगोलिक विवरण
पृथ्वी साढ़े 23 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तब वर्ष में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है। वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है। भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है जिसमें से 4 संक्रांतियां महत्वपूर्ण होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति।
 
4. फसलें लहलहाने लगती हैं
इस दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं।
 
5. पर्व का सांस्कृतिक महत्व
मकर संक्रांति के इस पर्व को भारत के अलग-अलग राज्यों में वहां के स्थानीय तरीकों से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इस त्योहार को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, खिचड़ी पर्व, पतंगोत्सव आदि कहा जाता है। मध्यभारत में इसे संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायन, माघी, खिचड़ी आदि नाम से भी जाना जाता है।
 
 
6. तिल-गुड़ के लड्डू और पकवान
सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारियां जल्दी लगती हैं इसलिए इस दिन गुड़ और तिल से बने मिष्ठान्न या पकवान बनाए, खाए और बांटे जाते हैं। इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्वों के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं। उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है।
 
 
7. स्नान, दान, पुण्य और पूजा
माना जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे इसलिए इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है। इस दिन गंगासागर में मेला भी लगता है। इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्रारंभ होने के कारण लोग दान-पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं। इस दिन को सुख और समृद्धि का माना जाता है।
 
 
8. पतंग महोत्सव का पर्व
यह पर्व 'पतंग महोत्सव' के नाम से भी जाना जाता है। पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण है कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना। यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में सुबह का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थवर्द्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। अत: उत्सव के साथ ही सेहत का भी लाभ मिलता है।
 
9. अच्छे दिन की शुरुआत
भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायन का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायन के 6 मास के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायन होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है, तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यही कारण था कि भीष्म पितामह ने शरीर तब तक नहीं त्यागा था, जब तक कि सूर्य उत्तरायन नहीं हो गया।
 
 
10. ऐतिहासिक तथ्‍य
हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति से देवताओं का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था इसलिए मकर संक्रांति पर गंगासागर में मेला लगता है